रेटिंग एजेंसियों का खेल
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प्राचीन काल से ही व्यक्ति, संस्था और देश की रेटिंग होती आई है। आधुनिक समय की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की शुरुआत 1837 के वित्तीय संकट के बाद एक विडंबना के साथ हुई। ऐसी एजेंसियों की जरूरत तब किसी व्यापारी के कर्ज चुका पाने की क्षमता के आकलन और आंकड़ों के संकलन के लिए की गई थी। ऐसी पहली एजेंसी लेविस टप्पन द्वारा न्यूयार्क में 1937 में बनाई गई। इसके बाद बाजार के बारे में स्वतंत्र जानकारी की मांग भी उठने लगी, जिसमें कर्ज चुकाने की क्षमता की भरोसेमंद जानकारी हो। मूडीज की रेटिंग के प्रकाशन धीरे-धीरे औद्योगिक फर्म और सेवा प्रदाताओं के बारे में साख-आधारित पत्र देने पर केंद्रित होते गए। 1924 तक रेटिंग संसार के तीन बड़े नाम (फिच, स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स समेत) कंपनी के तौर पर निगमित हो चुके थे, जिनका आज प्रतिस्पर्धा-विहीन क्रेडिट मार्केट के 95 फीसदी हिस्से पर कब्जा है। 1933 का ग्लास-स्टीगल ऐक्ट पारित होने से सिक्योरिटी के कारोबार को बैंकिंग से अलग करने में मदद मिली। इसके द्वारा अमेरिकी बैंकों को सिर्फ रेटिंग वाले ग्रेडेड बॉन्ड में निवेश करने की इजाजत दी गई। ग्लोबल बॉन्ड मार्केट (सरकारी बॉन्ड समेत) को भी रेटिंग के दायरे में लाए जाने के बाद 1960 तक ऐसी रेटिंग का विस्तार कॉमर्शियल पेपर और बैंक जमा पर भी कर दिया गया। बाद में इसका विस्तार ग्लोबल बॉन्ड मार्केट की रेटिंग तक हो गया। इस दौरान बिजनेस मॉडल में मामूली बदलाव करते हुए ये एजेंसियां निवेशक और रेटिंग की जाने वाली इकाई, दोनों से फीस लेने लगीं।
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वैश्विक वित्तीय बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद रेटिंग एजेंसियां अब भी अक्सर अनुचित और अशुद्ध रेटिंग के आरोपों के कारण भरोसा कायम कर पाने में नाकाम हैं। अमेरिकी न्याय विभाग ने 1996 में मूडीज द्वारा अनुचित दबाव डालने के आरोप की जांच की। एनरॉन के दिवालिया होने और अमेरिका के सबप्राइम संकट के बाद इन एजेंसियों को दुनिया भर में मुकदमों का सामना करना पड़ा। मूडीज पर कई देशों में रेटिंग प्रोटोकॉल का पालन न करने के कारण जुर्माना लगा। अमेरिका के सबप्राइम संकट में अपनी आपराधिक भूमिका में कार्रवाई से बचने के लिए मूडीज ने 86.40 करोड़ डॉलर जुर्माना भरा था। उस पर अनुचित रेटिंग के लिए यूरोप में 12 लाख यूरो और हांगकांग में 14 लाख हांगकांग डॉलर का जुर्माना लगा।
भारत में भी रेटिंग एजेंसियों का रिकॉर्ड मिला-जुला है। एमटेक ऑटो और रिको इंडिया का मामला याद किया जा सकता है, जिनमें सेबी ने रेटिंग एजेंसियों की जांच की थी और नियम व डिस्क्लोजर मानक कड़े किए गए थे। 