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अब यहां से कहां जाएगी कांग्रेस

Thu, 22 May 2014 06:19 PM IST
अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Updated Thu, 22 May 2014 06:19 PM IST
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Future of Congress

कांग्रेस का दो अंकों में सिमटना इस चुनाव परिणाम का ऐसा पहलू है, जो भारतीय राजनीति में आमूल बदलाव का सूचक बन रहा है। ऐसी दुर्गति की कल्पना कांग्रेस के कट्टर दुश्मनों ने भी नहीं की होगी। हालांकि चुनाव अभियान के आगे बढ़ते ही स्पष्ट होने लगा था कि कांग्रेस एवं संप्रग अपनी बुरी पराजय की खाई में गिरने जा रही है। कांग्रेस के कई नेताओं ने चुनाव लड़ने से ही स्वयं को अलग कर लिया, तो यह अकारण नहीं था। महाराष्ट्र का चुनाव संपन्न होने के साथ ही मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने सेक्यूलरवाद के नाम पर किसी मोर्चे को समर्थन देने का विचार प्रकट किया था। बाद में महाराष्ट्र के परिणाम ने साबित कर दिया कि चव्हाण को कांग्रेस-राकांपा के सूपड़ा साफ होने का अनुमान लग गया था।

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राहुल गांधी ने यह कहकर, कि हम स्वयं सरकार बनाएंगे, नेता के नाते पार्टी का आत्मबल बनाए रखने की रणनीति अपनाई। अन्यथा अगर 10, जनपथ और उनके पास सही सूचना देने वालों की टीम होती, तो उन्हें भी जमीनी वास्तविकता का एहसास हो गया होता। कांग्रेस की यह दुर्गति हुई कैसे? सामान्य विश्लेषण यह है कि महंगाई रोकने में नाकामी, भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड खुलासे, सरकार के अंदर एकरूपता के अभाव से निकलते अराजकता के संदेश, बिगड़ती आर्थिक स्थिति-आदि ने जनता के मन में सरकार के प्रति केवल गहरी निराशा और विरोध का भाव पैदा किया।
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आखिर प्रधानमंत्री का मीडिया सलाहकार रहा जो व्यक्ति चुनाव के बीच अपनी किताब लेकर आता है और आरोप लगाता है कि सोनिया गांधी के सामने डॉ. मनमोहन सिंह लाचार थे, तो मतदाताओं के मन में सरकार एवं पार्टी की कैसी छवि बनेगी?
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नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर सबसे बड़ा हमला यह कहकर किया कि नेहरू-गांधी परिवार खुद जिम्मेदारी न लेकर अपने आदेशपाल के रूप में किसी को सरकार का नेतृत्व थमाता है। भाजपा जनता को यह समझाने में भी सफल रही कि आज देश की दुर्दशा इसलिए है, क्योंकि उस परिवार ने सरकार को काम नहीं करने दिया। कांग्रेस इसका जवाब देने में विफल रही। कांग्रेस की रणनीति ही गलत थी। आंध्र प्रदेश में उसे पिछले चुनाव में सबसे ज्यादा 33 सीटें मिली थीं। पर तेलंगाना गठन के बाद माहौल बदल गया, उसके मुख्यमंत्री तक ने नई पार्टी बना ली। इसी तरह तमिलनाडु में गठबंधन के कारण पिछली बार आठ सीटें मिलीं थी। गठबंधन न होने की स्थिति में इस बार उसकी पुनरावृत्ति संभव नहीं थी। यही पश्चिम बंगाल के बारे में भी सच था। राजस्थान और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में हार के बाद यहां संभावनाएं खत्म हो गई थीं।

राहुल गांधी अपने प्रति लोगों का भरोसा लौटाने, पार्टी को पटरी पर लाने के लिए योग्य नेताओं को टीम में लाने तथा कुछ लोगों को टीम से बाहर करने का काम कर नहीं पाए। उन्होंने कुछ अच्छे इरादे दिखाए, पर क्लास लेने का उनका तरीका कांग्रेसी नेताओं को भी पसंद नहीं आया। मोदी जैसे तीखे तेवर वाले आदमी के सामने राहुल टिक ही नहीं सके। प्रियंका ने जब अमेठी में प्रचार अभियान आरंभ किया, तो उनसे आशा जगी, पर जब उन्होंने मोदी पर निजी हमले आरंभ किए, तो इसके विरुद्ध नकारात्मक प्रतिक्रिया हुई।


कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तारतम्य का भी अभाव था। जब आम कार्यकर्ता या नेता का राहुल और सोनिया से मिलना तक कठिन हो, तो फिर उन्हें जमीनी वास्तविकता का एहसास होता भी कैसे? यह अकारण नहीं था कि सोनिया गांधी को एक दशक में पहली बार अमेठी में सभा करके यह कहना पड़ा कि मेरी सास ने आपको अपना बेटा दिया और मैंने अपना-इसका ख्याल रखिए। इससे यह संदेश गया कि संभवतः राहुल गांधी की अमेठी सीट भी फंस गई है। अब देखना होगा कि कांग्रेस ईमानदार आत्ममंथन करते हुए अपनी पराजय के कारण तलाशती है और नई शुरुआत के बारे में सोचती है या नहीं।

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