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भविष्य का खतरा: पर्यावरण विनाश और छठा विध्वंस

Sat, 05 Jun 2021 03:28 AM IST
VIR SINGH वीर सिंह
वीर सिंह Published by: VIR SINGH Updated Sat, 05 Jun 2021 03:28 AM IST
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Future Threat: Environmental Destruction and the Sixth Demolition
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

हम समय के किसी न किसी वृहत काल खंड, जिसे युग कहते हैं, में रह रहे होते हैं। भारतीय संस्कृति एवं साहित्य की धाराओं में चार युगों की महिमा-गाथाएं लिखीं हैं, और जिस युग में हम रह रहे हैं, यानी कलयुग, उसे सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर श्रेष्ठता के क्रम में निम्नतम माना गया है। कलयुग के निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण मोड़ से होते हुए हम 'सामूहिक प्रजाति विलुप्तीकरण युग' में प्रवेश कर चुके हैं। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की निरंतर बढ़ती सांद्रता और जलवायु परिवर्तन के समाचारों की बाढ़ के साथ धरती पर जीवन के इस कठिन काल की सबसे बड़ी और भयावह सच्चाई सतह पर आने ही लगी थी कि कोरोना के कोलाहल ने उसे दबा दिया, और अब तो लगता है, जैसे संकट बस मानव प्रजाति पर ही है। अपनी पुलित्जर पुरस्कार से अलंकृत पुस्तक द सिक्स्थ एक्सटिंक्शन में लेखिका एलिजाबेथ कोलबर्ट का तर्क है कि पृथ्वी के आकार और वातावरण की संरचना में भारी परावर्तन करके मनुष्यों ने छठे सामूहिक विलोपन को गति दी है, जो हमारी (मानव) प्रजाति के लिए भारी पड़ सकती है।


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इंटरगवर्नमेंटल साइंस पॉलिसी प्लेटफार्म ऑन बायोडायवर्सिटी ऐंड इकोसिस्टम सर्विसेज की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में लगभग दस लाख जीव प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है। इस बहुचर्चित रिपोर्ट में बताया गया है कि मानव गतिविधियों के कारण पृथ्वी के भू-भाग का 75 प्रतिशत, महासागरों का 66 प्रतिशत और आर्द्र पारिस्थितिक तंत्रों का 85 प्रतिशत भाग पूरी तरह से परिवर्तित हो गया है और पर्यावरण पर उसका बुरा प्रभाव पड़ा है। इससे धरती की कुल लगभग 80 लाख प्रजातियों में से दस लाख प्रजाति लुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। कुछ पारिस्थितिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि 21वीं शताब्दी के अंत तक धरती की 50 प्रतिशत प्रजातियां काल के गाल में समा जाएंगी। 

जीव प्रजातियों का विलुप्त होना अपरिवर्तनीय है और निस्संदेह, पृथ्वी की जैव विविधता से संबंधित सबसे गंभीर मुद्दा है। एक बार जब कोई प्रजाति पृथ्वी की गोद से सदैव के लिए चली जाती है, तो उसके डीएनए में निहित मूल्यवान जानकारी भी साथ चली जाती है। एक प्रजाति लुप्त होती है, तो कई अन्य परस्पर संबंधित प्रजातियों का अस्तित्व भी मिट जाता है। पर यहां तो असंख्य प्रजातियों का अस्तित्व दांव पर लगा है। पृथ्वी पर संपूर्ण जीवन के आदि से अर्वाचीन तक के इतिहास पर वैज्ञानिक दृष्टिपात करें, तो अब तक जीव प्रजातियों के महाविनाश की पांच घटनाएं घटित हो चुकी हैं और छठे महाविनाश का घंटा बज चुका है। जीवों के महाविनाश का यह युग शनैः शनैः अपने चरम पर पहुंचेगा। पहले पांच महाविनाश मनुष्य प्रजाति के प्रादुर्भाव से पहले हुए हैं। छठे की पटकथा मनुष्य ने लिखी है और उसका नायक भी वही है। 

