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एक लोकतांत्रिक क्रांति का पूर्ण होना
सुदीप ठाकुर
Updated Wed, 19 Aug 2015 09:21 PM IST
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सार्वजनिक जीवन खासकर सियासत में साख का क्या मतलब होता है, यह श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति और अभी प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर हो चुके महिंदा राजपक्षे से बेहतर भला कौन जान सकता है! श्रीलंका के संसदीय चुनाव में प्रचार के दौरान पिछले हफ्ते ही स्थानीय पत्रकारों से बात करते हुए राजपक्षे ने कहा था, 'आप हमें चाहे जो कह लें, लेकिन हम चोर नहीं हैं!' चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और राजपक्षे का प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में वापसी का सपना ध्वस्त हो चुका है।
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राष्ट्रपति रहते राजपक्षे का शासन भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की मिसाल बन गया था। उनके मंत्रिमंडल और अनेक सरकारी पदों पर उनके भाइयों, बेटे और अन्य रिश्तेदारों का कब्जा था। लेकिन राजपक्षे ने चुनाव के दौरान एक नया दांव चला था। उन्होंने सिंहली और बौद्ध मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिए दावा किया कि यदि विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री बनते हैं, तो लिट्टे को दोबारा सिर उठाने का मौका मिल जाएगा, क्योंकि विक्रमसिंघे और राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना तमिल नेशनल एलायंस (टीएनए) के साथ गठजोड़ कर सकते हैं। लेकिन करीब तीन दशक के हिंसक गृहयुद्ध के बाद पुनर्निर्माण में जुटे इस द्वीपीय देश के मतदाताओं ने नस्लीय संघर्ष को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
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दरअसल इस चुनाव में भारत सहित दुनिया की नजर रानिल विक्रमसिंघेे की अगुआई वाले गठबंधन की संभावित जीत से कहीं अधिक इस पर टिकी थी कि विगत जनवरी में राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले चुनाव कराने के बावजूद पराजित हो गए राजपक्षे कहीं वापसी तो नहीं करेंगे। राजपक्षे के लिए यह एक वर्ष में दूसरी बड़ी पराजय है। चुनाव में बेशक, विक्रमसिंघे की युनाइटेड नेशनल पार्टी को इतनी सीटें नहीं मिली हैं कि वह अपने दम पर सरकार बना लें, पर जनवरी में हुए चुनाव के बाद शुरू किए गए आर्थिक और राजनीतिक सुधारों को आगे ले जाने का अवसर उनके पास है। उन्हें राष्ट्रपति सिरिसेना का भी समर्थन है ही, जिनकी यूपीएफए (युनाइटेड पीपुल्स फ्रीडम एलायंस) में पकड़ राजपक्षे की पराजय से और मजबूत हो चुकी है।
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इस बात की भी प्रबल संभावना है कि राजपक्षे के कार्यकाल के दौरान हुए भ्रष्टाचार की जांच में और तेजी आ सकती है। अगले महीने ही युद्ध अपराध पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की रिपोर्ट भी आनी है, जिससे राजपक्षे की परेशानी और बढ़ सकती है। तो क्या श्रीलंका राजनीतिक विद्वेष के रास्ते पर चल पड़ेगा? जीत की ओर आगे बढ़ते विक्रमसिंघेे के इस बयान पर गौर करें, इस देश के मतदाताओं ने आठ जनवरी को हुई क्रांति को और मजबूत करने के पक्ष में मत दिया है, ताकि सुशासन और सहमति की नीतियों को आगे बढ़ाया जा सके। लेकिन इसके बावजूद श्रीलंका के साथ ही भारत को भी सतर्क रहने की जरूरत है कि दोबारा वहां नस्लीय हिंसा को भड़काने की कोशिशें न हों, जिसकी आशंका अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। नतीजों पर टिप्पणी करते हुए सिलोन टुडे ने याद दिलाया है कि जुलाई, 1977 में जयवर्धने को मिली ऐतिहासिक जीत के महीने भर बाद ही किस तरह तमिल विद्रोहियों ने दो पुलिस कांस्टेबल की हत्या कर दी थी, जिससे देश सिंहली-तमिल संघर्ष से उपजे गृहयुद्ध में उलझ गया था। नई सरकार को जीत के जश्न में इतिहास की इस घटना को नहीं भूलना चाहिए।