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बात निकली है तो दूर तलक जाएगी
शंकर अय्यर
Updated Tue, 18 Sep 2018 07:11 PM IST
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क्वात्रोची एवं माल्या
एक ध्वनि में इतनी ताकत होती है कि वह देश के पूरे राजनीतिक भूगोल में कंपन फैला सके। नवीनतम बयान लंदन से आया है। फिलहाल निर्वासन भोग रहे विजय माल्या ने सोच-विचार कर एक कानूनी कदम उठाया है, पर उस अदालत से बाहर, जहां उनके मामले की सुनवाई चल रही थी। उन्होंने बताया कि वह वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिले थे और लंदन जाने से पहले मामले का निपटारा करने का प्रस्ताव दिया था। वित्त मंत्री ने इस दावे को खारिज कर दिया है। इस खुलासे ने बहुतों को असहज कर दिया है।
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आरोपी के भाग जाने पर जिस तरह की बातें हो रही हैं, वे नई नहीं हैं। हर दशक में घोटाला करने वालों ने भागने के लिए व्यवस्था का दुरुपयोग किया है। तीन दिसंबर, 1984 की रात को जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस भोपाल के यूनियन कार्बाइड प्लांट से लीक हुई, जिसमें हजारों लोग मारे गए और उससे ज्यादा लोग जीवन भर के लिए अपंग हो गए। सात दिसंबर को एक सरकारी विमान ने एंडरसन को भोपाल से दिल्ली पहुंचाया, जहां से वह अमेरिका निकल गए। इस तरह हजारों प्रभावितों को न्याय नहीं मिल पाया। कानून के लंबे हाथ अपने ही तरीके से काम करते हैं और अंधी सुरंग में खो जाते हैं।
बोफोर्स सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप पर 1989 का चुनाव राजीव गांधी हार गए। बोफोर्स के नाम पर चुनाव जीतने वाले वीपी सिंह सिंह की सरकार का बिचौलियों पर कार्रवाई का दावा एक साल में ढह गया। कानून ने अपने तरीके से काम करना जारी रखा। जुलाई 1993 में स्विस अदालतों ने स्विस बैंक में खाताधारकों के नाम उजागर करने की अनुमति दी और उसमें ओट्टावियो क्वात्रोची का नाम था। यहां तक कि सीबीआई ने क्वात्रोची का पासपोर्ट जब्त करने के लिए अदालत में गुहार लगाई, लेकिन वह 29 जुलाई, 1993 को भाग गए। न तो एंडरसन और न ही क्वात्रोची को हथकड़ी लगाने की जरूरत समझी गई! व्यवस्था में कई खामियां हैं और इसका फायदा वे लोग उठाते हैं, जिनमें भागने की क्षमता है। इसमें हैरान होने वाली बात नहीं है। हैरानी इस बात की है कि व्यवस्था कैसे हैरानी जताती है। सीक्वल्स से प्यार करने और उनके निर्माण के मामले में हिंदी फिल्म उद्योग अकेला नहीं है। भारत का राजनीतिक परिदृश्य भी दोहरावों से भरा पड़ा है।
भगोड़े आर्थिक अपराधियों से संबंधित कानून पारित होने के तुरंत बाद 25 जुलाई, 2018 को सरकार ने संसद को सूचित किया कि सीबीआई के मुताबिक, बैंकों के साथ आर्थिक अनियमितता करने वाले भारतीयों के साथ-साथ जिनके खिलाफ पिछले तीन वर्षों में आपराधिक जांच (जो विदेश भाग गए हैं या विदेश में हैं) चल रही है, उनकी संख्या 23 है। इनमें दशक के बड़े-बड़े घोटालेबाजों के नाम हैं, जिनमें नीरव मोदी, नीशल मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या, जतिन मेहता और 18 अन्य शामिल हैं। फिर प्रवर्तन निदेशालय की भी सूची है, जिसमें ललित मोदी, विजय माल्या, जतिन मेहता, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी और आठ अन्य के नाम हैं। सरकार केवल ब्रिटेन में ही 16 भगोड़ों के खिलाफ प्रत्यावर्तन मामलों का पीछा कर रही है! और हर सीक्वल पुरानी बयानबाजी को फिर से दोहराने का अवसर देती है। 