फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Four Implications Leading Up to India’s 2019 General Election

ये तय करेंगे लोकसभा चुनाव के नतीजे

Mon, 22 May 2017 11:40 AM IST
ईश्वरन श्रीधरन
ईश्वरन श्रीधरन Updated Mon, 22 May 2017 11:40 AM IST
विज्ञापन
Four Implications Leading Up to India’s 2019 General Election
ईश्वरन श्रीधरन

हाल ही संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा और दिल्ली के निगम चुनावों में सत्तारूढ़ भाजपा ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। इसके अलावा राजनीतिक चंदे से संबंधित विधेयक पारित किया गया। अब राजनीतिक पार्टियां मात्र दो हजार रुपये नकद चंदा ले सकती हैं और उन्हें बीस हजार रुपये चंदा देने वालों की पहचान बतानी पड़ेगी। पहले तीन वर्षों के शुद्ध लाभ के 7.5 तक कंपनी चंदे की सीमा हटा दी गई है और अब कंपनियों को अपने लाभ-हानि खाते में राजनीतिक चंदा घोषित करने की जरूरत नहीं रह गई है। राजनीतिक दलों के संभावित दानदाता अब बैंकों से समयबद्ध चुनावी बॉन्ड खरीद सकते हैं और किसी भी दल को बिना उसकी पहचान घोषित किए दे सकते हैं। पार्टियां भी दानदाता की पहचान बताए बिना बॉन्ड भुना सकती हैं।

विज्ञापन


वर्ष 2019 के चुनाव के लिए चार महत्वपूर्ण कारक हैं : राजनीतिक दलों को मिलने वाला चंदा, राष्ट्रपति चुनाव, 2019 तक राज्यसभा की संरचना और सबसे महत्वपूर्ण, 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की संभावना।
विज्ञापन


कानून में किए गए हालिया बदलावों के चलते राजनीतिक चंदे का डिजिटल और चेक भुगतान से प्रवाह बढ़ेगा, पर दानदाताओं का नाम उजागर नहीं होगा। बैंक यह तो जानेंगे कि किसने चुनावी बॉन्ड खरीदा, पर वे यह नहीं जान पाएंगे कि वह किस राजनीतिक पार्टी को दिया गया। यह पारदर्शिता से दूर जाना है, जो विकसित लोकतंत्रों में चंदे के मानक से अलग है, लेकिन इससे अगले दो वर्षों में राजनीतिक पार्टियों को अपारदर्शी चंदे का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे राजनीतिक पार्टियों और दानदाताओं, दोनों को राहत मिलेगी। अगले दो वर्षों में हम राजनीतिक दलों में चंदा पाने की होड़ देखेंगे, जिसमें सत्तारूढ़ दल को बढ़त प्राप्त होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन


राज्य विधानसभा चुनावों, खासकर उत्तर प्रदेश में मिली जीत ने राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा और राजग गठबंधन की स्थिति काफी मजबूत बना दी है। राष्ट्रपति चुनाव में बहुमत के लिए राजग को मात्र बीस हजार वोटों की कमी रह गई है, पर संभवतः तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक, ओडिशा में बीजद, तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी पार्टियों के सहयोग से वह अपनी पसंद (या समझौते से नामित) के उम्मीदवार को राष्ट्रपति बनवा सकते हैं। इससे 2019 के चुनाव में अगर त्रिशंकु संसद की स्थिति रहती है, तो राजग की स्थिति मजबूत रहेगी।

