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जंगल में आग: हाशिये पर सुरक्षा के उपाय, दावानल के आगे बेबस हैं उत्तराखंड की वन पंचायतें

Fri, 02 Feb 2024 07:21 AM IST
Suresh Bhai सुरेश भाई
Updated Fri, 02 Feb 2024 07:21 AM IST
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सार
उत्तराखंड में हजारों वन पंचायतें सरकारी नियम से चलती हैं, पर वे दावानल नहीं बुझा पातीं, क्योंकि पारंपरिक व्यवस्था हाशिये पर चली गई है।
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forest fires in Uttarakhand and traditional system of extinguishing by forest panchayats
जंगल की आग। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वनों का पर्यावरण संरक्षण में अहम योगदान है। खेती-बाड़ी, पानी, हवा, मिट्टी हमारा जीवन है और इसके लिए जंगल जरूरी हैं। आदिकाल से ही लोगों ने वन बचाने के लिए वन पंचायतें बनाई हैं। गांव में खेती एवं वन सुरक्षा के लिए चौकीदारी व्यवस्था को महत्व दिया गया था। जंगल पर निर्भर लोगों ने वनों से घास और लकड़ी लेने के नियम भी बनाए थे। इसके संकेत आज भी पहाड़ी और आदिवासी गांवों में दिखाई देते हैं, जहां जंगल के रास्ते पर लकड़ी के तराजू बने हुए हैं।



जब लोग जंगल से घास, लकड़ी लेकर आते थे, तो वन पंचायत द्वारा नियुक्त चौकीदार वजन करता था। सभी लोग चौकीदार को हर फसल पर अनाज देते थे। जून से सितंबर के बीच में लोग चरागाहों में पशुओं को नहीं भेजते थे, क्योंकि इन महीनों में नई-नई घास और पौध जंगल में उगती है। उसकी सुरक्षा के लिए लोग पशुओं को घर पर रखकर ही चारे की व्यवस्था करते थे। इस तरह मनुष्य ने आदिकाल से ही अपनी खेती-बाड़ी के महत्व के लिए जंगलों का प्रबंधन करना शुरू कर दिया था।


वर्ष 1815 में अंग्रेजों के आने से पहले लोग अपनी आजीविका के लिए भी वनों का प्रबंधन करते थे। वर्ष 1850 में अंग्रेज फ्रेडरिक विल्सन ने गंगा घाटी के उद्गम में स्थित हर्षिल में रहकर तत्कालीन टिहरी नरेश सुदर्शन शाह से सिर्फ 400 रुपये में शंकुधारी वनों का पट्टा लिया था। फिर उसने यहां के वनों का अंधाधुंध दोहन किया। गंगा घाटी की तमाम प्रजाति के पेड़ों को काटकर वे नदी के बहाव के साथ हरिद्वार तक ले गए और वहां से रेलवे लाइन बिछाने के लिए कोलकाता तक पहुंचाया था। विल्सन ने जंगली जानवरों का भी शिकार किया।

इसी दौरान वर्ष 1823 में गांव की सीमाओं का भी निर्धारण किया गया, जिसके जरिये वन भूमि पर लोगों के अधिकार को सीमित करने का प्रयास आरंभ हुआ था। अंग्रेजों ने इसके लिए वर्ष 1865 में पहला वन अधिनियम बनाया था। फिर वर्ष 1877 में वनों की सीमाओं को भी निर्धारित करने का काम हुआ। इस प्रक्रिया में खेती की जमीन को छोड़कर संपूर्ण भूमि सुरक्षित वन भूमि के रूप में बदली गई। अंग्रेजों के इस कानून के कारण ही वन भूमि पर लोगों को अतिक्रमणकारी मानने का सिद्धांत जारी हुआ। हालांकि अंग्रेजों की इस व्यवस्था के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे थे। यह घटना 1915 -21 के बीच हुई है। इसके बाद अंग्रेज शासन ने एक 'शिकायत समिति' का गठन कर आरक्षित वनों को 'दर्जा एक' और 'दर्जा दो' में बांटा, जिसमें लोगों के अधिकारों को लौटाने की व्यवस्था की गई।

फिर 1925 में 'शिकायत समिति' की संस्तुतियों के आधार पर मद्रास प्रेसीडेंसी स्थित कम्यूनिटी फॉरेस्ट की तर्ज पर उत्तराखंड में भी पंचायती वन व्यवस्था शुरू की गई। वर्ष 1931 में वन पंचायत नियमावली भी बनाई गई। वन पंचायत का गठन 1932 में प्रारंभ हुआ था। उस समय उत्तराखंड में राजस्व ग्रामों की संख्या 13,739 थी। वर्ष 1976 में भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 28 के अंतर्गत वन पंचायत नियमावली में संशोधन करके राजस्व विभाग को अधिकार दिए गए थे, जिसका बहुत विरोध हुआ। इसके बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1982 में 19 सदस्यों वाली सुल्तान सिंह भंडारी कमेटी बनाई, लेकिन उसके जितने भी संशोधन थे, वे मंजूर नहीं हो सके।

निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण के चरम दौर में विश्व बैंक की सहायता से संयुक्त वन प्रबंधन नाम की योजना लागू की गई और इसे चलाने के लिए वन पंचायत नियमावली में संशोधन किए गए। इसके बाद वन पंचायतों की स्वायत्तता को समाप्त करके वन विभाग के अधीन कर दिया गया और वन पंचायत सरकार की देखरेख में बनने लगी। इससे लोगों के हक-हकूक भी प्रभावित हुए हैं।

अनुसूचित जाति के शिल्पकार और अन्य परंपरागत वन निवासी, जो रिंगाल और अन्य वन उत्पाद से आजीविका चला रहे थे, बेरोजगार हो गए। उनके समक्ष आजीविका का संकट खड़ा हो गया। उत्तराखंड में 12 हजार से अधिक वन पंचायतें हैं, जो सरकारी नियम-कानून से चलती हैं, पर वे जंगल की आग भी नहीं बुझा पातीं। इसका कारण है कि वन और खेती सुरक्षा के जो पुश्तैनी नियम-कानून थे, वे हाशिये पर चले गए।
(-लेखक सामाजिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता हैं।)

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