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उत्तराखंड : जीईपी से पता चलेगा विकास की दौड़ में कितना खोया... कितना जोड़ा

anil prakash joshi अनिल प्रकाश जोशी
Updated Thu, 01 Aug 2024 06:40 AM IST
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सार
उत्तराखंड में जीडीपी की तर्ज पर जीईपी का आना एक मिसाल है। विकास कार्यों में प्राकृतिक संसाधनों को चोट पहुंचती ही है, लेकिन सरकार इनकी भरपाई के लिए जो कदम उठा रही है, वे कितने प्रभावी हैं और विकास की दौड़ में जो खोया, उसे बेहतर करने की क्या कोशिशें हुईं, यह जीईपी से ही पता चल सकेगा।
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GEP will reveal how much has been lost in the race for development... how much has been added
सीएम धामी ने लांच किया जीईपी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाल के समय में देश और दुनिया में करीब 86 फीसदी लोगों ने प्रचंड गर्मी को झेला। इस गर्मी के पीछे समुद्र का बढ़ता तापमान और उसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग  सबसे बड़ा कारक है। बीती 22 जुलाई अब तक का दुनिया का सबसे गर्म दिन था। समस्या यह है कि सही समय पर मौसम के मिजाज का पता नहीं चलता। और सबसे बड़ी बात यह है कि कब कहां किस रूप में बारिश हो जाए और कहां बाढ़ आ जाए और कब तूफान घेर ले, अब यह सब कुछ नियंत्रण से बाहर चला गया है।



दरअसल, जीडीपी की दौड़ में कोई भी देश पीछे नहीं छूटना चाहता। जाहिर है कि जब-जब प्रकृति और पर्यावरण के सवाल खड़े होते हैं, तो सभी देशों का यही मानना होता है कि हम अपने हिस्से का विकास कैसे त्याग दें, जब दुनिया के बड़े-बड़े देश कहीं बेहतर स्थिति में खड़े हैं। विकास अपनी जगह है, लेकिन समस्या यह है कि देश-दुनिया की सरकारों ने कभी भी ऐसा लेखा-जोखा नहीं दिया, जिससे पता चले कि कितना खोया और कितना जोड़ा। उल्लेखनीय है कि हम सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तर्ज पर सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) जैसे सूचकांक को लाकर समझ सकते हैं कि हमको पर्यावरण को सुरक्षित करने की दिशा में अभी कितना कार्य करना चाहिए। अमेरिका के एक मिस्टर साइमन थे, जिन्होंने 1935 से 40 के बीच में जीडीपी का विचार दिया था और उनका मानना यह था कि आर्थिक वृदि्ध तथा विकास को मापने का  बेहतर मापदंड जीडीपी है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि इसको संपूर्ण सूचक न माना जाए। उनका इशारा साफ था कि जीडीपी प्रकृति के हालात की सूचक नहीं हो सकती।


2010 में एक विचार उठा कि सरकारें जंगल जोड़ने और हवा-मिट्टी-पानी को बेहतर करने के लिए भी कटिबद्ध हैं और वे ऐसा करती भी हैं, लेकिन वह कितना कर पाईं, उसका कोई सामूहिक सूचक भी नहीं है। शुरुआत में सभी ने इस मुद्दे पर रुचि दिखाई, लेकिन बाद में सब ठंडे पड़ गए। 2013 में केदारनाथ त्रासदी ने सबको झकझोर दिया, और उत्तराखंड के पर्यावरण को लेकर देश भर में चर्चाएं होने लगीं। तब राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने जीईपी को लेकर बैठक कर इसे सरकारी स्वीकार्यता प्रदान की। शुरुआती दौर में इसके लिए एक तरफ सरकार ने कमेटी बनाई, जिसमें प्रमुख शोध संस्थाओं के निदेशकों के साथ डॉ. आरके पचौरी भी थे, जो उस समय टेरी  के अध्यक्ष थे। यही नहीं,  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबारों खास तौर से अमर उजाला ने इसके लिए लामबंदी की। पर दुर्भाग्य से तत्कालीन मुख्यमंत्री के बदलने के बाद फिर इसमें शिथिलता आ गई।
2018 में नैनीताल उच्च न्यायालय ने भी इसे संज्ञान में लिया और अदालत के आदेशों को स्वीकारते हुए सरकार ने भी जीईपी के लिए स्वीकृति प्रदान की। लेकिन बड़ा सवाल यह था कि क्या जिन समीकरणों से जीडीपी की गणना की जाती है, वही जीईपी की गणना में भी काम आएंगे। देश की विभिन्न शोध संस्थाओं से संपर्क साधा गया।

