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राजनीति में उपहार

Sun, 01 Mar 2015 07:00 PM IST
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा Updated Sun, 01 Mar 2015 07:00 PM IST
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Gift in politics

नरेंद्र मोदी ने 25 जनवरी को जो सूट पहना था, वह आधुनिक भारतीय इतिहास में बेहद चर्चित कपड़ा बन गया। टेलीविजन स्टूडियो और घरेलू चर्चा में लोग पूछते हैं-क्या प्रधानमंत्री को अपने नाम वाला सूट एक प्रशंसक से उपहार के तौर पर लेकर, आधिकारिक स्वागत के मौके पर पहनकर, फिर उसकी नीलामी करनी चाहिए थी? बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी के पूर्ववर्ती ने भी उपहार स्वीकार किया और रखा, भले ही वह उतना शानदार नहीं था। एक आरटीआई जानकारी से यह खुलासा हुआ है कि पद त्यागने के बाद डॉ. मनमोहन सिंह 101 उपहार अपने घर ले गए, जो उन्हें प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए मिले थे। इनमें एक म्यूजिक सिस्टम, एक कलाई घड़ी और कुछ टी-सेट्स थे।

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भारतीय राजनेताओं द्वारा उपहार स्वीकारने की एक लंबी परंपरा रही है। हाल ही में अभिलेखागार में काम करते हुए मुझे आंध्र प्रदेश के प्रमुख कांग्रेसी नेता टी प्रकाशम द्वारा 1940 के दशक में उपहार (नकद एवं वस्तु, दोनों रूपों में) स्वीकार करने से संबंधित एक फाइल मिली। ये उपहार उन्हें कई व्यक्तियों, और बार एसोसिएशन तथा नेल्लोर, विशाखापट्टनम व राजमुंद्री जैसे शहरों के मर्चेंट्स चैंबर की तरफ से मिले थे। प्रकाशम मद्रास प्रेसिडेंसी के तेलुगू भाषी जिलों के एक बड़े नायक थे, जिन्हें उनके प्रशंसक 'आंध्र केसरी' कहते थे।
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प्रकाशम द्वारा उपहार लेने की घटनाओं ने उनके पार्टी नेता वल्लभभाई पटेल का ध्यान आकर्षित किया। फरवरी, 1946 में पटेल ने पत्र लिखकर उनसे पूछा कि उन्होंने जो रकम उपहार के तौर पर ली, क्या उसे पार्टी कोष में सही तरीके से जमा करवा दिया है? जब प्रकाशम ने जवाब दिया कि वे उन्हें उनके संघर्ष की सराहना के तौर पर मिले थे, तो पटेल ने जवाब दिया कि 'एक कांग्रेसी का निजी उपयोग के लिए इस तरह सार्वजनिक धन लेना गलत था।'
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पटेल ने इस पत्राचार को महात्मा गांधी के पास भेज दिया, जिन्होंने प्रकाशम को लिखा कि उन्होंने एक बहुत गलत उदाहरण प्रस्तुत किया है। आगे उन्होंने लिखा, 'अगर यह प्रवृत्ति बढ़ती रही, तो सार्वजनिक जीवन में शुचिता का अंत हो जाएगा।' गांधी ने प्रकाशम को बताया कि उन्होंने 'अनजाने में ही सही, सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में मदद की' है।

इस पर प्रकाशम ने अपने बचाव में एक बयान जारी किया। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि एक पूर्णकालिक राजनेता होने के कारण वह कोई सवैतनिक नौकरी नहीं कर सकते, इसलिए जनता के सहयोग पर निर्भर रहना ही उनके पास एकमात्र विकल्प था; उन्हें जो भी रकम दी गई, वह संगठित सार्वजनिक दान है या उनके द्वारा की गई सेवाओं का सार्वजनिक प्रतिदान है। आगे उन्होंने लिखा, मुझ पर बरसाए गए धन में से मेरी सामान्य जरूरतों की पूर्ति के बाद जो भी पैसा बच जाएगा, वह उपयुक्त प्रयोजनों के लिए सबसे भरोसेमंद हाथों में सौंप दिया जाएगा। मेरे व्यक्तिगत, निजी और अनन्य उपयोग में खर्च किया गया पैसा सही समय में राष्ट्रहित में ही जाएगा।

प्रकाशम ने अपने आचरण का औचित्य साबित करते हुए चिट्ठी का अंत अपनी देशभक्ति की घोषणा के साथ किया। उन्होंने लिखा कि शहरों और गांवों में मुझे सुनने के लिए जमा हजारों लोगों का असीम प्रेम और इस उम्र में भी निरंतर लंबी यात्रा के लिए प्रेरित करने वाली अमोघ शक्ति साबित करती है कि मेरे और राष्ट्र के बीच आपसी पहचान बढ़ रही है।

प्रकाशम की घोषणा ने गांधी और पटेल द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण सवालों को टाल दियाः यानी उन्होंने व्यक्ति और पार्टी के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया, और जो उपहार उन्होंने प्राप्त किया, उसकी सही गणना की बात टाल दी। इसलिए गांधी ने उन्हें अपने सभी मामलों के बारे में सच बताने को कहा। अप्रैल, 1946 के दूसरे सप्ताह में प्रकाशम गांधी और पटेल, दोनों से मिले, बाद में पश्चाताप स्वरूप पार्टी से मिली रकम में से कुछ राशि उन्होंने जमा करवा दी। लेकिन गांधी इससे पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने लिखा कि अगर वह वास्तव में माफी चाहते थे, तो उन्हें पूरी तरह से सार्वजनिक पद का त्याग करना चाहिए था। उनके अनुसार, 'चुपचाप सेवा करने वालों के लिए पर्याप्त अवसर है, जो अक्सर सुर्खियों में रहकर सेवा करने से कहीं ज्यादा बेहतर है।' पर प्रकाशम इस सबके लिए तैयार नहीं थे। अप्रैल, 1946 में उन्होंने मद्रास प्रेसिडेंसी के प्रधानमंत्री के तौर पर कामकाज संभाला।

नरेंद्र मोदी के लिए टी प्रकाशम एक नाम से अधिक अहमियत नहीं रखता। जबकि हाल के वर्षों में गांधी और पटेल की विरासत से खुद को जोड़ने की उन्होंने लगातार कोशिश की है। अपने भाषणों में उन्होंने इनकी प्रशंसा की है। मोदी ने सरदार पटेल की एक विशाल प्रतिमा बनाने का संकल्प किया है और महात्मा गांधी के जन्म दिन पर स्वच्छ भारत अभियान चलाया है।

लेकिन जिन पत्रों का मैंने उल्लेख किया है, वे दर्शाते हैं कि उपहार लेने के मामले में नरेंद्र मोदी बहुचर्चित गांधी और पटेल के खिलाफ भूले-बिसरे प्रकाशम के पाले में खड़े हैं। सरदार पटेल और महात्मा निश्चित रूप से प्रधानमंत्री का वह सूट पहनना मंजूर नहीं करते, एक तो इसलिए कि इसमें दिखावा था, और सबसे ज्यादा इसलिए कि उनका सिद्धांत था कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को किसी से निजी उपहार नहीं लेना चाहिए। यह तो कल्पना से भी परे है कि गांधी और पटेल उस सूट की नीलामी की इजाजत देते।


हालांकि प्रधानमंत्री के प्रशंसक उनके बचाव में एक तर्क देते हुए कह सकते हैं कि जो असीम प्रेम उस तोहफे में दिखाया गया है, वह राष्ट्र और मोदी के बीच बढ़ती आपसी पहचान का सुबूत है।

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