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उपहार में अपना सब कुछ दे दिया
भिक्षु धर्मरक्षित
Updated Mon, 20 Jul 2015 08:16 PM IST
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कई दिनों के विहार के बाद भगवान बुद्ध मगध की राजधानी राजगृह से प्रस्थान करने वाले थे। लोगों को पता चला, तो वे उनके लिए भेंट आदि लेकर उनके दर्शन के लिए आने लगे। अपने शिष्यों के साथ बैठे बुद्ध लोगों की भेंट स्वीकार कर रहे थे। सम्राट बिंबिसार ने उन्हें खाद्य, वस्त्र, वाहन आदि दिए। नगर सेठों ने भी उन्हें प्रचुर धन-धान्य और सुवर्ण आभूषण भेंट किए। उस दान को स्वीकार करते हुए बुद्ध अपना दायां हाथ उठाकर इशारा कर देते थे।
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भीड़ में एक वृद्धा भी थी। वह बुद्ध से बोली, भगवन, मैं बहुत निर्धन हूं। मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। आज मुझे पेड़ से गिरा यह आम मिला। मैं उसे खा रही थी कि तभी आपके प्रस्थान का समाचार सुना। तब तक मैंने आधा आम खा लिया था। मेरे पास इस आधे आम के सिवा कुछ भी नहीं है। क्या आप मेरी भेंट स्वीकार करेंगे?
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वहां उपस्थित अपार जनसमुदाय और सेठों ने देखा कि भगवान बुद्ध अपने आसन से उठकर नीचे आए और उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर वृद्धा का आधा आम स्वीकार किया। सम्राट बिंबिसार ने चकित होकर बुद्ध से पूछा, भगवन, एक से बढ़कर एक अनुपम और बहुमूल्य उपहार तो आपने केवल हाथ हिलाकर ही स्वीकार किया, लेकिन इस वृद्धा का जूठा आम लेने के लिए आप आसन से नीचे उतरकर आ गए! इसमें ऐसी क्या विशेषता है?
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बुद्ध मुस्कराए और बोले, इस वृद्धा के पास जो भी था, वह सब उसने दे दिया। आप लोगों ने जो कुछ भी दिया है, वह तो आपकी अकूत संपत्ति का अंश मात्र है। उसे देने पर दाता का अहंकार भी पाल लिया। इस वृद्धा ने तो प्रेम और श्रद्धा से सर्वस्व अर्पित कर दिया। फिर भी उसके मुख पर कितनी नम्रता और करुणा है।