जानना जरूरी है: गंगा-सरस्वती-लक्ष्मी का एक-दूजे को शाप... भक्तों के दर्शन और स्पर्श से मुक्ति मिलने की कथा
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विस्तार
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा, ये तीनों श्रीहरि की भार्या हैं। एक बार सरस्वती को संदेह हो गया कि श्रीहरि गंगा से अधिक प्रेम करते हैं, तो पहले उन्होंने श्रीहरि को कड़े शब्द कहे और फिर गंगा के साथ कठोर बर्ताव करने लगीं। यह देखकर लक्ष्मी ने उनको रोक दिया। इस पर सरस्वती ने लक्ष्मी को शाप दे दिया, ‘तुम वृक्षरूपा और नदीरूपा हो जाओगी।’ शाप सुनकर भी लक्ष्मी के मन में सरस्वती के लिए क्रोध उत्पन्न नहीं हुआ।
परंतु गंगा से यह देखा नहीं गया। उन्होंने पलटकर सरस्वती को शाप दे दिया, ‘तुम भी नदीरूपा होकर मर्त्यलोक में चली जाओ, जहां पापी लोग निवास करते हैं।’ गंगा का शाप सुनकर सरस्वती को गंगा पर क्रोध आ गया और उन्होंने गंगा को भी शाप दे दिया, ‘तुम्हें भी धरातल पर जाकर पापियों के पाप को अंगीकार करना पड़ेगा।’ इसी बीच श्रीहरि वहां आ गए। वह लक्ष्मी से बोले, ‘शुभे! तुम राजा धर्मध्वज के घर पधारो। परंतु किसी की योनि से उत्पन्न न होकर तुम स्वयं भूमंडल पर प्रकट होना। वहीं तुम वृक्षरूप में निवास करोगी। फिर ‘शंखचूड’ नामक एक असुर मेरे अंश से उत्पन्न होगा, तुम्हें उसकी पत्नी बनना है। भारतवर्ष में त्रिलोकपावनी ‘तुलसी’ के नाम से तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। लेकिन अभी तुम्हें शाप के कारण भारत में ‘पद्मावती’ नदी बनकर उतरना है।’
इसके बाद श्रीहरि ने गंगा से कहा, ‘तुम्हें सरस्वती के शापवश विश्वपावनी नदी बनकर भारतवर्ष में जाना है। भगीरथ की तपस्या से तुम्हें वहां जाना पड़ेगा और लोग तुम्हें भागीरथी कहेंगे। समुद्र मेरा अंश है। तुम उसकी पत्नी होना स्वीकार कर लेना।’ फिर श्रीहरि बोले, ‘सरस्वती, अपने पूर्ण अंश से ब्रह्मलोक जाकर उनकी कामिनी बनेंगी, गंगा अपने पूर्ण अंश से शिवलोक जाएंगी और लक्ष्मी अपने पूर्ण अंश से मेरे पास रहेंगी।’ यह कहकर भगवान श्रीहरि चुप हो गए।
- इसके बाद गंगा, लक्ष्मी और सरस्वती, तीनों देवियां एक-दूसरे का आलिंगन करके रोने लगीं। फिर उन्होंने श्रीहरि से अपने-अपने शाप को दूर करने का उपाय और प्रायश्चित के विषय में पूछा।
श्रीहरि भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हैं। तीनों देवियों की प्रार्थना सुनकर विष्णु बोले, सरस्वती, कला के एक अंश से नदी बनकर भारतवर्ष में जाएं, आधे अंश से ब्रह्मा के भवन पर पधारें तथा पूर्ण अंश से मेरे पास रहें। ऐसे ही गंगा भगीरथ के प्रयास से अपने कलांश से भारतवर्ष में जाएं और स्वयं पूर्ण अंश से मेरे पास रहें। वहां इन्हें शंकर के मस्तक पर रहने का दुर्लभ अवसर भी प्राप्त होगा। लक्ष्मी, अपनी कला के अंश से भारतवर्ष में जाएं तथा ‘पद्मावती’ नदी और ‘तुलसी’ वृक्ष के रूप में विराजमान हों। कलि के पांच हजार वर्ष पूर्ण हो जाने पर तुम तीनों देवियों का उद्धार हो जाएगा और तुम मेरे भवन पर लौट आओगी। अब मैं तुम्हारी शुद्धि का उपाय बताता हूं। मेरे मंत्रों की उपासना करने वाले बहुत-से संत तुम्हारे जल में स्नान करने के लिए आएंगे। उस समय तुम उनके दर्शन और स्पर्श प्राप्त करके सब पापों से छुटकारा पा जाओगी।’
लक्ष्मी ने कहा, ‘प्रभो! आप उन भक्तों के लक्षण बतलाइए, जिनके स्पर्श से अहंकारी, धूर्त, शठ एवं अधम मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं; जिनके चरणों की धूलि से पृथ्वी का कल्मष दूर होता है, क्योंकि विष्णु भक्त पुरुषों का समागम संपूर्ण प्राणियों के लिए लाभदायक है।’
श्रीहरि बोले, ‘भक्तों के लक्षण श्रुति एवं पुराणों में छिपे हैं। इनमें पापों का नाश करने, सुख देने तथा मुक्ति प्रदान करने की शक्ति है। जिसे सद्गुरु से विष्णुमंत्र प्राप्त है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है। मेरा गुणगान सुनने से शरीर पुलकित हो उठता और वाणी गदगद हो जाती है और व्यक्ति अपनी सुध-बुध खो बैठता है। मेरी सेवा में नियुक्त रहने के कारण सुख, मुक्ति, अथवा अमरत्व-कुछ भी पाने की अभिलाषा शेष नहीं रह जाती। मनु, इंद्र एवं ब्रह्मा की उपाधि तथा स्वर्ग का राज्य-ये सभी परम दुर्लभ हैं, किंतु मेरा भक्त स्वप्न में भी इनकी इच्छा नहीं करता। ऐसे बहुत-से भक्त भारतवर्ष में निवास करते हैं। उनके दर्शन और स्पर्श से आपको इन शापों से मुक्ति मिल जाएगी।’ श्रीहरि के वचन सुनकर तीनों देवियां प्रसन्न हुईं और अपने-अपने शाप को भोगने के लिए निकल पड़ीं।