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कहां तक जाएगा पाबंदियों का यह खेल
तवलीन सिंह
Updated Mon, 04 Feb 2013 08:21 AM IST
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जो मैं कहने जा रही हूं इस लेख में, शायद कुछ सेक्यूलर मिजाज के लोगों को अच्छा नहीं लगेगा। लेकिन कहना जरूरी हो गया है कि जितना सम्मान मुसलमानों को इस देश में मिलता है, किसी अन्य गैर इस्लामी मुल्क में नहीं मिलता है इन दिनों।
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जब से जेहादी आतंकवादियों ने जंग छेड़ी अमेरिका पर हमला करके, मुसलमानों को शक की नजरों से देखा जाता है हर जगह। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर जिनका लिबास या नाम इस्लामी होता है, उनके साथ बर्ताव ऐसा होता है, जैसे कि उनकी जिम्मेदारी हो साबित करने की कि वे जेहादी नहीं हैं। पर बुतपरस्तों के इस देश में ऐसा बिल्कुल नहीं है।
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पिछले दशक में जेहादी हमले भारत के कई शहरों में हुए, लेकिन एक बार भी इनकी वजह से दंगे नहीं छिड़े। न ही मुसलमानों के रीति-रिवाजों पर पाबंदी लगी है। कट्टरपंथी वहाबी इस्लाम का असर बढ़ा है इस देश के मुसलमानों में, पर किसी ने इसको रोकने की कभी कोशिश नहीं की।
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इसके बावजूद भारत के मुसलमान अपने आपको इतना असुरक्षित महसूस करते हैं कि पिछले सप्ताह कमल हासन की नई फिल्म विश्वरूपम पर तमिलनाडु सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, और पश्चिम बंगाल की सरकार ने सलमान रुश्दी को कोलकाता आने से रोक दिया। दोनों राज्य सरकारों ने स्पष्ट किया कि मुसलमानों के जज्बातों को ध्यान में रखकर ऐसा किया गया था।
सवाल यह है कि किसी लोकतांत्रिक देश में इस तरह की पाबंदियां लगाना ठीक है या गलत। क्या ऐसी पाबंदियों से लोकतंत्र की जड़ें कमजोर नहीं हो जाती हैं? लोकतंत्र जीवित है इन बुनियादी सिद्धांतों पर कि हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है बिना किसी प्रतिबंध के अपनी बात कहने-लिखने का और अपने ईश्वर को पूजने का।
इन बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांतों को इतना कमजोर कर दिया गया है सेक्यूलरिज्म के नाम पर कि इस देश में लोकतंत्र कमजोर होता जा रहा है। कभी हिंदुओं के जज्बातों को लेकर एम एफ हुसेन जैसे महान चित्रकार को देश छोड़कर भागना पड़ा, तो अब कमल हासन दुखी होकर कह रहे हैं कि उन्हें ऐसे देश की तलाश है, जो सेक्यूलर हो।
इस बीच उत्तर भारत में विश्वरूपम रिलीज हुई, और जिन्होंने यह फिल्म देखी है, उनका कहना है कि इसमें ऐसी कोई चीज नहीं है, जिससे किसी की भावनाएं आहत होती हों। मजे की बात यह है कि हॉलीवुड की कई फिल्में दिखाई गई हैं हमारे यहां के सिनेमाघरों में, जिनमें जेहादियों को खलनायक के रूप में पेश किया गया है। तब क्यों नहीं ठेस पहुंची किसी के जज्बातों को?
इससे भी बड़ा सवाल यह है कि पाबंदियों का यह खेल कहां तक जाएगा। इस देश की परंपरा में इतनी विविधता है कि हर दूसरे दिन किसी समूह की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है। तो क्या बंद कर दें सारे सिनेमाघर? जेल में डाल दें सारे लेखकों और बुद्धिजीवियों को? जब आशीष नंदी जैसे समाजशास्त्री को गिरफ्तार करने की नौबत आ गई, तो कौन बच सकता है!
इसलिए शायद समय आ गया है लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को याद करने का। समय आ गया है इनको मजबूत करने का, इनको स्पष्ट करने का कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में कोई जगह नहीं है किसी पाबंदी के लिए। साथ-साथ यह भी साफ करने का कि जो लोग हिंसा का रास्ता चुनते हैं, उनको सीधे जेल भेज दिया जाएगा, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई।
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने जो दलील दी है कानून-व्यवस्था को खतरा होने की, वह बेबुनियाद है, गलत है। उनकी सरकार की जिम्मेदारी है कानून-व्यवस्था कायम रखने की, उन लोगों को गिरफ्तार करने की, जिन्होंने सिनेमाघरों को जला देने की धमकी दी है। वर्ना वह वक्त दूर नहीं, जब भारत में लोकतंत्र ही खत्म हो जाएगा।
एक तरफ तो हमारे राजनेता लोकतंत्र के गुण गाते फिरते हैं उन देशों में, जहां लोकतंत्र नहीं है, और दूसरी तरफ रोज उसे नुकसान पहुंचाते हैं कोई न कोई नई बेड़ी उसके पांव में बांधकर। दोनों चीजें इकट्ठा नहीं हो सकतीं। अगर इस बात को साफ शब्दों में कहने से किसी के जज्बातों को ठेस पहुंचती है, तो उनको मेरा सुझाव है कि वे अपने जज्बातों को काबू रखने की आदत डालें या ऐसे देश में जाकर बस जाएं, जहां लोकतंत्र की अहमियत धर्म-मजहब से कम है।