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हर सांस यह कहती है हम हैं तो खुदा भी है
गुलाम अली
Updated Sat, 08 Jun 2013 09:35 PM IST
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मुझसे एक सवाल अक्सर पूछते हैं लोग कि क्या गजल और गायिकी उस समाज से कोई रिश्ता नहीं रखतीं, जिसमें हम और आप रहते हैं। ऐसे सवाल मुझे असमंजस की स्थिति में डाल देते हैं।
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पीछे मुड़कर अपने अतीत को देखता हूं, तो स्पष्ट रूप से न वह तारीखें याद आती हैं, न साल और न ही वह दशक, जब गजल-गायिकी समाज से जुड़ी थी और फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि सब कुछ बिखर गया।
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गजल एक तरफ, सुर और सरगम दूसरी तरफ, महफिल का कोई पता नहीं। मुझे तो याद नहीं आता, फिर भी ऐसे सवाल सामने आते हैं, तो कुछ न कुछ जवाब भी ढूंढता हूं।
मेहदी हसन साहब ने भी ढूंढा होगा। उनसे पहले भी कई गायकों ने ऐसे सवालों से सामना किया होगा। एक गजल गाने वाला तो सरगम की साधना करता है, अल्लाह ताला की मर्जी होती है, तो शोहरत भी मिलती है, कद्रदान भी मिल जाते हैं।
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महफिल रोशन हो जाती है, लेकिन ऐसी साधना के वक्त कभी यह सोचने की फुरसत नहीं मिलती कि जिस गजल में एक दर्द है, एक सौंदर्य, एक प्यार, एक तड़प है और जिसे एक ख्वाब की तरह मैं सुरों में ढाल रहा हूं, उसे लोग किस रूप में ग्रहण कर रहे हैं, किस तरह समझ रहे हैं।
खासकर ऐसे युग या कहें कि वक्त में जहां टीवी से भी आगे, मोबाइल लोगों का वक्त, एकांत और धैर्य चुरा रहा हो। संस्कृति पर बातें करने वाले, समाज को समझने वाले समझते हैं कि अब ‘गजल’ जिंदगी में हाशिये की चीज होकर रह गई है। ऐसी बात सिर्फ आज की नहीं है। कल भी थी। आगे भी रहेगी।
लेकिन गायिकी को खासकर शुद्ध गायिकी को इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता। मैं किसी गजल को जब पहली बार सुरों में ढाल रहा होता हूं, तो यह सोचकर कभी आगे नहीं बढ़ता कि उसे कितने लोग पसंद करेंगे। यह मेरा काम नहीं है।
जब मैंने पहली बार ‘चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है’ गाया था, तो शायद उस महफिल में 100 लोग भी नहीं थे। फिर रेडियो लाहौर ने उसे हजारों लोगों तक पहुंचाया। निकाह फिल्म में उस गजल को रखा गया और एक वक्त ऐसा भी आया कि दुनिया के किसी मुल्क की किसी महफिल में गया, लोगों ने एक ही फरमाइश की...‘चुपके-चुपके रात-दिन’... तो गजल न तो एक दिन में समाज से जुड़ती है और न ही एक रात में समाज से कट जाती है। 55 साल से गा रहा हूं।
अपनी गाई हुई हर गजल से प्यार है। लेकिन कुछ गजल ऐसी होती हैं कि लोगों की जुबान पर चढ़ जाती हैं- जैसे ‘कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा’ या ‘इतने मुद्दत बाद मिले हो’, लोगों को बहुत पसंद आया। इसमें रेडियो और फिल्मों का खासकर भारतीय फिल्मों का बड़ा योगदान है।
मेरा मानना है कि गजल हमारी जिंदगी में क्या अहमियत रखती है, यह सवाल इस पर भी निर्भर है कि गजल हमारी जिंदगी में क्या उसी अंदाज में दखल दे पाती है जिस अंदाज में हम जीते हैं। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि कोई गीत, कोई गजल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं मानी जा सकती कि उसे समाज कितनी जल्दी अपना लेता है। हो सकता है कि इस साल का बेस्ट सेलर एलबम अगले साल किसी को याद भी न रहे।
लेकिन कई दशक पहले मेहदी साहब का गाया ‘दिल से उठता है कि जां से उठता है, ये धुआं सा कहां से उठता है’ आज भी हम क्यों गुनगुनाते हैं? जाहिर है किसी भी किस्म की कला से एक कटाव तो हर समाज में होता रहा है और इस कटाव को जिस दिन हम भर लेंगे तब शायद गजल की जरूरत ही नहीं बचेगी।
बहरहाल, आज के युग में जिसे अब साइबर युग कहने लगे हैं, उसमें भी मेरे जैसे कलाकारों को सुनने वाले हैं। पाकिस्तान में सलीम कौसर और हिंदुस्तान में मुमताज राशिद जैसे शायर हैं, तो गजल का आने वाला कल यकीकन बहुत खूबसूरत है। जब तक हूं, साधना में लगा रहूंगा। ऐसे में मुझे अक्सर अकबर इलाहाबादी के लफ्ज याद आते हैं-‘हर सांस ये कहती है, हम हैं तो खुदा भी हैं।’