2011 से 2015 के दौरान रिको इंडिया की देनदारियां बिना अचल परिसंपत्तियों में बढ़ोतरी के बढ़ गई थीं और कंपनी ने सितंबर, 2015 तिमाही के नतीजे की घोषणा में भी देरी की थी। भारतीय रेटिंग एजेंसियों ने एमटेक ऑटो को-एक ऐसी फर्म, जो 800 करोड़ के बॉन्ड के पुनर्भुगतान में डिफॉल्टर होने के कगार पर भी-एए की रेटिंग दे दी। उसके फौरन बाद इसकी रेटिंग में कई गुना गिरावट आना तय था। भूषण स्टील और जयप्रकाश इंडस्ट्रीज को भी दिवालिया होने से पहले सभी एजेंसियों द्वारा इनवेस्टमेंट ग्रेड की रेटिंग दी गई थी। इन रेटिंग एजेंसियों का वैश्विक असर होने के कारण एक से दूसरे देश में पूंजी के प्रवाह से कई राष्ट्रों का वित्तीय भाग्य प्रभावित होता है, जैसा पूर्वी एशिया संकट के दौरान देखने को मिला था।
हाल में यूनान, पुर्तगाल और आयरलैंड को ‘जंक’ स्टेटस में डाल जेने के साथ ही अमेरिकी और यूरोपीय सरकारी कर्ज की डाउनग्रेडिंग किए जाने की आलोचना हुई है। इससे सरकारी कर्ज का संकट पैदा होने के साथ बेरोजगारी बढ़ी और यूरो जोन को अस्थिरता का सामना करना पड़ा। 1997 के एशियाई वित्तीय संकट का आकलन न कर पाने और संकट के दौरान इन देशों की एकदम से ग्रेडिंग घटाने के लिए इन एजेंसियों की आलोचना हुई थी। भारत की आर्थिक उपलब्धियों को नजरंदाज करना और इसको भारत की रेटिंग से जोड़कर न देखना ऐसा मुद्दा है, जो अधिकांश भारतीय अर्थशास्त्रियों को खटकता है। एजेंसियों के मनमाने बर्ताव के कारण ही रूस और चीन को अपनी रेटिंग एजेंसी बनाने का फैसला लेना पड़ा था-स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स ने क्रीमिया के विलय के बाद रूसी सरकार को साल 2014 में जंक स्टेटस से बस एक पायदान ऊपर रख दिया था, जिसे रूस ने राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया था। कई देश बुनियादी खामियों के बाद भी ऐसी रेटिंग को बहुत ज्यादा महत्व देते हैं। हितों के टकराव को देखें, तो ऐसी रेटिंग एजेंसियां अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा गैर-रेटिंग गतिविधियों से कमाती हैं, और अपने रेटिंग व गैर-रेटिंग कारोबार को अलग रखती हैं। फिर भी एक ही प्रबंधन होने के कारण मुनाफे की तलाश के दौरान चुपके से हितों का टकराव अपनी जगह बना लेता है।
आरपी बघाई और बो बेकर ने 2016 में अपनी रिपोर्ट नॉन-रेटिंग रेवेन्यू ऐंड कॉनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट में बताया है कि रेटिंग एजेंसी, संबंधित इकाई को गैर-रेटिंग सेवाओं के साथ अच्छी रेटिंग दिलाने का लालच देती हैं। हमें हर हाल में ऐसी रेटिंग एजेंसियों का इस्तेमाल कॉरपोरेट सेक्टर में साफ-सफाई के लिए करना चाहिए। निवेशकों के हित की सुरक्षा के लिए सेबी रेटिंग एजेंसियों को अपने ग्राहक को कम मुनाफे पर भी गैर-रेटिंग सेवाएं देने से रोकने के लिए आदेश देने की संभावनाएं तलाश सकता है। तयशुदा ऑपरेटिंग फीस मॉडल पर भी विचार किया जा सकता है, ताकि गुणवत्ता से समझौता कर ‘सबसे कम बोली लगाने वाले को’ फायदा पहुंचाने की संभावना खत्म हो। शानदार रेटिंग देने, फिर अचानक रेटिंग गिरा देने के मामलों की निगरानी जरूरी है। कॉरपोरेट्स को भी ऑडिटर की तरह नियमित रेटिंग एजेंसी बदलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। वित्तीय फैसले सबको रोजगार उपलब्ध कराने और अर्थव्यवस्था का विकास करने की भावना से प्रेरित होने चाहिए, न कि दरवाजे-दरवाजे भटकते हुए रेटिंग पाने की आशा से।