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स्वतंत्रता को कानून से मुक्त करें

Sun, 05 Jul 2020 03:09 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 05 Jul 2020 03:09 AM IST
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Free liberty from law
प्रतीकात्मक तस्वीर

यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो इसका मतलब है कि उसने कुछ गलत किया होगा। यदि उस व्यक्ति को जमानत देने से इन्कार कर दिया जाता है, तो इसका मतलब है कि उसे दोषी होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को न्यायिक हिरासत (यह पुलिस हिरासत से अलग है) में भेजा जाता है, तो इसका मतलब है कि उसे कारावास की सजा मिलनी चाहिए।


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यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो इसका मतलब है कि उसने कुछ गलत किया होगा। यदि उस व्यक्ति को जमानत देने से इन्कार कर दिया जाता है, तो इसका मतलब है कि उसे दोषी होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को न्यायिक हिरासत (यह पुलिस हिरासत से अलग है) में भेजा जाता है, तो इसका मतलब है कि उसे कारावास की सजा मिलनी चाहिए।

कुछ ठहर कर विचार करें, तो पता चलता है कि ये सारे निष्कर्ष स्पष्ट तौर पर गलत हैं। आजादी के रूप में जाने जाने वाले हमारे पवित्र अधिकार के प्रति हमारी बेरुखी और आजादी को कैसे नष्ट किया जा रहा है, इसके प्रति हमारी अज्ञानता मिनिसोटा, अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड और तमिलनाडु, भारत में जयराज तथा फेनिक्स की मौत का सबब बनी।

जयराज और फेनिक्स की मौत भारत में कथित हिरासत में मौत का पहला मामला नहीं है। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने पश्चिम बंगाल के डी के बसु नामक व्यक्ति और उत्तर प्रदेश के के जौहरी नामक व्यक्ति की चिट्ठियों पर हिरासत में उत्पीड़न की बार-बार हो रही कथित घटनाओं का संज्ञान लिया और 18 दिसंबर, 1996 को एक ऐतिहासिक फैसला दिया ( डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल, 1997)। इस फैसले की कई बार पुष्टि की गई है; इसके बावजूद दुखद है कि चौबीस सालों में कुछ भी नहीं बदला है।

कितनी सारी पुलिस

औसत व्यक्ति का भरोसा राज्य पर होता है कि राज्य उसके साथ अन्य व्यक्तियों जैसा ही व्यवहार करेगा और वह यह मानने को तत्पर होता है कि पुलिस अधिकारी, अभियोजक, मजिस्ट्रेट, जज या डॉक्टर हमेशा कानून के अनुसार ही काम करेंगे। लेकिन वह गलत है। लॉर्ड डेनिंग ने क्या कहा था, देखिए :

'कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि कार्यकारी कभी ऐसे पापों के दोषी होंगे, जो हम सबके लिए आम है। आपको यकीन हो सकता है कि वे कई बार ऐसा काम करेंगे, जिसकी उनसे अपेक्षा नहीं है, और कई बार ऐसा काम नहीं करेंगे, जिसे करने की उनसे अपेक्षा होगी।'

हिरासत में उत्पीड़न के बीज हिरासत में नहीं बोए जाते, बल्कि इसकी शिनाख्त गिरफ्तारी, जमानत से इन्कार, पुलिस हिरासत की मंजूरी और न्यायिक हिरासत में भेजने के चरणों में की जा सकती है। प्रत्येक चरण के लिए कानून स्पष्ट है, लेकिन इस पर अमल अक्सर गलत और दुराग्रही होता है।

चलिए गिरफ्तारी से शुरुआत करते हैं। डी के बसु के मामले में कोर्ट ने टिप्पणी की कि हमने नियमित पुलिस के अलावा गिरफ्तारी का अधिकार सीबीआई, ईडी, सीआईडी, सीआरपीएफ, बीएसएफ, ट्रैफिक पुलिस और आयकर विभाग इत्यादि को दिया है।

इनमें से कुछ दावा करते हैं कि वे पुलिस नहीं हैं और दंड प्रक्रिया संहिता से बंधे नहीं हैं ! मसलन, ईडी (प्रत्यर्पण निदेशालय) जोर देता है कि कि वह 'केस डायरी' को बनाए रखने के लिए बाध्य नहीं है। इससे भी बदतर, हमने उन परिस्थितियों को निर्दिष्ट नहीं किया है जब गिरफ्तारी की जा सकती है।

