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नया दौर: विकसित भारत के एजेंडे में गांधीवाद, बापू के आदर्शों को पीएम मोदी ने किया मूर्त

Wed, 02 Oct 2024 07:03 AM IST
शिव शुक्ला सुमित्रा गांधी कुलकर्णी
सुमित्रा गांधी कुलकर्णी Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 02 Oct 2024 07:03 AM IST
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सार
नरेंद्र मोदी ने वास्तव में गांधीजी के आदर्शों को आधुनिक भारत के विकास के एजेंडे में फिर से जीवंत कर दिया है। आजादी के बाद ही जो काम पूरे हो जाने चाहिए थे, वे अब हो रहे हैं।
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Gandhism in agenda of developed India, PM Modi embodied Bapu's ideals
महात्मा गांधी - फोटो : ट्विटर @@rashtrapitaa

विस्तार

जब जून 2024 में नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, तो मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। महात्मा गांधी या बापूजी जैसा कि मैं उन्हें बुलाती हूं, वह मेरे दादा थे। मैं उनके साथ 19 वर्ष की आयु तक रही, अब मैं 95 वर्ष की हो गई हूं और मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की तुलना गांधीजी से करने और अपने विचारों को कलमबद्ध करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। मैंने अपने लंबे जीवनकाल में बहुत सारे नेताओं को जाना है, लेकिन नरेंद्र भाई के साथ मेरा जुड़ाव असाधारण है। इसकी शुरुआत वर्ष 1975 के आपातकाल के चुनौतीपूर्ण दौर में हुई थी। हालांकि मुझे वास्तविक रूप से वह क्षण याद नहीं है, लेकिन नरेंद्र भाई उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक युवा और ऊर्जावान प्रचारक थे।



1970 के दशक में अलगाववाद देश के ताने-बाने को खा रहा था। गुजरात से राज्यसभा सदस्य के रूप में पाकिस्तान से भारी घुसपैठ के कारण सीमावर्ती जिलों में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तन से मैं बहुत चिंतित थी। असम में यह घुसपैठ बहुत ज्यादा थी। उस समय मेरी पार्टी कांग्रेस ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है कि किस प्रकार नरेंद्र भाई उस समय कम उम्र में भी ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते थे। वह उन दिनों भी ग्रामीण महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों-व्यक्तिगत स्वच्छता; स्वच्छ पेयजल; प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल आदि से पूरी तरह परिचित थे। उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद अनुकरणीय साहस का परिचय दिया और स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में राष्ट्रीय स्वच्छता की आवश्यकता को स्पष्ट किया।


उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान की नींव रखी, जिससे स्वच्छता में काफी सुधार हुआ और इसके साथ ही पूरे देश में महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा में भी बढ़ोतरी हुई। मेरे दादाजी ‘जन आंदोलन’ में विश्वास करते थे, क्योंकि लोगों के इस प्रकार के आंदोलन स्थायी सामाजिक परिवर्तन का आधार हैं। नरेंद्र भाई का ‘सबका’ शब्द पर अटूट विश्वास है, जैसे कि सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और विकसित भारत। कोविड-19 महामारी के दौरान उनका ‘मानवता सर्वप्रथम’ युक्त नेतृत्व देश की सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने संपूर्ण विश्व को अपने दायरे में समाहित कर लिया। उन्होंने हमें अनुच्छेद 370 की घुटन भरी स्थिति से मुक्त किया। वह व्यवस्थित रूप से उस एजेंडे को पूरा कर रहे हैं, जिसे आजादी हासिल होने के बाद पूरा किया जाना चाहिए था। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) इसका एक उदाहरण है।

बापूजी और नरेंद्र भाई में सबसे बड़ी समानता, दोनों की जड़ों में आध्यात्मिकता है। दोनों में श्रीमद्भगवद्गीता में बताए गए स्थितप्रज्ञ के लक्षण स्पष्ट दिखते हैं। विपक्ष द्वारा किए जाने वाले व्यक्तिगत हमलों पर भी चुप्पी साधे रहना नरेंद्र भाई के राजऋषि होने की निशानी बयां करता है। उन्होंने राजनीतिक लाभ से ऊपर सदैव राष्ट्रीय हितों को रखा है। यदि आज बापूजी जीवित होते, तो वह नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े समर्थक होते। और उन लोगों को हिदायत देते, जिन्होंने उनका नाम तो हड़प लिया, पर अपने राजनीतिक लाभों के लिए देश व समाज को विभाजित करना ही उनका उद्देश्य बन गया है। नरेंद्र मोदी ने वास्तव में गांधीजी के आदर्शों को आधुनिक भारत के विकास के एजेंडे में फिर से जीवंत कर दिया है।
(लेखिका महात्मा गांधी की पोती हैं।)

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