प्राचीन मानव अपना भोजन जंगलों से चुनता था। समय के साथ वह जंगलों का सफाया करके घास-प्रजाति के पौधों (जैसे गेहूं, चावल, मक्का आदि) से अपना अधिकांश भोजन लेने लगा और खेती और पालतू पशुओं को सारे महाद्वीपों में फैला दिया। आदमी के खान-पान की संस्कृति ने धरती का चेहरा ही बदल दिया। भूमिगत ऊर्जा स्रोतों (कोयला और पेट्रोलियम) की खोज के साथ मनुष्य ने सबसे बड़ा और सबसे घातक परिवर्तन प्रारंभ किया, जिससे महासागरों, मिट्टियों और वातावरण की संरचना परिवर्तित होने लगी। कुछ पौधे और पशु, जिन्होंने नए परिवेश और नई जलवायु के अनुसार अपना अनुकूलन कर लिया, पलायन के उपरांत बच गए, लेकिन अधिकांश, संभवतः लाखों, पेड़-पौधे और पशु ऐसे हैं, जो नए परिवेश के अनुकूल न ढल सके, विलुप्त हो गए अथवा विलुप्तीकरण की दहलीज पर आ गए और अब उनके धरती से सदैव के लिए लुप्त होने की दर आसमान छू रही है। 

मनुष्य प्रजाति का उद्भव लगभग 3,15,000 वर्ष पूर्व अफ्रीका में हुआ माना जाता है। चार्ल्स डार्विन को उद्धृत कर अक्सर कहा जाता है कि बंदर आदमी के पूर्वज हैं, जब कि डार्विन ने ऐसा कभी न कहा और न ही अपनी दो प्रसिद्ध पुस्तकों -ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीसिज (1859) और द डिसेंट ऑफ मैन (1871) में कहीं ऐसा लिखा। विगत कुछ शताब्दियों में मानव प्रजाति ने धरती के जीवन और धरती पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। प्राकृतिक विकास की मानव प्राणी पर कुछ हटकर अनुकंपा रही होगी, तभी अपनी विशिष्ट संरचना, अपने मस्तिष्क की अद्भुत क्षमताओं और अपने ज्ञानार्जन की पैनी जिज्ञासाओं के बल पर वह धरती ही नहीं, ब्रह्मांड पर भी अपना आधिपत्य स्थापित करता जा रहा है। मनुष्य वास्तव में प्राकृतिक विकास का उत्कर्ष है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमने एक नए भूवैज्ञानिक युग की रचना की है, जिसे कहते हैं मानव-निर्मित ग्रह-परिवर्तनकारी मानव-प्रधान भूवैज्ञानिक युग, अर्थात एन्थ्रोपोसीन। 

अपने अस्तित्व की लाखों साल की लंबी यात्रा में कोई भी प्रजाति अंततोगत्वा, अनिवार्य रूप से विलुप्त होती ही है, जो प्राकृतिक विकास का एक नियम है। यह प्राकृतिक विलुप्तीकरण कभी भी मानवीय चिंताओं का विषय नहीं रहा है। जैव मंडल की प्राकृतिक व्यवथाओं में अवांछनीय हस्तक्षेप कर मनुष्य ने जीवों के नैसर्गिक विलुप्तीकरण की दर को, पारिस्थितिक शास्त्रियों के मतानुसार, 1,000 से 10,000 गुना तक बढ़ा दिया है, जो सबसे बड़ी चिंता का विषय है। मानव गतिविधियों से उत्पन्न विध्वंस का पहला संकेत 1980 के दशक में उभयचरों का विलुप्त होना था। पनामा में शोधकर्ताओं ने पहली बार देखा कि एक प्रतिष्ठित स्थानीय प्रजाति -गोल्डन फ्रॉग- मर रही थी। तब उन्हें यह भी आभास हुआ कि पूरी दुनिया से मेंढक विलुप्त हो रहे हैं।

वर्ष 2008 में उभयचर प्राणियों की संख्या में तेज गिरावट का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज  में प्रकाशित एक लेख में प्रश्न आया : 'क्या हम छठे सामूहिक विलुप्तीकरण के बीच में हैं?' लेखकों ने निष्कर्ष निकाला कि उभयचरों के विलुप्त होने की दर के आधार पर छठी विनाशकारी घटना चल रही है। जिन प्राणियों को भारी संकट का सामना करना पड़ रहा है, उनमें मुख्यतया स्तनधारी, पक्षी, सरीसृप, रीफ-बिल्डिंग कोरल और शार्क शामिल हैं। त्रासद यह है कि इस के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार है, जो कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। 

  -पूर्व प्रोफेसर, जी.बी. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय

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