दुर्भाग्यवश सभी के पास एक ही अमेरिकी सूत्र था कि जीईपी की गणना पारिस्थितिकी सेवा की तरह की जाए। लेकिन, पारिस्थितिकी सेवा में हर साल हवा, मिट्टी, जंगल और पानी के जोड़े जाने की सूचना नहीं मिलती, जबकि जीईपी इसका ही सूचक है। थक हार के हैस्को और उसके साथियों ने स्वयं ही इसका बीड़ा उठाया और जीईपी का एक समीकरण बनाया। लेकिन सवाल यह भी था कि क्या इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकारा जाएगा। इसके लिए दो चरणों में काम किया गया। अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए इसे प्रतिष्ठित शोध पत्रों में छपने के लिए भेजा गया और साथ में राष्ट्रीय स्तर में इसकी स्वीकार्यता के लिए देश की शोध पत्रिकाओं में।

स्विट्जरलैंड के शोध जर्नल इकोलॉजिकल इंडिकेटर ने इस विचार को स्वीकारते हुए इसे स्थान दिया। इसी कड़ी में देश की प्रमुख शोध पत्रिका डाउन टू अर्थ ने भी इसको स्थान दिया। इस सफलता के बाद उत्तराखंड के संबंधित विभाग से आंकड़े एकत्रित किए गए, जिनके आधार पर दुनिया की पहली जीईपी तैयार की गई।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, जो लगातार पारिस्थितिकी और आर्थिक समन्वय की बात करते रहे हैं, उन्होंने इसे लॉन्च किया।  इस तरह  दुनिया में उत्तराखंड पहला राज्य बना, जिसने अपनी पारिस्थितिकी आंकड़े का लेखा-जोखा पब्लिक फोरम में प्रस्तुत किया। राज्य की पहली जीईपी के अनुसार यह राज्य 0.9 फीसदी की दर से अपने पारिस्थितिकी तंत्र में सकारात्मकता की ओर है। हालांकि, यह बहुत सुखदपूर्ण तो नहीं है, लेकिन इससे बहुत ज्यादा हताश भी नहीं हुआ जा सकता। ये  कम से कम तीन से चार फीसदी की दर में होगी, तो ये एक सुरक्षित पारिस्थितिकी की ओर इशारा करेगी।  इसकी गणना सूक्ष्म तरीके से की गई। उदाहरण के लिए, वनों में कितने वृक्ष इस वर्ष लगे और कितने वृक्ष विभिन्न विकास कार्यों के लिए गिराए गए, कितने वृक्ष प्राकृतिक वजहों से खत्म हुए, आने वाले वर्षों में प्राकृतिक वजहों से मरने वाले वृक्षों का संभावित औसत इत्यादि इन सभी को जीईपी के समीकरण में शामिल किया गया। वृक्षों को एक से तीन तक की रैंकिंग भी दी गई।

जीईपी में ट्री वेटेज निकाला गया, जो वर्तमान में 17 हजार है, जबकि एक बेहतर ट्री वेटेज 30 से 50 हजार होना सुरक्षित माना जाता है। इसी कड़ी में कितनी मिट्टी का ऑर्गेनिक ट्रीटमेंट किया गया, प्राण वायु को कितना बेहतर किया, कितना पानी जोड़ा इत्यादि सभी पहलुओं की गणना कर राज्य की पहली जीईपी सामने आई। दरअसल, देश चाहे कोई भी हो, विकास कार्यों को करने में वन काटे जाते हैं और प्राकृतिक संसाधनों को भी चोट पहुंचती है, लेकिन सरकार इनकी भरपाई के लिए जो कदम उठा रही है, वे कितने प्रभावी हैं, यह जीईपी से पता चलता है। यह राज्यों व केंद्र सरकार के पारिस्थितिकी प्रयत्नों के लेखे-जोखे का एक प्रयोग है, जो इसलिए भी जरूरी है ताकि यह दर्शाया जा सके कि विकास में जो भी खोया, उसको बेहतर करने की कोशिश भी हुई है। जीईपी के आंकड़े जब हमारे सामने होंगे, तभी हम संतुलित विकास की बात कर सकेंगे और दुनिया के सामने एक मिसाल पेश कर सकेंगे।

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