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विश्लेषण: पाकिस्तान में फलस्तीन, जर्मनी के राजदूत को इसलिए करना पड़ा कड़े विरोध का सामना

Sat, 04 May 2024 06:50 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Sat, 04 May 2024 06:50 AM IST
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सार
पाकिस्तान में इस्राइल के विरोध का आलम यह है कि शांति कार्यकर्ता अस्मा जहांगीर की स्मृति में होने वाले शांतिपूर्ण वार्षिक सम्मेलन में भी इस्राइल समर्थक जर्मनी के राजदूत को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल जर्मन राजदूत की उग्र प्रतिक्रिया के भी कई अर्थ निकाले जा रहे हैं।
 
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German Ambassador Alfred Grannas face strong Criticism in Pakistan Due to being pro-Israel
पाकिस्तान का झंडा - फोटो : ANI

विस्तार

पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग की पहली महिला प्रभारी गीतिका श्रीवास्तव समेत इस्लामाबाद में एक दर्जन से ज्यादा महिला राजदूत हैं। इन राजनयिकों की मौजूदगी से यह संदेश जाता है कि पाकिस्तान किस तरह से महिला राजनयिकों की सुरक्षा करता है। राजदूतों के अलावा हरेक दूतावास में कई विदेशी एवं स्थानीय महिलाएं कार्यरत हैं। आम तौर पर ये राजनयिक तब भी सुरक्षित महसूस करती हैं, जब वे बैठकों या कार्यक्रमों में पाकिस्तानियों से मिलती हैं। आम पाकिस्तानी स्वभाव से विनम्र होते हैं और यहां आने वाले विदेशी या भारतीय पर्यटक इस बात को समझते हैं और इसकी पुष्टि भी करते हैं।



लेकिन इस हफ्ते लाहौर में यह सब कुछ बदल गया, जहां दुनिया की प्रसिद्ध वकील और शांति कार्यकर्ता अस्मा जहांगीर की याद में उनकी लॉ कंपनी और उनकी बेटियों ने एक बेहद लोकप्रिय सालाना कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। पिछले पांच वर्षों से अस्मा जहांगीर की स्मृति में होने वाला यह आयोजन दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गया है, जिसमें पाकिस्तानी प्रतिभागी, विदेशी राजदूत और विदेशी प्रतिनिधि भी भाग लेते हैं। इस वर्ष भारतीय मीडिया का एक प्रतिभागी भी शामिल था।


यह सम्मेलन इसलिए भी प्रसिद्ध हुआ, क्योंकि यह ऐसी दुर्लभ जगह है, जहां असंतुष्ट और वैसे लोग भी, जिन्हें बोलने का अवसर या स्थान नहीं मिलता, स्वतंत्र रूप से खुलकर अपनी बात रख सकते हैं, जिन्हें दुनिया सुनती है। अतीत में कई बार सरकारी अधिकारियों, राजनेताओं एवं यहां तक कि न्यायाधीशों के भाषण के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा बाधा डाली गई है। यही इस सम्मेलन की खूबसूरती है, जहां हर कोई बोलने के लिए स्वतंत्र है।

इस बार कार्यक्रम में 'दक्षिण एशिया में नागरिक अधिकारों की सुरक्षा' विषय पर एक सत्र था और प्रतिभागियों में जर्मन राजदूत अल्फ्रेड ग्रेनास भी थे, जो इस्लामाबाद में सबसे वरिष्ठ राजनयिक हैं। इन दिनों जर्मनी गाजा युद्ध में इस्राइल के समर्थन के लिए चर्चा में है। पाकिस्तान और अन्य मुल्कों में भी जर्मनी के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं और उस पर इस्राइल का समर्थन करके फलस्तीनियों के नरसंहार में सहयोग करने का आरोप लगाया जा रहा है।

हर जगह, विशेष रूप से अमेरिका में छात्र सरकारी नीतियों का विरोध कर रहे हैं, विशेषकर उन नीतियों का, जो इस्राइल का समर्थन कर रही हैं। इसलिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी कि सम्मेलन में युवा छात्र प्रदर्शनकारियों ने जर्मन राजदूत के भाषण में बाधा डाली। एक युवा प्रदर्शनकारी ने चिल्लाकर कहा, 'माफ कीजिएगा राजदूत महोदय, मैं आपके इस दुस्साहस से हैरान हूं कि आप यहां नागरिक अधिकार की बात करने आए हैं, जबकि आपका मुल्क फलस्तीनियों के अधिकारों के लिए बोलने वालों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार कर रहा है।' उसकी इस बात का कई लोगों ने समर्थन किया।