राष्ट्रीय पुलिस आयोग (तीसरी रिपोर्ट) ने पाया था कि 60 फीसदी गिरफ्तारियां अनावश्यक थीं। जजों ने रिपोर्ट में सुझाए गए दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया और अफसोस व्यक्त किया, 'पुलिस आयोग की सिफारिशें प्रतिबिंबित करती हैं कि कैसे मौलिक अधिकार से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आजादी जुड़ी हुई है। हालांकि से सिफारिशें अभी तक वैधानिक हैसियत का रूप नहीं ले सकी हैं।'

गिरफ्तारी और रिमांड

पहला सुधार है, कई प्राधिकारों से गिरफ्तारी का अधिकार वापस लें। दूसरा अधिकार है, गिरफ्तारी का अधिकार प्राप्त किसी भी अधिकारी को 'पुलिस' अधिकारी घोषित किया जाए। तीसरा सुधार है, गिरफ्तारी के अधिकार को कड़ाई से विशेष परिस्थितियों से उपजे मामलों तक सीमित किया जाए। याद रखें, जयराज और फेनिक्स को लॉकडाउन के नियत समय से कथित रूप से 15 मिनट अधिक देर तक अपनी दुकान खुली रखने के कारण गिरफ्तार किया गया था।

दूसरा चरण है, अदालत में प्रस्तुत करना और रिमांड। मजिस्ट्रेट/जिला न्यायाधीश ऐसी हिरासत की आवश्यकता के बारे में बिना सोचे समझे पुलिस हिरासत दे देते हैं। पुलिस हिरासत (अधिकतम अवधि 15 दिन) खत्म होने पर मजिस्ट्रेट/ जिला न्यायाधीश गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायिक हिरासत में भेज देते हैं। जबकि कानून बहुत अलग है।

मुन्नाभाई रतिलाल पटेल (2013) एक, एससीसी 314, के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, '... मजिस्ट्रेट तथ्यात्मक परिदृश्य का आकलन कर सकता है और अपने विवेक से तय कर सकता है कि क्या पुलिस हिरासत या न्यायिक हिरासत जायज है या फिर कुल मिलाकर किसी तरह की हिरासत की जरूरत नहीं है।' कभी-कभार ही मजिस्ट्रेट/जिला न्यायाधीश उल्लिखित शब्दों को ध्यान में रखते हैं।

तीसरा चरण है, गिरफ्तार किए गए या फिर हिरासत में भेजे गए व्यक्ति की डॉक्टरी जांच। यदि जयराज और फेनिक्स की किसी डॉक्टर ने जांच की होती, तो कैसे उनके स्वस्थ होने का प्रमाणपत्र दिया जाता?

अपवाद बन गए कानून!

चौथा चरण है जमानत। कुछ ही मजिस्ट्रेट/जिला न्यायाधीश कम से कम पहली या दूसरी सुनवाई तक अभियोजन के जमानत के विरोध को खारिज करते हैं। प्रत्येक जेल ऐसे कैदियों से भरी पड़ी है, जिनकी या तो जांच चल रही है या जो कि विचाराधीन हैं, जबकि उन्हें जमानत मिलनी चाहिए।

कृष्णा अय्यर जे ने बालचंद (1977) चार, एससीसी 308 में इसे लागू किया था। उसके बाद से 'जमानत नियम है, जेल अपवाद है', यह खोखला सिद्धांत बनकर रह गया। हालांकि कुछ ही मजिस्ट्रेट/ जिला न्यायाधीश इस नियम पर अमल करते हैं और अपवाद में ही इसे लागू करने से खुश होते हैं!

जयराज और फेनिक्स के मामले में जो कथित रूप से एक छोटा अपराध था, उन्हें पुलिस या न्यायिक किसी भी तरह की हिरासत में भेजने की जरूरत नहीं थी और उन्हें पेश किए जाने के समय जमानत दी जानी चाहिए थी।

यह हताश करने वाली बात है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा कानून सिद्धांत में कुछ और है और व्यवहार में कुछ और। सौभाग्य से चीजें बदल रही हैं। हाल ही में सुशीला अग्रवाल (29 जनवरी, 2020) के मामले में एक सांविधानिक बेंच ने गुरुबख्श सिंह सिब्बिया (1980) के मामले में एक अन्य सांविधानिक बेंच के फैसले की फिर से पुष्टि की और साहसपूर्वक सुप्रीम कोर्ट के आठ फैसलों के उलट फैसला दिया और कुछ अन्य फैसलों में व्यक्त किए गए दृष्टिकोण से इत्तफाक न रखते हुए उसे 'अच्छा कानून नहीं' बताया। भूल मानवीय होती हैं, गलतियों को सुधारना ही न्याय है।

ऐसे लोगों के लिए उम्मीद कायम है, जो खुद को मरने से पहले जयराज और फेनिक्स जैसे हालात में पाते हैं।
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