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विदेश नीति: जी-7 में विस्तार का वक्त... भारत को पूर्णकालिक सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया जाए
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इटली में जी-7 देशों के सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और इतालवी समकक्ष जॉर्जिया मेलोनी (फाइल)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी के साथ इतालवी प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सेल्फी की भरमार है। वह कॉलेज जाने वाली किशोरी की तरह लग रही हैं, जो अपने हीरो के साथ सेल्फी लेकर बहुत खुश और अभिभूत हैं और उत्साह में चिल्लाती हैं-मेलोडी (मेलोनी और मोदी) टीम की ओर से हेलो! प्रधानमंत्री मोदी के कट्टर आलोचक भी यह स्वीकार करेंगे कि हमारे सत्तर वर्षीय प्रधानमंत्री ने अलग- अलग तरह के वैश्विक नेताओं के साथ गर्मजोशी, मिलनसारिता और व्यक्तिगत रिश्ते बनाने में अनूठी महारत हासिल कर ली है।
उन्हें केवल आउटरीच सेशन में भागीदारी के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन सामूहिक तस्वीर लेते वक्त उन्हें प्रमुखता से केंद्र में रखा गया। संक्षेप में कहें, तो उनके प्रति काफी सम्मान और शिष्टाचार दर्शाया गया। और हो भी क्यों नहीं? अमेरिका और फ्रांस के राष्ट्रपतियों तथा ब्रिटिश एवं कनाडा के प्रधानमंत्रियों (जनमत सर्वेक्षणों में जिनकी लोकप्रियता घट गई है और अनिश्चित राजनीतिक भविष्य का सामना कर रहे हैं) की तुलना में मोदी ने भारत में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनकर इतिहास रच दिया है, हालांकि उनकी अपनी पार्टी लोकसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई।
इस अवसर का लाभ उठाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कई ऐसे मुद्दे उठाए, जो न सिर्फ भारत के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हैं। एआई और ऊर्जा, अफ्रीका एवं भूमध्यसागर पर जी-7 के आउटरीच सेशन में उन्होंने कई विषयों पर प्रकाश डाला, मुख्य रूप से मानव प्रगति में प्रौद्योगिकी के व्यापक उपयोग पर। मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं में प्रौद्योगिकी के उदय ने साइबर सुरक्षा के महत्व की भी पुष्टि की है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत अपनी विकास यात्रा के लिए किस तरह से एआई का लाभ उठा रहा है। यह जरूरी है कि एआई पारदर्शी, सुरक्षित, सुलभ और जिम्मेदार बना रहे। जहां तक ऊर्जा का सवाल है, भारत का दृष्टिकोण उपलब्धता, पहुंच, सामर्थ्य और स्वीकार्यता पर आधारित है। हम निर्धारित समय से पहले अपनी कॉप प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं। भारत लाइफ (एलआईएफई) मिशन के सिद्धांतों के आधार पर हरित युग की शुरुआत करने के लिए काम कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने धरती को और अधिक टिकाऊ बनाने के लिए 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान पर भी प्रकाश डाला। प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि समय से पहले कॉप प्रतिबद्धताओं को पूरा करने वाला भारत पहला देश होगा और यह 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है।
सितंबर, 2023 में जी-20 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी यूनियन को उसका पूर्ण सदस्य बनवाने के भारत के प्रयासों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ की भलाई के लिए बोलने और विश्व मंच पर अपनी प्राथमिकताओं और चिंताओं को व्यक्त करने की प्रतिबद्धता दोहराई। भारत-इटली के बीच रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता पर जोर देते हुए उन्होंने भारत-प्रशांत और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने की आशा व्यक्त की।
पिछले दो दशक से ज्यादा समय से हम सुन रहे हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मी मौजूदा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) आज दुनिया की वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती और उसकी समस्याओं का समाधान करने में अक्षम है। यही बात जी-7 के साथ लागू होती है, जिसकी स्थापना 1975 में दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक लोकतंत्रों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान) के एक अनौपचारिक समूह के रूप में तेल संकट, वित्तीय संकट और मंदी से निपटने के लिए की गई थी। इस समूह में कनाडा 1975 में शामिल हुआ। इसका न तो मुख्यालय है, न सचिवालय और न ही चार्टर। इसकी अध्यक्षता बारी-बारी से हर साल सदस्य देशों द्वारा की जाती है। मौजूदा अध्यक्ष एजेंडा निर्धारित करता है और गैर-सदस्य देशों को उचित समझकर आमंत्रित करता है। पिछले कुछ वर्षों में मुद्रास्फीति और अन्य आर्थिक चिंताओं के अलावा जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और प्रवासन जैसे कई मुद्दे जी-7 की चर्चाओं में प्रमुखता से शामिल रहे हैं।
जी-7 देशों की कुल जीडीपी, जो विश्व की जनसंख्या का मात्र 10 फीसदी है, 463 खरब डॉलर है। आईएमएफ के अनुसार, 2023 में यह वैश्विक जीडीपी का 26.4 फीसदी रह गया है, जबकि 2000 में यह 40 फीसदी था। हालांकि वर्तमान में ब्रिक्स की जीडीपी लगभग 260 खरब डॉलर होने का अनुमान है। गोल्डमैन सैक को लगता है कि 2050 तक ब्रिक्स जी-7 की जीडीपी से आगे निकल सकता है! यदि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और अर्जेंटीना जैसे देशों को इसमें शामिल कर लिया जाए, जिन्होंने ब्रिक्स में शामिल होने में रुचि दिखाई है, तो यह काम पहले भी हो सकता है। अकेले भारत की जनसंख्या पूरे जी-7 देशों की कुल आबादी से दोगुनी है और भारत का वर्तमान जीडीपी (39.40 खरब डॉलर) जी-7 के चार सदस्यों-इटली, फ्रांस, ब्रिटेन और कनाडा के जीडीपी से ज्यादा है। ऐसे में, भारत को शामिल किए बिना जी-7 वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कैसे कर सकता है और व्यावहारिक समाधान कैसे निकाल सकता है?
अब समय आ गया है कि भारत को जी-7 का पूर्ण सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया जाए, न कि आउटरीच सत्रों के लिए। अभी अमेरिका, जिसका जीडीपी जी-7 के कुल जीडीपी का 50 फीसदी से अधिक है, समूह के अन्य सदस्यों के समर्थन के कारण गैर-सदस्य देश के खिलाफ प्रतिबंधों सहित कोई भी निर्णय पारित करवा सकता है। भारत के शामिल होने से उस मनमानी को कुछ हद तक चुनौती मिलेगी। अगर इसमें दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को शामिल नहीं कर सकते, तो उन्हें ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे लोकतंत्रों को शामिल करना चाहिए और इसका नाम जी-10 रखना चाहिए। भारत और ब्राजील आईएमएफ में उच्च मतदान अधिकारों के लिए दबाव डाल रहे हैं, लेकिन ब्रिटेन और जापान की मदद से अमेरिका आसानी से ऐसी मांगों को टाल सकता है। अब समय आ गया है कि जी-7 के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में भी बदलाव हो।