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मातृभाषा दिवस: बहुराष्ट्रीयकरण के दौर में जरूरी है मातृभाषा और बोलियों का संरक्षण, तकनीक कर रही है मदद

Wed, 21 Feb 2024 07:17 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Wed, 21 Feb 2024 07:17 AM IST
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सार

मातृभाषाओं की जरूरत इसलिए भी है कि वे अभिव्यक्ति की दुनिया को लोकतांत्रिक बनाती हैं, भावों को सहज संप्रेष्य बनाती हैं।

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Globalisation Matribhasha Day preserving mother tongue with help of technology
File Photo

विस्तार

उदारीकरण के दौर में जब अंग्रेजी अपनी चमक बिखेर रही है, ऐसे में सवाल उठ सकता है कि मातृभाषाओं की जरूरत क्या है? चूंकि उदारीकरण और वैश्वीकरण की भाषा के रूप में अंग्रेजी अघोषित तौर पर प्रतिनिधित्व हासिल कर चुकी है, इसलिए ऐसा स्वाभाविक भी है। खासकर अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

दुनिया भर के समाजशास्त्री और बाल मनोविज्ञानी मानते हैं कि शिक्षा हासिल करते वक्त बच्चा अपनी मातृभाषा में सबसे ज्यादा सहज रहता है। इसकी वजह यह है कि मातृभाषाओं का रिश्ता व्यक्ति के दिल से ज्यादा रहता है। दरअसल, दिमाग के जरिये जो कुछ ग्रहण होता है, वह तार्किकता से पूर्ण होता है। तार्किकता मनुष्य के नजरिये को वैज्ञानिक तो बनाती है, पर वह कई बार मर्म को छू नहीं पाती। वहीं दिल से स्नेह और प्यार का रिश्ता है। मातृभाषा को इसी संदर्भ में समझें, तो वह दिमाग नहीं, दिल की भाषा है। मां के दूध में जिस तरह पौष्टिकता के साथ ही स्नेह होता है, मातृभाषाएं भी मनुष्य के लिए स्नेह और पौष्टिकता-दोनों सहज उपलब्ध करा देती हैं।

नेल्सन मंडेला कहते हैं कि अगर किसी शख्स से आप उस भाषा में बात करते हैं, जो उसकी दूसरी भाषा है, जिसे वह समझ सकता है, तो वह भाषा उसके मस्तिष्क में जाती है। लेकिन अगर आप उसकी मातृभाषा में बात करते हैं, तो वह सीधे उसके दिल तक पहुंच जाती है। यह दिल का रिश्ता ही है कि जब एक भाषा क्षेत्र के लोग मिलते हैं, तो वे अपनी मातृभाषा में बात करने में सहज महसूस करते हैं।

दुनिया ने लोकतंत्र को शासन की बेहतर प्रणाली माना है। उदारीकरण और वैश्वीकरण की व्यवस्थाएं इसी लोकतांत्रिक समाज में उपजी हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि उदारीकरण कम से कम भाषाओं के लिहाज से लोकतांत्रिक नहीं हो पाया है। उसकी प्रतिनिधि भाषा अंग्रेजी है। अगर उसने किसी अन्य भाषा को इस दिशा में कुछ छूट दी है, तो वह फ्रेंच, स्विस या यूरोप की कुछ ताकतवर समुदायों की भाषाएं ही हैं। लेकिन इनमें भी अंग्रेजी का ही वर्चस्व है। कुछ लोग कह सकते हैं कि बाजार की बढ़ती ताकत के दौर में उदारीकरण अंग्रेजी के साथ स्थानीय भाषाओं को भी बढ़ावा दे रहा है। पर यह आधी सच्चाई है। अगर उदारीकरण स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा दे रहा है, तो वह भाषाओं का लोकतंत्रीकरण नहीं कर रहा है, बल्कि उनके जरिये अपना ही विस्तार कर रहा है।

इसका यह मतलब नहीं है कि मातृभाषाओं की जरूरत ऐसी ही रहेगी। मातृभाषाएं इसलिए जरूरी हैं, कि शख्स सहज बना रहे। यह वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुका है कि मातृभाषा में सहज शिक्षा हासिल कर चुका विद्यार्थी दूसरी भाषाओं को कहीं अधिक प्रवीणता से सीख पाता है। मातृभाषाओं की जरूरत इसलिए भी है कि मानव समाज की विरासत और धरोहर को उन्होंने ही सहेज रखा है। धरोहरों के भाव और संदेश को किसी अन्य भाषा में अनूदित नहीं किया जा सकता। वह अनुवाद दिमागी ही होगा, उसका दिल के मर्म से संबंध नहीं होगा। मातृभाषाओं की जरूरत इसलिए भी है कि वे अभिव्यक्ति की दुनिया को लोकतांत्रिक बनाती हैं, भावों को सहज संप्रेष्य बनाती हैं। इस तरह से वे मानवता की सेवा करती हैं।

लोकतंत्र में नागरिकों की सहज भागीदारी, समावेशी शिक्षा, सामाजिक और प्राकृतिक विविधता के साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी मातृभाषाएं ही हैं। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के जरिये जहां प्राथमिक शिक्षा पर जोर दिया गया है, वहीं देश की भाषाओं के आंकड़े और बुनियादी उच्चारण आदि का संग्रह भी किया जा रहा है। देश में 1,652 भाषाएं हैं और वे अपने-अपने समाजों की मातृभाषा भी हैं। गृह मंत्रालय समय-समय पर इनका सर्वेक्षण भी कराता रहता है। पिछले साल नवंबर तक मंत्रालय ने देश की 576 भाषाओं और बोलियों का मातृभाषा सर्वेक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था, जिन्हें संरक्षित करने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र में एक वेब संग्रह तैयार किया जा रहा है। मंत्रालय के अनुसार, इस संग्रह में तमाम भाषाओं को रखा जाएगा। इसके तहत 576 मातृभाषाओं की ‘फील्ड वीडियोग्राफी’ भी कराई गई है। इस परियोजना में मातृभाषाओं का ‘स्पीच डाटा’ भी संग्रहीत किया जा रहा है, जिसे बाद में वेबसाइट पर प्रदर्शित भी किया जाएगा।

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