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विदेश नीति और राष्ट्रवाद की धुरी : जबकि 2014 में यूपीए-2 की हार के कई कारक थे

Wed, 24 Jul 2019 02:35 AM IST
Raman Singh सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Published by: Raman Singh Updated Wed, 24 Jul 2019 02:35 AM IST
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Foreign Policy and Nationalism
अभिनंदन वर्धमान - फोटो : a

कुछ समय पहले तक भारत और विदेश में राष्ट्रीय चुनावों में राजनीतिक दलों की किस्मत तय करने में विदेश नीति और राष्ट्रवाद की बहुत मामूली भूमिका होती थी। लेकिन अब बड़े पैमाने पर इसमें बदलाव आ रहा है। अगर इन दोनों कारकों से मात्र दो-तीन फीसदी वोट इधर से उधर होते हैं, तो सीटों की संख्या में भारी अंतर आ सकता है और यह तय हो सकता है कि सरकार किसकी बनेगी।


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कुछ समय पहले तक भारत और विदेश में राष्ट्रीय चुनावों में राजनीतिक दलों की किस्मत तय करने में विदेश नीति और राष्ट्रवाद की बहुत मामूली भूमिका होती थी। लेकिन अब बड़े पैमाने पर इसमें बदलाव आ रहा है। अगर इन दोनों कारकों से मात्र दो-तीन फीसदी वोट इधर से उधर होते हैं, तो सीटों की संख्या में भारी अंतर आ सकता है और यह तय हो सकता है कि सरकार किसकी बनेगी।

भले ही 1960 और 70 के दशक में कथित सीआईए का हाथ और कम्युनिस्ट विरोधी डर ने सीमित रूप से उम्मीदवारों के पक्ष या विपक्ष में मतदाताओं को प्रभावित किया हो, लेकिन यह आर्थिक स्थिति ही थी, जो पार्टियों की सफलता के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई। एक बार तो दिल्ली की राज्य सरकार प्याज के दाम बढ़ने के कारण चुनाव हार गई थी!

जबकि 2014 में यूपीए-2 की हार के कई कारक थे- नीतिगत अपंगता, बढ़ता भ्रष्टाचार, घोटालों की शृंखला, सीएजी की रिपोर्ट, सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, मूल्य वृद्धि आदि, लेकिन विदेश नीति की विफलता उनमें शामिल नहीं थी। हालांकि मुंबई हमला (26/11) यूपीए-2 के शासन में ही हुआ था, पर किसी ने भी तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उनके मंत्रिमंडल के राष्ट्रवाद पर सवाल नहीं उठाया।

अमेरिका में 11 सितंबर, 2001 के बाद वहां के सुप्रीम कमांडर यानी राष्ट्रपति की क्षमता में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से लड़ना तथा राष्ट्रीय सुरक्षा व सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना एक प्रमुख कारक बन गया है। कुछ हद तक इसने जॉर्ज डब्ल्यू बुश को दूसरा कार्यकाल दिलाने में भी मदद की। विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन इराक, लीबिया और सीरिया के हालात से जूझ रही थीं। उन्होंने सैकड़ों ईमेल अपने व्यक्तिगत आईडी से भेजे थे, जो 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के काम आए, जिसके आधार पर उन्होंने उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाए, जिसने मतदाताओं को प्रभावित किया और हिलेरी की चुनावी संभावनाओं पर दाग लगाया।

पिछले राष्ट्रपति चुनाव में कथित रूसी हस्तक्षेप को संभवतः अगले चुनाव में मुद्दा बनाया जाएगा। इसके अलावा विदेश नीति के मोर्चे पर डोनाल्ड ट्रंप ने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिससे उनकी दृढ़ राष्ट्रवादी राष्ट्रपति की छवि बनी है, जो अमेरिका को फिर से महान बनाना चाहता है, निवेश लाना चाहता है, रोजगार सृजन की कोशिश करता है और अमेरिका को दुनिया में प्रमुख शक्ति बनाना चाहता है।

