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भारत-पाक के बीच अच्छे रिश्ते अब भी मृगतृष्णा
सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत
Updated Fri, 15 Dec 2017 11:45 AM IST
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भारत-पाक रिश्ते
पिछले दिनों इंडिया इंटरनेशल सेंटर में एक कार्यक्रम में जब पूछा गया कि क्या कभी भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे पड़ोसी के रिश्ते होंगे, तो वहां मौजूद ज्यादातर लोगों ने हाथ दिखाकर 'न' में जवाब दिया। यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी।
शुक्र है कि हॉल में कुछेक लोग, जिनमें पैनलिस्ट भी शामिल थे आशावदी लग रहे थे, भले ही फिलहाल आशावाद की किरण मंद प्रतीत होती हों और संदेह का कोहरा चाहे कितना ही घना क्यों न हो।
एक पूर्व राजनयिक, जिन्होंने कई वर्षों तक पाकिस्तान से निपटते रहे हैं, मानते हैं कि दीर्घकाल में प्रौद्योगिक दोनों देशों के रिश्ते में अहम भूमिका निभा सकती है।
सीमा के दोनों पार की नई पीढ़ी सोशल नेटवर्क की आदी है, 21वीं सदी का फायदा उठाने के लिए अपनी आकांक्षाओं से प्रेरित हैं, अतीत की कड़वाहट और संक्रामक नफरत से मुक्त हैं, संभवतः साझा हितों से संबंधित चीजों को साझा करने और संवाद करने के लिए एक इंटरनेट समुदाय का बना सकते हैं, जो कुछ समय बाद अविश्वास को खत्म करने में मदद कर सकता है और आज के संदर्भ में एक-दूसरे के प्रति आपसी समझ और सराहना विकसित कर सकते हैं तथा दोस्ती का बीज बो सकते हैं, जो एक अच्छे पड़ोसी होने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, अमेरिका और कनाडा की तरह नहीं, बल्कि उन पड़ोसियों की तरह जिन्होंने एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक जीना सीख लिया है।
पाकिस्तानी सेना के कुछ आला अधिकारी अब भी 1971 और कारगिल के अपमान का बदला लेने का सपना देखते हैं। उनमें से कइयों ने भारत से झूठे खतरे का हौव्वा दिखाकर औद्योगिक साम्राज्य स्थापित कर लिया है, वे भारत विरोधी भावनाओं को भड़काते हैं।
हालांकि यह माना जाता है कि पाकिस्तानी जनरलों के बेटे अपने व्यवहार में पीढ़ीगत बदलाव को दर्शा रहे हैं और वे अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलने को उत्सुक नहीं हैं, इसके बजाय वे अन्य क्षेत्रों में सफलता तलाशेंगे। यह महत्वाकांक्षी पीढ़ी भारत की प्रगति और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्च सम्मान से आंखें नहीं मूंद सकती, वह पूछती है कि ऐसा पाकिस्तान के साथ क्यों नहीं है। क्या वे कट्टरता खत्म करने के वाहक हो सकते हैं ?
निराशावादी लोग शांति के प्रति इस रोमांटिकता को खारिज करते हैं और इस बात पर जोर डालते कि यह विफल होने के लिए बाध्य है। वे बार-बार भारत-पाकिस्तान की ज्ञात कहानी को दोहराते हैं-पाकिस्तान का जन्म और विभाजन की भयावहता, 1947 से पाकिस्तान की भयावह करतूत-रेंजर्स व सेना द्वारा घुसपैठ, 1965, 1971 और कारगिल का युद्ध और संसद भवन तथा लाल किले पर आंतकी हमला आदि।
वे इस हकीकत को जानते हैं कि पाकिस्तान में सेना और आईएसआई का ही वर्चस्व है, विदेश और रक्षा के मामलों में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार का कोई दखल नहीं होता है, कट्टरपंथियों के विरोध प्रदर्शन के आगे कैसे सरकार को घुटने टेकने पड़े और कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, पाकिस्तान में सैकड़ों आतंकी शिविरों का होना और पाकिस्तान द्वारा राज्य नीति के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल।
वे सही तर्क देते हैं कि पाकिस्तान ने अब तक मुंबई हमले के गुनहगारों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया है और न उठाना चाहता है। मास्टरमाइंड आतंकवादी वहां स्वतंत्र होकर घूमते हैं। वे याद दिलाते हैं कि कैसे 1980 के दशक के उत्तरार्ध में पाकिस्तान ने खालिस्तानी आंदोलन की फंडिंग की थी और उसे फिर पुनर्जीवित करना चाहता है। वह वर्षों से जम्मू-कश्मीर में कई आतंकवादियों को धन मुहैया करा रहा है।
वे सही हैं- पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की कोई भूमिका नहीं चाहता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और पाकिस्तान में चीन की बढ़ती भूमिका भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन के समर्थन के कारण ही संभवतः पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा परमाणु हथियार हैं।