2010 में ललित मोदी ने, जिसने इंडियन प्रीमियर लीग की परिकल्पना की, टीमों के छद्म स्वामित्व से लेकर सट्टेबाजी तक के आरोप में खुद को घिरा पाया। अप्रैल, 2010 में बीसीसीआई ने उन्हें हटा दिया और जांच को लंबित करने के लिए निलंबित कर दिया। भारी आरोपों के बीच विभिन्न एजेंसियों द्वारा पूछताछ और आसन्न गिरफ्तारी की आशंका से मोदी लंदन चले गए। मार्च, 2011 में उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया गया। उन्होंने आरोपों से इन्कार करते हुए खुद को राजनीतिक दुश्मनी का पीड़ित बताकर शरण मांगी। उनके प्रत्यावर्तन की याचिका फरवरी, 2017 से लंबित है।
माल्या का मामला खराब उद्यम, सदाबहार कर्ज और जान-बूझकर कर्ज न चुकाने का विषय है। 2009 में विजय माल्या और किंगफिशर एयरलाइंस की गड़बड़ी सामने आई थी। नवंबर, 2010 में एयरलाइंस के घाटे में चलने की सूचना आई और उस पर 6,000 करोड़ रुपये का कर्ज बताया गया। नवंबर, 2011 में माल्या ने राहत की मांग की। 2009 से यह स्पष्ट हो गया था कि यह उद्यम नहीं चलने वाला। जुलाई, 2014 में किंगफिशर को एनपीए घोषित किया गया। अक्तूबर, 2015 में सीबीआई ने छापे मारे। माल्या ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल करने की कोशिश की और जब बैंकरों ने उनका पासपोर्ट जब्त करवाने की कोशिश की, तो वह लंदन भाग गए।
माल्या के भागने पर सरकार व विपक्ष के बीच ठन गई। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार ने माल्या को देश छोड़ने की इजाजत दी। भाजपा का आरोप है कि यूपीए और कांग्रेस ने बैकों को माल्या को कर्ज देने के लिए बाध्य किया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कांग्रेस ने क्वात्रोची को भागने दिया था। दूसरा आरोप उन्होंने यह लगाया कि कांग्रेस ने एंडरसन को सुरक्षित विमान उपलब्ध कराया। अगस्त, 2015 के ललित गेट मामले से यह अलग नहीं था। तब कांग्रेस ने मोदी के संबंधियों को छूट देने में सरकारी मंत्रियों की भूमिका पर सवाल उठाया, तो विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पलटवार करते हुए राहुल से कहा था कि वह क्वात्रोची के भागने के मामले में अपनी मां से पूछें और यह भी पूछें कि वारेन एंडरसन को भगाने से किसको लाभ हुआ। दोनों राष्ट्रीय पार्टियां एक-दूसरे पर पुराने आरोप लगा रही हैं।
फरवरी, 2018 में इतिहास फिर दोहराया गया, क्योंकि नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक के 14,000 करोड़ रुपये का घोटाला करके देश से भाग गए। उसके तुरंत बाद एक दूसरे निर्यातक मेहुल चोकसी ने भी देश छोड़ दिया। इस पर संसद में बयानबाजी हुई, जो मोदी और माल्या पर बहस जैसी ही थी। भाजपा ने राहुल गांधी पर नीरव मोदी के साथ बैठक करने का आरोप लगाते हुए कहा कि यूपीए ने चुनाव से पहले नीरव मोदी और चोकसी के लिए नियम से हटकर काम किए। कांग्रेस ने दावोस में मोदी की उपस्थिति का सबूत देकर बदला चुकाया।
राजनीतिक बयानबाजी, इतिहास के संस्करणों और तू-तू, मैं-मैं ने जवाबदेही की भावना को पटरी से उतार दिया है।
-लेखक आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के विजिटिंग फेलो हैं।