हाल के चुनावी नतीजों के मद्देनजर राज्यसभा की संरचना में बदलाव होगा और उसमें भाजपा व राजग का संख्याबल बढ़ेगा। धन विधेयक के अलावा अन्य विधेयकों को पारित करवाने के लिए सामान्य बहुमत की आवश्यकता होती है। वर्ष 2018 में राज्यसभा में उत्तर प्रदेश से 10 रिक्तियां होंगी, जिनमें से भाजपा सात सीटों पर जीतने में सक्षम है। 2018 और 2019 में रिक्त होने वाले सीटों के चुनाव होने पर राजग की संभावित संख्या बढ़कर 95 हो जाएगी, जबकि यूपीए की संख्या घटकर 66 रह जाने की संभावना है। फिर भी राज्यसभा में राजग का संख्याबल बहुमत से कम होगा और उसे विधेयक पारित करवाने के लिए क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहना पड़ेगा। विपक्ष के व्यापक सहयोग के बिना वह संविधान संशोधन के बारे में सोच भी नहीं सकता।

हालांकि सबसे दिलचस्प होगा हालिया चुनावी नतीजों का 2019 के चुनावी संघर्ष पर पड़ने वाले प्रभावों का अनुमान लगाना। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में राजग ने 80 फीसदी सीटों पर कब्जा जमाया और गोवा व मणिपुर में कांग्रेस से कम सीटें पाने के बावजूद भाजपा ने सरकार बनाई, जिसने भाजपा का मनोबल बढ़ाया और पंजाब में शानदार जीत के बावजूद नेतृत्व के मुद्दे पर कांग्रेस को निराशाजनक स्थिति में छोड़ दिया। क्या इसका यह मतलब है कि 2019 में भाजपा को भारी बहुमत अनिवार्य है? बेशक यह संभव है (यदि भाजपा के मौजूदा 31 फीसदी वोट शेयर में और इजाफा हो), लेकिन 2014 में भाजपा की जीत की प्रकृति के कारण संसदीय चुनाव में स्थिति ज्यादा जटिल हो सकती है।

अगर हम भौगोलिक रूप से भाजपा की जीत का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट है कि यह उत्तरी, मध्य और पश्चिमी भारत में क्षेत्रीय रूप से केंद्रित था। नौ हिंदी भाषी राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेश (दिल्ली और चंडीगढ़) की 226 में से 193 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। पश्चिमी क्षेत्र (गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और दादर एवं नगर हवेली तथा दमन व दीव जैसे दो केंद्र शासित प्रदेश) की  78 में से 53 सीटें भाजपा ने जीतीं। यदि इसमें राजग सहयोगियों को भी जोड़ दें, तो आंकड़ा थोड़ा बढ़ सकता है, खासकर महाराष्ट्र और बिहार में। इस तरह हिंदी भाषी एवं पश्चिमी भारत में  304 में से 246 सीटें भाजपा ने जीतीं, यानी 81 फीसदी सीटें, जिसे दोहराना मुश्किल है। इन क्षेत्रों से बाहर दक्षिण एवं पूर्वी राज्यों में, कर्नाटक एवं असम में मजबूत पकड़ को छोड़ दे, को भाजपा का वोट शेयर बहुत कम है और उसे सीट जीतने के लिए बड़ी छलांग लगानी होगी।


 हालांकि मजबूत भाजपा अपने पक्ष में 2019 में लहर देखती हो, लेकिन यदि यह लहर उसके गढ़ तक ही सीमित रहती है, तो वह अतिरिक्त सीटें नहीं जीत सकती है, भले ही मौजूदा सीट को वह बड़े अंतर से जीत ले। अपने गढ़ में संभावित नुकसान की भरपाई के लिए दक्षिण एवं पूर्वी राज्यों में ज्यादा सीटें जीतना उसके लिए जरूरी है। पर 2014 के चुनावी नतीजों को दोहराना आसान नहीं होगा, खासकर तब, जब विपक्ष का महागठबंधन मुकाबले में होगा। संभवतः यही वजह है कि भाजपा दक्षिण एवं पूर्वी राज्यों, अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। आने वाले दिनों में इस दिशा में भाजपा के प्रयास और तेज ही होंगे।

-लेखक पेंसिलवानिया यूनिवर्सिटी के एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया सेंटर के मुख्य कार्यकारी और एकेडमिक डाइरेक्टर हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed