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सोलह सीढ़ियों पर साढ़े चार लाख कदम
आशुतोष्ा चतुर्वेदी, मॉरीशस से लौटकर
Updated Sat, 16 Mar 2013 10:12 PM IST
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सीढ़ियां अद्भुत होती हैं-वह एक जगह ठहरी हुई होती हैं, किंतु वह कभी ऊपर की ओर जाती हैं, तो कभी नीचे की ओर। सीढ़ियां अक्सर दो जगह को मिलाती भी हैं-स्वप्न को हकीकत से या फिर धरती को आसमान से! कभी-कभी दो सभ्यताओं को भी, दो संस्कृतियों को भी। और जहां से शुरू होती हैं सीढ़ियां, वहीं बनते हैं घाट। आस्था के घाट! अतीत के घाट! या फिर इतिहास के घाट!
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भारत में अनेक ऐतिहासिक घाट हैं, जिनसे इतिहास और धार्मिक आस्था आज भी मजबूती से जुड़ी हुई है। वाराणसी का अस्सी घाट, दशाश्वमेघ, मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र घाट, इलाहाबाद का त्रिवेणी संगम स्थल, हरिद्वार की हरि की पौढ़ी और मथुरा का विश्राम घाट- ये कुछेक ऐसी जगह हैं, जिनसे जन आस्थाएं और इतिहास गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। लेकिन लघु भारत के रूप में जाना जाने वाला मॉरीशस का आप्रवासी घाट इनसे कहीं भी कम नहीं है।
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दिलचस्प तथ्य यह है कि यह घाट किसी नदी के नहीं, बल्कि हिंद महासागर के किनारे स्थित है। सन् 1834 से 1910 के बीच साढ़े चार लाख गिरमिटिया या बंधुआ मजदूर इस तट पर उतरे थे, जिनमें अधिकांश भारतीय थे। यह आप्रवासियों के इतिहास का एक जीता जागता साक्ष्य है। मॉरीशस के लोग इसे एक पवित्र स्थल मानते हैं और उन्होंने इसे आप्रवासी घाट का नाम दिया है।
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यह घाट वैश्विक धरोहर स्थलों की सूची में भी शामिल है। यह आप्रवासी घाट यहां उतरे उन संकल्पशील व्यक्तियों के दर्द, वेदना और व्यथा के प्रतीक हैं, जिन्होंने आधुनिक मॉरीशस के निर्माण की नींव रखी थी। मॉरीशस डच, फ्रांस से होता हुआ ब्रिटेन के कब्जे में पहुंचा था। यह गन्ने की खेती के लिए जाना जाता था। खेतों में काम करने के लिए गुलामों की जरूरत हुआ करती थी, लेकिन ब्रितानी संसद ने 1833 में गुलामी प्रथा समाप्त करने का प्रस्ताव पारित कर दिया।
गोरों ने नया रास्ता निकाला अनुबंधित मजदूरों का और वे पांच साल के अनुबंध पर मजदूरों को लाने लगे। दो नवंबर, 1834 को एमवी एटलस नामक जहाज भारत से मजदूरों का पहला जत्था लेकर मॉरीशस पहुंचा। उस समय मॉरीशस एक पथरीला और प्राकृतिक आपदाओं के कारण गुजर-बसर करने योग्य स्थान नहीं था। मजदूरों का यह जत्था अकल्पनीय कष्ट, पीड़ा और देश छोड़ने की वेदना सहते हुए मॉरीशस के तट पर पहुंचा। उसके बाद साल दर साल हजारों की संख्या में जहाजों में भर कर लाए गए भारतीय मजदूर आप्रवासी घाट पर उतरते गए।
यहां पहुंचने पर और कोई काम देने से पहले उनके रुकने का प्रबंध किया जाता था। इस दौरान उनका रजिस्ट्रेशन और डॉक्टरी जांच की जाती थी। फिर अप्रवासी घाट की सीढ़ियां उन्हें समुद्र के किनारे से ऊपर की ओर पहुंचाती थी। आज भले ही अचरज लगे लेकिन कभी अप्रवासी घाट की 16 सीढ़ियों से साढ़े चार लाख लोग ऊपर पहुंचे थे।
फिर बाद की कहानी में गुलामी, वेदना, दर्द और टीस जैसे शब्द तो मिलते हैं, लेकिन फिर दो सभ्यताओं और संस्कृतियों का मिलन भी हुआ। मॉरीशस लघु भारत हो गया। आज भी जब वहां के लोग लौटकर पीछे की ओर देखते हैं तो याद आती हैं वो सोलह सीढ़ियां। मॉरीशस के लोग इन सीढ़ियों को दिखाते हुए इसके ऐतिहासिक महत्व और इसके प्रति अपनी श्रद्धा को बताना नहीं भूलते।
इन्हीं सीढ़ियों से चढ़कर मॉरीशस पहुंचे भारतीयों ने हाड़-तोड़ मेहनत, कष्ट और बलिदान से बाद की पीढ़ियों को सुखद और सुरक्षित जीवन मुहैया कराया। उन्हीं की संतानों में से एक डॉ. नवीन रामगुलाम आज मॉरीशस के प्रधानमंत्री हैं और राजकेश्वर प्रयाग मॉरीशस के राष्ट्रपति हैं। (मॉरीशस से लौटकर)