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उत्तर और दक्षिण के गांधीवादी...जानिए इन्होंने हमें क्या सिखाया

Sun, 06 Jun 2021 05:17 AM IST
रामचंद्र गुहा रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 06 Jun 2021 05:17 AM IST
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Gandhians of North and South, read Ramchandra Guha article
Sunderlal Bahuguna - फोटो : facebook

मई के एक अकेले हफ्ते में तीन शानदार भारतीयों का निधन हो गया। ये सभी महात्मा गांधी से गहरे तक प्रभावित थे, हालांकि उनमें से प्रत्येक ने अपने गांधीवाद को अलग तरह से और अलग भौगोलिक क्षेत्रों में अभिव्यक्त किया। उनमें से एक उम्र के आठवें दशक में थे, दूसरे नौवें दशक में और तीसरे ने इस ग्रह में सौ वर्ष से अधिक का समय व्यतीत कर लिया था। लिहाजा उनकी मृत्यु पर शोक जताने के साथ ही हमें उनके जीवन का उत्सव भी मनाना चाहिए।


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इन गांधीवादियों में सबसे पहले विदा लेने वाले उत्तराखंड के सुंदरलाल बहुगुणा थे। 1973 में जब ऊपरी अलकनंदा घाटी में चिपको आंदोलन शुरू हुआ, तब तक बहुगुणा सामाजिक कार्यों में कई दशक बिता चुके थे। चिपको के शुरुआती प्रदर्शनों का नेतृत्व चंडी प्रसाद भट्ट ने किया था, बहुगुणा के शब्दों में वह आंदोलन के 'मुख्य संचालक' थे। चमोली जिले में महिलाओं और पुरुषों ने जो कुछ किया, उससे प्रेरित होकर बहुगुणा चिपको के विचार को अपने गृह क्षेत्र में स्थित गंगा की महान धारा भागीरथी की घाटी में ले आए। यहां उन्होंने हरे-भरे वृक्षों को गिराए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया और जंगलों में लंबे उपवास किए।

सुंदरलाल जी से मैं पहली बार 1981 में कोलकाता में मिला था। मैंने तब चिपको पर अपनी पीएच.डी. के लिए शोध शुरू ही किया था और वह उस शहर में इसी विषय पर बोलने के लिए आए थे। वह मोहक और दमदार वक्ता थे और आसानी से हिंदी और अंग्रेजी, दोनों में अपनी बात रख रहे थे (निस्संदेह वह अपनी मातृभाषा गढ़वाली में कहीं और अधिक मोहक और दमदार वक्ता थे)। इसके दो साल बाद मैंने बदयार घाटी में जमीनी कार्य किया और उस दौरान उनके एक बड़े आंदोलन में हिस्सा ले चुकीं महिला किसानों के साक्षात्कार लिए। शोध के दौरान मैं चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा, दोनों का ही प्रशंसक बन गया। दिल्ली के पत्रकारों और विद्वानों में उन दोनों में से किसी एक को चिपको का 'वास्तविक' और 'सच्चा' नेता बताने की होड़ मची हुई थी। सच्चाई यह है कि  दोनों ने आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा उनके झुकाव भिन्न जरूर थे, मगर एक दूसरे के पूरक।

सुंदरलाल बहुगुणा की तरह ऊर्जा, साहस, बुद्धिमत्ता और करिश्मे से लैस एक और गांधीवादी उनके निधन के पांच दिन बाद नहीं रहे। यह थे, कर्नाटक के एच एस दुरईस्वामी। 1936 की गर्मियों में जब गांधी नंदी हिल्स में स्वास्थ्य लाभ के लिए आए थे, तब एक छात्र के रूप में दुरईस्वामी ने उनसे मुलाकात की थी। इसके छह साल बाद दुरईस्वामी ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रिंसली स्टेट मैसूर में अहम भूमिका निभाई थी और जेल में काफी वक्त गुजारा था।

1950 और 1960 के दशक में दुरईस्वामी ने सर्वोदय आंदोलन में काम किया और भूमि वितरण पर ध्यान केंद्रित किया। हालांकि जब 1975 में आपातकाल लगाया गया, तब वह सामाजिक कार्य छोड़कर एक्टिविज्म में आ गए, नतीजतन उन्हें स्वतंत्र भारत की सरकार ने उसी तरह से जेल में डाल दिया, जैसा कि उसके सामंती और औपनिवेशक पूर्ववर्ती ने जेल में डाला था।

एच एस दुरईस्वामी से मैं पहली बार 1980 के दशक में तब मिला था, जब मैंने मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्पलेक्स द्वारा पश्चिमी घाट में की जा रही पर्यावरण की बर्बादी के खिलाफ उनके नेतृत्व में हो रहे प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। मेरी उनसे आखिरी मुलाकात हुई थी, पिछले साल मार्च में।  अपनी अन्य तमाम उपलब्धियों के बावजूद, स्वतंत्र भारत में गांधीवादी आंदोलन ने हिंदुत्व बहुसंख्यकवाद के उदय से गणतंत्र के लिए उत्पन्न खतरे पर कभी भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। (सुंदरलाल बहुगुणा कई मौकों पर विश्व हिंदू परिषद से भी जुड़े)। इस लिहाज से एच एस दुरईस्वामी अपवाद थे। उन्होंने 102 वर्ष की उम्र में अनैतिक नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ अपना आखिरी आंदोलन किया था।

दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में पुलिस दमन का सामना करने में छात्रों (विशेषकर महिला छात्रों) द्वारा दिखाए गए अनुकरणीय साहस से प्रेरित होकर, सौ बरस से अधिक के गांधीवादी ने खुद सार्वजनिक विरोध करने का फैसला किया। मार्च, 2020 में उन्होंने एक खुली जगह में शामियाना लगाकर हजारों मित्रों और शुभचिंतकों के साथ बैठकर धरना दिया। मैं भी उन्हें सुनने के लिए वहां गया था। द हिंदू ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, 'दुरईस्वामी ने सीएए को घनघोर पक्षपाती बताते हुए उसे हमारे देश के बुनियादी सिद्धातों के बरक्स अनैतिक करार दिया। उन्होंने कहा, मुस्लिमों ने भारतीय बनकर रहना पसंद किया। उनसे अब उनकी नागरिकता को साबित करने के लिए नहीं कहा जा सकता। सरकार की पक्षपाती नीतियों का विरोध करने से मैं राष्ट्रविरोधी नहीं हो जाऊंगा। हमें सरकार, राज्य और देश के बीच फर्क करने की जरूरत है।'

सुंदरलाल बहुगुणा और एच एस दुरईस्वामी, दोनों ही सार्वजनिक रूप से सहज थे। इन दोनों से अलग मिजाज के एक अन्य गांधीवादी का निधन बहुगुणा के निधन के बाद और दुरईस्वामी के निधन से पहले हुआ। उनका नाम था के एम नटराजन। उन्होंने अपने गृह राज्य तमिलनाडु में गांधीवादी भावना को सराहनीय रूप से मूर्त रूप दिया। नटराजन जी एक्टिविस्ट के बजाय रचनात्मक कार्यकर्ता अधिक थे। एक छात्र के रूप में गांधी से प्रभावित होकर वह 1956-57 में भूदान आंदोलन को प्रोत्साहित करने के लिए तमिलनाडु से होकर गुजरी विनोबा भावे की लंबी पदयात्रा में शामिल हो गए थे। इसके बाद उन्होंने अपना बचा जीवन ग्रामीण जीर्णोद्धार में लगाने का निर्णय लिया।

उन्होंने अन्य चीजों के अलावा जातिगत भेदभाव खत्म करने, खादी और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने और मंदिरों की जमीन को भूमिहीन श्रमिकों में वितरित करने  की दिशा में काम किया। उनके इस अभियान में उनके करीबी लोगों में एक शानदार जोड़ा शंकरलिंगम और कृष्णनम्मल जगन्नाथन तथा खादी पहनने वाले अमेरिकी राल्फ रिचर्ड कैथन शामिल थे। 1996 में मैंने गांधीवादी अर्थशास्त्री जे सी कुमारप्पा के बारे में एक अखबार में लेख लिखा था। इस पर मदुरै से एक व्यक्ति का पत्र मुझे मिला, जिन्होंने खुद कुमारप्पा के साथ करीब से काम किया था। इसके कई साल बाद आर आर कैथन के जीवन के बारे में शोध के दौरान मुझे पता चला कि नटराजन भी उन्हें अच्छी तरह से जानते थे। लिहाजा मैं उनकी सलाह लेने के लिए मदुरै पहुंच गया। सर्वोदय कार्यालय में चाय पीते हुए नटराजन जी ने मुझे कैथन के जीवन से जुड़ी कई चीजें बताईं।

इन तीन शख्सियतों के बारे में विचार करते हुए मैंने देखा कि उनमें से प्रत्येक हमें क्या सीख दे सकते हैं। बहुगुणा ने हमें सिखाया कि मनुष्य प्राकृतिक दुनिया से न तो अलग है और न ही श्रेष्ठ है, इसलिए हमें अपने अस्तित्व के लिए शेष सृष्टि का सम्मान करना चाहिए। दुरईस्वामी ने हमें सिखाया कि जाति, वर्ग, लिंग या संप्रदाय के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव न केवल भारतीय संविधान के बुनियादी सिद्धातों के बरक्स अनैतिक है, बल्कि यह शालीनता और मानवता के भी खिलाफ है।

नटराजन ने हमें सिखाया कि सच्ची आत्मनिर्भरता की शुरुआत व्यक्तिगत रूप से, अपने परिवार और अपने समुदाय के साथ काम करने से होती है, ग्रामीण स्थिरता के लिए स्थानीय कार्रवाई हमारे ग्रह के भविष्य के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने से संबंधित अंतरराष्ट्रीय समझौते। उन तीनों को एक साझा डोर बांधे हुए थी। बहुगुणा, दुरईस्वामी और नटराजन गहराई से अपने गृह जिले, अपने गृह प्रदेश से जुड़े हुए थे और भारत और दुनिया में उनकी गहरी रुचि थी। वे लोकली काम करते हुए ग्लोबली सोचते थे। मेरा विशेषाधिकार है कि मैं उन सबको जानता था।

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