बहुत से लोग नहीं जानते कि चीन के खिलाफ उनका व्यापार युद्ध न केवल चीन को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि अमेरिका में चीनी वस्तुओं के खरीदारों को भी नुकसान पहुंचा रहा है। हालांकि भारत के साथ वस्तुओं और सेवाओं में अमेरिकी व्यापार घाटा वर्ष 2018 में 24.2 अरब डॉलर था, जो 400 अरब डॉलर के चीनी अधिशेष का मुश्किल से पांच फीसदी होगा, फिर भी ट्रंप ने भारत को 'टैरिफ किंग' और 28 अमेरिकी उत्पादों पर भारत के प्रतिरोधी शुल्क को 'अस्वीकार्य' बताने में संकोच नहीं किया।

यहां तक कि उनके पूर्ववर्ती बराक ओबामा ने भी चुनाव प्रचार के दौरान इसका जिक्र किया कि कैसे रोजगार बीजिंग और बंगलूरू जा रहा है और उन अमेरिकी कंपनियों को दंडात्मक कार्रवाई करने की धमकी दी, जो अमेरिका से बाहर आउटसोर्स करवा रही थी। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत की तरह अमेरिका में भी चुनाव के दौरान रोजगार का मुद्दा मतदाताओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करता है। जितना ब्रेग्जिट ने ब्रिटेन को विभाजित किया है, उतना कहीं भी विदेश नीति के किसी मुद्दे ने किसी देश को विभाजित नहीं किया है। इस मुद्दे पर सिर्फ डेविड कैमरन को ही नहीं, टेरिजा मे को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

अपने देश में सभी जानते हैं कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इनकार के कारण न तो मनमोहन सिंह और न ही प्रधानमंत्री मोदी बांग्लादेश के साथ तीस्ता जल बंटवारे पर समझौता कर पाए। बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों और म्यांमार के रोहिंग्या शरणार्थियों की मौजूदगी ने पश्चिम बंगाल और असम की राजनीति को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। और भारत इन अवैध प्रवासियों व शरणार्थियों के खिलाफ जो कार्रवाई करता है, उसका असर पड़ोसी देशों से हमारे रिश्ते तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि पर पड़ता है।

पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में 1971 के बाद पहला एयर स्ट्राइक किया गया था। यह भारतीय चुनाव से ठीक पहले हुआ था, जिसे अप्रत्याशित, साहसी राजनीतिक और रणनीतिक फैसला बताया गया। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के लिए वाजिब ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृढ़ एवं निर्णायक नेतृत्व को श्रेय दिया गया है, और सशस्त्र बल भी उन्हें दिए गए कार्य को पूरा करने के लिए श्रेय के पात्र हैं।

हवाई अड्डे पर सीआपीएफ के जवानों के ताबूत लेने का प्रधानमंत्री का फैसला तथा कैप्टन अभिनंदन (कई उम्मीदवारों ने अपने चुनाव प्रचार में उनके बड़े-बड़े पोस्टर लगाए थे) का पाकिस्तान से लौटकर आने पर नायकों की तरह स्वागत से यह धारणा बनी कि मोदी के नेतृत्व में भारतीय नागरिक और राष्ट्रीय सीमा सुरक्षित है और वही पाकिस्तान को सबक सिखा सकते हैं। इस अफसाने को बढ़ावा दिया गया कि मोदी को वोट उनकी कई जनहितैषी योजनाओं-जनधन, स्वच्छ भारत, सौभाग्य, उज्ज्वला और किसान सम्मान के लिए नहीं, बल्कि उनके मजबूत नेतृत्व के कारण दिया गया।

अगस्ता वेस्टलैंड के बिचौलिए क्रिस्टिन मिशेल को वापस लाने, विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे सभी आर्थिक अपराधियों और भगोड़ों को पकड़ने के प्रयास, संयुक्त राष्ट्र द्वारा मसूद अजहर को आतंकी घोषित करवाने में सफलता, हाफिज सईद की गिरफ्तारी (अजहर और सईद मामले में अमेरिका ने भूमिका निभाई) और कुलभूषण जाधव मामले में आईसीजे के फैसले ने सरकार की ताकत को दिखाया। इन मामलों में घरेलू और बाहरी पहलू आपस में मिल जाते हैं।

आश्चर्य की बात नहीं है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने आईसीजे के फैसले को 'मोदी सरकार के राजनयिक प्रयासों और सभी भारतीयों की रक्षा के लिए प्रतिबद्धता' के रूप में प्रदर्शित किया है। ऐसा ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है। और इसके लिए विदेश मंत्रालय और उसके राजनयिकों की पीठ थपथपाई जा रही है, जिसके वे हकदार भी हैं।
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