एक पूर्व उच्चायुक्त के मुताबिक, पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद करने से भारत को उसके खिलाफ कोई फायदा नहीं हो सकता है। यह ऐसी सजा नहीं है, जो पाकिस्तान को अपने रवैये में सुधार के लिए प्रेरित करे। क्या यह सच नहीं है कि चाहे दोनों देशों के बीच कितनी भी तीखी लड़ाई क्यों न हुई हो, भारी संख्या में जानें गई हैं और भले ही दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ चाहे जो भी बोला हो, लेकिन आज या कल, दोनों को बातचीत की मेज पर लौटना ही होगा? फिलहाल भले कोई यह नहीं कह सकता कि कब द्विपक्षीय बातचीत शुरू होगी, लेकिन अतीत के अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि कभी न कभी बातचीत होगी ही।
क्या कोई यह भूल सकता है कि प्रथम प्रधानमंत्री से लेकर नरेंद्र मोदी तक, सबने पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश की है? उन्होंने ऐसा क्यों किया? जाहिर है, वे जानते थे कि दीर्घकालीन अर्थों में यह भारत के राष्ट्रीय हित में है। चैंबर्स ऑफ कॉमर्स का दावा है कि द्विपक्षीय रिश्तों में मुश्किलों के बावजूद दोनों देशों के बीच अनाधिकारिक रूप से 4.5 अरब डॉलर का है, जबकि आधिकारिक आंकड़ा करीब दो अरब डॉलर ही है। दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन अगर अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर रहा है, तो उसकी असली वजह भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव है।
सीमा के दोनों तरफ हजारों विभाजित परिवार दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीद करते हैं, क्योंकि तब वे सीमा पार के अपने रिश्तेदारों से आसानी से मिल सकते हैं। और आक्रामक बयानबाजी के विपरीत, लाखों पाकिस्तानी बॉलीवुड अभिनेत्रियों के दीवाने हैं, जबकि लाखों भारतीय पाकिस्तानी गायकों के प्रशंसक हैं, उनमें से कुछ गायकों के प्रशंसक तो पाकिस्तान के बजाय भारत में ज्यादा हैं।
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया है। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की आधे-अधूरे मन से लड़ाई के खिलाफ अमेरिका ने जो असंतोष जताया है, हमें उसका फायदा उठाना चाहिए। पाकिस्तान में चीनी मूल के लोगों के खिलाफ भी हिंसा बढ़ी है।
भले ही संयुक्त राष्ट्र में चीन पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर का बचाव करता रहा है, लेकिन हमें चीन के मुस्लिम आबादी वाले शिनजियांग प्रांत में पाकिस्तानी आतंकियों की हिंसा के खतरे के बारे में चीनी आशंका को अपने फायदे के लिए मजबूत करना चाहिए।
क्या हम अमेरिका, चीन, सऊदी, अरब और ईरान को पाकिस्तान को भारत के साथ शांति बनाए रखने के लिए सहमत नहीं कर सकते? इसमें तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। सीधी वार्ता में पाकिस्तानी सेना को शामिल की जरूरत स्पष्ट है, लेकिन हमें पता नहीं कि यह कैसे होगा।
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एक पूर्व राजनयिक, जिन्होंने कई वर्षों तक पाकिस्तान से निपटते रहे हैं, मानते हैं कि दीर्घकाल में प्रौद्योगिक दोनों देशों के रिश्ते में अहम भूमिका निभा सकती है।
सीमा के दोनों पार की नई पीढ़ी सोशल नेटवर्क की आदी है, 21वीं सदी का फायदा उठाने के लिए अपनी आकांक्षाओं से प्रेरित हैं, अतीत की कड़वाहट और संक्रामक नफरत से मुक्त हैं, संभवतः साझा हितों से संबंधित चीजों को साझा करने और संवाद करने के लिए एक इंटरनेट समुदाय का बना सकते हैं, जो कुछ समय बाद अविश्वास को खत्म करने में मदद कर सकता है और आज के संदर्भ में एक-दूसरे के प्रति आपसी समझ और सराहना विकसित कर सकते हैं तथा दोस्ती का बीज बो सकते हैं, जो एक अच्छे पड़ोसी होने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं, अमेरिका और कनाडा की तरह नहीं, बल्कि उन पड़ोसियों की तरह जिन्होंने एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक जीना सीख लिया है।
पाकिस्तानी सेना के कुछ आला अधिकारी अब भी 1971 और कारगिल के अपमान का बदला लेने का सपना देखते हैं। उनमें से कइयों ने भारत से झूठे खतरे का हौव्वा दिखाकर औद्योगिक साम्राज्य स्थापित कर लिया है, वे भारत विरोधी भावनाओं को भड़काते हैं।
हालांकि यह माना जाता है कि पाकिस्तानी जनरलों के बेटे अपने व्यवहार में पीढ़ीगत बदलाव को दर्शा रहे हैं और वे अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलने को उत्सुक नहीं हैं, इसके बजाय वे अन्य क्षेत्रों में सफलता तलाशेंगे। यह महत्वाकांक्षी पीढ़ी भारत की प्रगति और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्च सम्मान से आंखें नहीं मूंद सकती, वह पूछती है कि ऐसा पाकिस्तान के साथ क्यों नहीं है। क्या वे कट्टरता खत्म करने के वाहक हो सकते हैं ?
