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फुटबॉल के मैदान से क्रिकेट की पिच तक

Sat, 11 Jan 2014 08:13 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Sat, 11 Jan 2014 08:13 PM IST
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Football field to cricket pitch

माही-द स्टोरी ऑफ इंडियाज मोस्ट सक्सेसफुल कैप्टन- शांतनु गुहा राय, रोली बुक्स,

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मूल्य-295 रुपये
फुटबॉल के मैदान से क्रिकेट की पिच तक एक सफर की कहानी
कल्लोल चक्रवर्ती

इधर हालांकि उनका प्रभामंडल थोड़ा क्षीण हुआ है, लेकिन भारतीय क्रिकेट को दिशा देने के लिए अब भी महेंद्र सिंह धोनी से उपयुक्त नाम दूसरा नहीं है। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोने और फंसे हुए मैच को टीम इंडिया के पक्ष में निकाल ले जाने में उनका सानी नहीं। कभी लंबे बालों वाले इस क्रिकेटर की लिफ्ट की हुई गेंदें आसमान छू लेती थीं, आज विकेटों के पतझड़ के बीच बेहद शांत और खामोश यह फिनिशर टिककर खेलने के बाद विजयी मुस्कान के साथ पैवेलियन लौटता दिखता है। धोनी का संयोगों से गहरा नाता रहा है।

वह अपनी स्कूल की फुटबॉल टीम में थे। झारखंड में हॉकी और फुटबॉल की लोकप्रियता के बीच क्रिकेट की कोई पूछ ही नहीं थी। इसके बावजूद डीएवी, जवाहर विद्या मंदिर के कोच केशव रंजन बनर्जी ने उन्हें गोलकीपर से विकेटकीपर बनाने का बीड़ा उठाया। बेमन से वह क्रिकेट की तरफ आए, तो लप्पेबाजी का उन्होंने आनंद लेना शुरू किया। वह सबसे पहले बैटिंग करना चाहते और अंत तक खेलने की सोचते। पड़ोस के एक स्कूल के खिलाफ एक मैच में शब्बीर हुसैन के साथ मिलकर उन्होंने छह सौ रनों की पारी खेली थी, जो महानता में सचिन और कांबली की स्कूली पारी से कम नहीं थी, पर रांची में उन दिनों स्कूली मैचों की रिपोर्टिंग की कोई परंपरा ही नहीं थी। बहुत बाद में स्पोर्ट्स कोटे में खड़गपुर में टिकट कलेक्टर की नौकरी करते हुए टेनिस बॉल से उन्होंने जिस विध्वंसी बल्लेबाजी का प्रदर्शन शुरू किया, उसकी छाप राष्ट्रीय टीम में उनके शुरुआती खेल में दिखती थी।
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धोनी को धोनी बनाने में और भी अनेक लोगों की भूमिका रही है। रांची के प्राइम स्पोर्ट्स स्टोर के मालिक परमजीत सिंह ने धोनी को मुफ्त क्रिकेट किट मुहैया कराने के लिए बहुत मेहनत की। इस संदर्भ में विनोद कुमार सिंह और अमिताभ चौधरी जैसी शख्सियतों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा। उन्होंने सिर्फ क्रिकेट एसोसिएशन की लड़ाई ही नहीं लड़ी, धोनी को राष्ट्रीय स्तर पर उनका हक दिलाने में भी बड़ी भूमिका अदा की। अगर रांची में धोनी का उदय न हुआ होता, तो झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन का मुख्यालय भी जमशेदपुर से रांची शायद ही आ पाता। यह किताब धोनी की शैली या क्रिकेट में उनकी उपलब्धियों के बारे में नहीं है।
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इसके बजाय यह भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल कप्तान के बनने की कहानी है, जो दिल्ली, मुंबई या बंगलूरु के बजाय रांची जैसे एक ऐसे शहर में बड़ा हुआ, जहां क्रिकेट की कोई परंपरा नहीं थी। यह किताब मैदान पर आक्रामक क्रिकेटर के शर्मीले व्यक्तित्व के बारे में बताती है, जो अपनी शादी में भी प्रचार से दूर रहना पसंद करता है। वरिष्ठ पत्रकार शांतनु गुहा राय ने यह किताब व्यापक शोध और तैयारी के बाद लिखी है, लेकिन कप्तान के तौर पर धोनी के हरेक फैसले को जायज ठहराने की जो कोशिश यहां हुई है, उससे बहुत सहमत नहीं हुआ जा सकता। जो लोग क्रिकेट की तकनीक या आंकड़ों के बजाय शख्सियतों के बारे में जानना पसंद करते हैं, उन्हें यह किताब अच्छी लगेगी।

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