यूरोपीय देशों के कई राजदूतों ने भी उसी मंच से भाषण दिया, लेकिन उनके भाषणों में कोई बाधा नहीं डाली गई। उनमें कई महिला राजदूत भी थीं। कई लोगों ने अपनी सीट से खड़े होकर कहा, 'नदी से समुद्र तक' फलस्तीन को स्वतंत्र करो। असल में 'नदी से समुद्र तक' एक राजनीतिक वाक्यांश है, जो जॉर्डन नदी और भूमध्यसागर के बीच के क्षेत्र को बताता है, जिसे फलस्तीन माना जाता है।

लेकिन जर्मन राजदूत की प्रतिक्रिया सबसे हैरान करने वाली थी, जैसे यह उनके लिए अविश्वसनीय था कि कोई उनके भाषण में रुकावट डालेगा और गाजा युद्ध में जर्मनी की भूमिका के खिलाफ प्रदर्शन करेगा। कोई सोच सकता था कि जर्मन राजदूत रुककर थोड़ा मुस्कराएंगे और फिर प्रदर्शनकारी से विनम्रता से बैठने के लिए कहेंगे और सवाल-जवाब के सत्र में सवालों का स्वागत करेंगे। वह भी यह जानते थे कि ऐसे व्यवधान को हमेशा आयोजक या तो शांत करा देते हैं या प्रदर्शनकारी को हॉल छोड़कर चले जाने के लिए मना लेते हैं।

लेकिन ऐसा करने के बजाय जर्मन राजदूत बेहद नाराज हो गए और अपनी बांहें फड़काते हुए प्रदर्शनकारी की तरफ इशारा करते हुए गुस्से में बोले, 'यदि तुम चिल्लाना चाहते हो, तो बाहर चले जाओ, वहां तुम चिल्ला सकते हो, लेकिन चिल्लाना विमर्श नहीं है। यदि तुम विमर्श करना चाहते हो, तो यहां आओ। हम चर्चा करेंगे, लेकिन चिल्लाओ मत। चिल्लाना कोई अच्छी बात नहीं है, तुम्हें शर्म आनी चाहिए।'

मंच पर बैठे हुए कुछ राजदूतों और अन्य लोगों ने जर्मन राजदूत से शांत होने और अपना भाषण आगे बढ़ाने के लिए कहा, लेकिन वह इतने ज्यादा गुस्सा थे कि सुन ही नहीं रहे थे। चूंकि इस सम्मेलन का लाइव प्रसारण हो रहा था, इसलिए पूरे पाकिस्तान ने उनका भयावह गुस्सा देखा और जर्मन राजदूत का व्यवहार देखकर लोग हैरान थे। तुरंत आयोजकों ने उस प्रदर्शनकारी को धक्के देकर बाहर निकाल दिया।

अचानक जर्मन राजदूत की उग्र प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और पाकिस्तानियों ने पूछा कि क्या यह जर्मनी है, जो किसी को बाहर जाने के लिए कहता है। एक्स पर एक व्यक्ति ने टिप्पणी की, 'जर्मन कूटनीति के लिए यह अच्छी बात नहीं है। पश्चिमी देशों में इस तरह के व्यवधान अपवाद नहीं, बल्कि आदर्श बन जाएंगे।' सभी टीवी चैनलों एवं अगले दिन अखबारों ने भी इस घटना को प्रमुखता से जगह दी। युवा पाकिस्तानी इतिहासकार और कार्यकर्ता अम्मार अली जान भी जर्मन राजदूत के व्यवहार से बहुत नाराज थे-‘जर्मन राजदूत पाकिस्तानियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्याख्यान देते हैं, जबकि जर्मनी सरकार गाजा पर किसी भी चर्चा को प्रतिबंधित करती है।’

कराची में भी ब्रिटिश उच्चायुक्त के आवास पर भी एक अन्य घटना घटी। पाकिस्तानी शास्त्रीय नृत्यांगना एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा केरमानी ने गाजा में संघर्ष विराम के लिए आवाज उठाई, तो उन्हें कार्यक्रम छोड़ने के लिए कहा गया और बाहर निकाल दिया गया।

जो मुल्क गाजा युद्ध में इस्राइल का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें लगातार ऐसे विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ेगा और दुनिया भर में उनके राजदूतों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ेगा। वरिष्ठ राजनयिक होने के बावजूद जर्मन राजदूत ने जैसी प्रतिक्रिया दी, वह कूटनीति की विफलता है।

 

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