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गांधी और कश्मीर : आज वह होते, तो कश्मीर समस्या पर क्या कहते?

Thu, 03 Oct 2019 12:06 AM IST
गोविंद सिंह गोविंद सिंह
गोविंद सिंह Published by: गोविंद सिंह Updated Thu, 03 Oct 2019 12:06 AM IST
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Gandhi & Kashmir
Mahatma Gandhi - फोटो : Mahatma Gandhi

यदि आज गांधी होते, तो वह कश्मीर समस्या पर क्या कहते? इस तरह के काल्पनिक सवालों और उनके स्व-कल्पित समाधानों की इन दिनों भरमार है। गांधी जी सिर्फ एक बार 31 जुलाई, 1947 को कश्मीर गए थे। उससे पहले दो बार उनके कश्मीर जाने का संयोग बना था, पर वह जा नहीं पाए थे। लेकिन जब भारत का विभाजन तय हो गया था और विभिन्न रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलय का विकल्प दिया जा रहा था, तब कश्मीर से आ रही अफवाहें गांधी जी को चिंतित कर रही थीं। उन्हें नहीं लगता था कि महाराजा हरि सिंह पाकिस्तान के साथ जाने का फैसला लेंगे। कश्मीर की जनता को भी वह समझते थे।


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पर कश्मीर का प्रधानमंत्री रामचंद्र काक पाकिस्तान समर्थक था। जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला भी महाराजा से नफरत करते थे। अंग्रेजों का खेल तो भारत के खिलाफ था ही। इसलिए दिल्ली में अफवाहें फैलाई गईं कि महाराजा जम्मू-कश्मीर को आजाद रखना चाहते हैं, हालांकि यह झूठ था। महाराजा के मन की टोह लेने गांधी श्रीनगर गए। शेख अब्दुल्ला महाराजा के खिलाफ बगावत भड़काने के आरोप में जेल में बंद थे। इसलिए उनकी बेगम ने उनकी अगवानी की। महाराजा की तरफ से न्योता लेकर रामचंद्र काक भी उनसे मिले। गांधी भले पहली बार कश्मीर गए हों, पर कश्मीरियों के मन को भांपने में उन्हें देर नहीं लगी। एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, ‘जब देश सांप्रदायिक आग में झुलस रहा है, मुझे कश्मीर में आशा की किरण दिखाई दे रही है। यहां हिंदुओं और मुसलमानों में भेद करना मुश्किल है। आप लोग एक भाषा बोलते हैं और आपकी एक संस्कृति है।‘ कश्मीर के मुसलमान बेहद प्रगतिशील थे और वे पाकिस्तान के साथ जाने के खिलाफ थे।

एक अगस्त की शाम को ही गांधी ने महाराजा से मुलाकात की। उस मुलाकात के बाद अफवाह काफी हद तक दूर हुए। रामचंद्र काक को बर्खास्त कर दिया गया। जनता के मूड को देखते हुए महाराजा ने तत्काल निर्णय न लेकर शायद कुछ समय मांगा। तीन महीने बाद लंदन के अखबार टाइम्स ने लिखा, ‘मुस्लिम प्रदेश के हिंदू राजा को भारत में विलय के लिए मनाने में वक्त लगा। गांधी की यात्रा के बाद ही वह माने।'

उसके बाद जो हुआ, वह सबके सामने है। 11 सितंबर, 1947 को गांधी जी ने कहा, ‘बताया जा रहा है कि कबायली सेना गांवों को लूटते हुए घुस आई है। वह श्रीनगर की तरफ बढ़ रही है। रास्ते में जो बिजली के संयंत्र हैं, उन्हें भी नष्ट कर दिया गया है, ताकि श्रीनगर तक बिजली न पहुंचे। पाकिस्तान की मदद के बिना यह नहीं हो सकता। इसलिए केंद्र सरकार ने कश्मीर की मदद के लिए फौज भेजकर अच्छा ही किया।‘ चार जनवरी, 1948 की एक प्रार्थना सभा में गांधी जी ने कहा, ‘कश्मीर ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर दस्तखत किए हैं। निश्चित परिस्थितियों में उसने ऐसा किया। यदि पाकिस्तान इस तरह से कश्मीर को डराता-धमकाता है, और यदि कश्मीर के नेता भारत सरकार से मदद मांगते हैं, तो भारत सरकार को मदद देनी होगी। इसीलिए उसने पहले ऐसा किया भी।...साथ ही, पाकिस्तान से बार-बार यह आग्रह किया जा रहा है कि वह कश्मीर से बाहर हो जाए और भारत सरकार के साथ समझौता करे। यदि दोनों देशों के बीच कोई समझौता नहीं होता है, तो युद्ध अवश्यंभावी है।‘
यानी गांधी युद्ध से डरते नहीं। वह न्याय की, सत्य की बात करते हैं। सत्य की रक्षा के लिए युद्ध जरूरी है, तो उससे परहेज कैसा!

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