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खेती से बाजार की ओर

Thu, 10 Jul 2014 10:35 PM IST
देविंदर शर्मा/जाने-माने कृषि विशेषज्ञ
देविंदर शर्मा/जाने-माने कृषि विशेषज्ञ Updated Thu, 10 Jul 2014 10:35 PM IST
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from agriculture to market

मोदी सरकार के पहले आम बजट से साफ होता है कि देश की अर्थव्यवस्था की वर्तमान हालत के मद्देनजर वित्त मंत्री के सामने ज्यादा विकल्प नहीं थे। ऐसे में, बजट के जरिये सरकार ने यह संकेत दिया है कि आगे वह क्या करने जा रही है। देश में कृषि सुधार की बात लंबे समय से होती आई है। गौरतलब है कि देश की साठ फीसदी से ज्यादा आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर ही निर्भर है। मगर अमूमन देखा गया है कि खेती-किसानी करने वाले खेती के अलावा कुछ कर नहीं पाते। बजट में जिस कौशल विकास कार्यक्रम पर जोर दिया गया है, उसका फोकस गांवों के उन किसानों पर भी है, जिन्हें गांवों से निकालकर शहर लाने की बात लंबे समय की जाती रही है। जब गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ेगा, तो उनके लिए आवास ढूंढना एक बड़ी चुनौती होगा। बजट में इसी चुनौती से निपटने के लिए नए शहरों को बनाने की बात की गई है। किसानों को खेती से दूर कर उनके कौशल विकास की बात करने वाला बजट सरकार की आर्थिक सोच को समझने के लिए काफी है, साथ ही यह खेती के भविष्य का संकेत भी है।

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बजट में 500 करोड़ रुपये के मूल्य स्थिरीकरण कोष के गठन की बात भी की गई है। दरअसल सरकार की मंशा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को आहिस्ता- आहिस्ता खत्म करते हुए एक नेशनल मार्केट का विकास करने की है, जिससे निजी क्षेत्र और किसान बाजारों को बढ़ावा मिलेगा। गौरतलब है कि एमएसपी को महंगाई की एक बड़ी वजह माना जाता है। बजट के संकेतों को समझें, तो हम खेती से बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं।
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 किसानों को हेल्थ कार्ड मुहैया कराने के लिए 100 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। मगर बजट की सबसे अच्छी बात है कि इसमें भूमिहीन किसानों के लिए फंड की घोषणा की गई है। दरअसल यह कृषि से जुड़ा एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर सरकारों ने अब तक कम ही ध्यान दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेती और इससे जुड़ी परियोजनाओं के लिए ऋण मुहैया कराने के लिए आठ लाख करोड़ रुपये के फंड को जारी रखने की बात की गई है। मगर यह समझना होगा कि किसानों के लिए कुल ऋण की जो घोषणाएं की जाती हैं, उनका तकरीबन पांच प्रतिशत ही किसानों तक पहुंच पाता है, बाकी हिस्सा कृषि आधारित उद्योगों को जाता है। ऐसे उद्योग गांवों की तुलना में शहरों में कहीं ज्यादा होते हैं। यही वजह है कि चंडीगढ़ व दिल्ली जैसे शहरों में खेती का कर्जा झारखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार से ज्यादा है।
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साफ है कि किसानों के लिए बड़ी ऋण सुविधाओं की घोषणा से यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि वास्तव में इससे गरीब किसानों की मदद हो रही है। बजट में दो एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और दो हॉर्टीकल्चर यूनिवर्सिटी के गठन की बात की गई है। यूनिवर्सिटी के शोधों का तभी कोई मतलब है, जब इनसे खेती की तकनीक में कोई सुधार दिखे। इससे अच्छा होता कि पहले से स्थापित संस्थानों को बेहतर बनाने की कोशिश की जाती। नरेंद्र मोदी लंबे समय से मृदा स्वास्थ्य कार्ड और पूर्वोत्तर राज्यों को जैविक खेती का केंद्र बनाने की बात करते आए हैं। बजट में जैविक खेती के विकास के लिए 100 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए 1000 करोड़ रुपये का आवंटन अच्छा है, पर इसका उपयोग वाटरशेड मैनेजमेंट और सूक्ष्म खेती को बढ़ावा देने में भी हो, तो ज्यादा बेहतर होगा।

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