निराशावादी लोग शांति के प्रति इस रोमांटिकता को खारिज करते हैं और इस बात पर जोर डालते कि यह विफल होने के लिए बाध्य है। वे बार-बार भारत-पाकिस्तान की ज्ञात कहानी को दोहराते हैं-पाकिस्तान का जन्म और विभाजन की भयावहता, 1947 से पाकिस्तान की भयावह करतूत-रेंजर्स व सेना द्वारा घुसपैठ, 1965, 1971 और कारगिल का युद्ध और संसद भवन तथा लाल किले पर आंतकी हमला आदि।
वे इस हकीकत को जानते हैं कि पाकिस्तान में सेना और आईएसआई का ही वर्चस्व है, विदेश और रक्षा के मामलों में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार का कोई दखल नहीं होता है, कट्टरपंथियों के विरोध प्रदर्शन के आगे कैसे सरकार को घुटने टेकने पड़े और कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, पाकिस्तान में सैकड़ों आतंकी शिविरों का होना और पाकिस्तान द्वारा राज्य नीति के रूप में आतंकवाद का इस्तेमाल।
वे सही तर्क देते हैं कि पाकिस्तान ने अब तक मुंबई हमले के गुनहगारों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया है और न उठाना चाहता है। मास्टरमाइंड आतंकवादी वहां स्वतंत्र होकर घूमते हैं। वे याद दिलाते हैं कि कैसे 1980 के दशक के उत्तरार्ध में पाकिस्तान ने खालिस्तानी आंदोलन की फंडिंग की थी और उसे फिर पुनर्जीवित करना चाहता है। वह वर्षों से जम्मू-कश्मीर में कई आतंकवादियों को धन मुहैया करा रहा है।
वे सही हैं- पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की कोई भूमिका नहीं चाहता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और पाकिस्तान में चीन की बढ़ती भूमिका भारत के लिए चिंता का विषय है। चीन के समर्थन के कारण ही संभवतः पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा परमाणु हथियार हैं।
एक पूर्व उच्चायुक्त के मुताबिक, पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद करने से भारत को उसके खिलाफ कोई फायदा नहीं हो सकता है। यह ऐसी सजा नहीं है, जो पाकिस्तान को अपने रवैये में सुधार के लिए प्रेरित करे। क्या यह सच नहीं है कि चाहे दोनों देशों के बीच कितनी भी तीखी लड़ाई क्यों न हुई हो, भारी संख्या में जानें गई हैं और भले ही दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ चाहे जो भी बोला हो, लेकिन आज या कल, दोनों को बातचीत की मेज पर लौटना ही होगा? फिलहाल भले कोई यह नहीं कह सकता कि कब द्विपक्षीय बातचीत शुरू होगी, लेकिन अतीत के अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि कभी न कभी बातचीत होगी ही।
क्या कोई यह भूल सकता है कि प्रथम प्रधानमंत्री से लेकर नरेंद्र मोदी तक, सबने पाकिस्तान के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश की है? उन्होंने ऐसा क्यों किया? जाहिर है, वे जानते थे कि दीर्घकालीन अर्थों में यह भारत के राष्ट्रीय हित में है। चैंबर्स ऑफ कॉमर्स का दावा है कि द्विपक्षीय रिश्तों में मुश्किलों के बावजूद दोनों देशों के बीच अनाधिकारिक रूप से 4.5 अरब डॉलर का है, जबकि आधिकारिक आंकड़ा करीब दो अरब डॉलर ही है। दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन अगर अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर रहा है, तो उसकी असली वजह भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव है।
सीमा के दोनों तरफ हजारों विभाजित परिवार दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीद करते हैं, क्योंकि तब वे सीमा पार के अपने रिश्तेदारों से आसानी से मिल सकते हैं। और आक्रामक बयानबाजी के विपरीत, लाखों पाकिस्तानी बॉलीवुड अभिनेत्रियों के दीवाने हैं, जबकि लाखों भारतीय पाकिस्तानी गायकों के प्रशंसक हैं, उनमें से कुछ गायकों के प्रशंसक तो पाकिस्तान के बजाय भारत में ज्यादा हैं।
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया है। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान की आधे-अधूरे मन से लड़ाई के खिलाफ अमेरिका ने जो असंतोष जताया है, हमें उसका फायदा उठाना चाहिए। पाकिस्तान में चीनी मूल के लोगों के खिलाफ भी हिंसा बढ़ी है।
भले ही संयुक्त राष्ट्र में चीन पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर का बचाव करता रहा है, लेकिन हमें चीन के मुस्लिम आबादी वाले शिनजियांग प्रांत में पाकिस्तानी आतंकियों की हिंसा के खतरे के बारे में चीनी आशंका को अपने फायदे के लिए मजबूत करना चाहिए।
क्या हम अमेरिका, चीन, सऊदी, अरब और ईरान को पाकिस्तान को भारत के साथ शांति बनाए रखने के लिए सहमत नहीं कर सकते? इसमें तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। सीधी वार्ता में पाकिस्तानी सेना को शामिल की जरूरत स्पष्ट है, लेकिन हमें पता नहीं कि यह कैसे होगा।