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राजकोषीय घाटा बन गया चुनौती
जयंतीलाल भंडारी
Updated Tue, 23 Oct 2018 05:59 PM IST
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जयंतीलाल भंडारी
यकीनन बढ़ते राजकोषीय घाटे से आम आदमी से लेकर अर्थव्यवस्था तक की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। चालू वित्त वर्ष 2018-19 में जहां एक ओर सरकारी आमदनी लक्ष्य के अनुरूप नहीं है। वहीं दूसरी ओर सरकारी खर्च लक्ष्य से अधिक बढ़ते गए हैं। परिणामस्वरूप सरकार के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पूरा करना कठिन चुनौती है।
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सरकार का लक्ष्य है कि 2018-19 के दौरान राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 3.3 फीसदी से ज्यादा न हो। लेकिन हाल ही में 14 अक्तूबर को प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले पांच महीने अप्रैल से अगस्त के बीच राजकोषीय घाटा लक्ष्य के 94.7 प्रतिशत पर पहुंच चुका है। यह 5.91 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है और अभी चालू वित्त वर्ष के चुनौतीपूर्ण सात महीने बकाया हैं। इस साल अप्रैल-अगस्त के दौरान कुल व्यय 10.7 लाख करोड़ रुपये है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 9.5 लाख करोड़ रुपये था। ऐसे में राजकोषीय घाटा निर्धारित लक्ष्य से कुछ अधिक जीडीपी के 3.5 प्रतिशत पर पहुंच सकता है।
निश्चित रूप से सुस्त जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) संग्रह और अतिरिक्त व्यय प्रतिबद्धताओं की वजह से सरकार संतुलन स्थापित करने की कोशिश कर रही है। प्रत्यक्ष कर संग्रह उत्साहजनक है, लेकिन जीएसटी और विनिवेश से आमदनी का निर्धारित लक्ष्य पाना मुश्किल है। विगत पांच अक्तूबर को पेट्रोल-डीजल के उत्पाद शुल्क में कटौती से 10,500 करोड़ रुपये का कुल राजस्व नुकसान हो सकता है। इसमें से केंद्र सरकार 6,100 करोड़ रुपये का बोझ उठाएगी। केंद्र सरकार के आंतरिक व्यय अनुमान से पता चलता है कि सितंबर 2018 में मोटे अनाज और दलहन के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य बाध्यताओं को पूरा करने के लिए 20,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त आवंटन की जरूरत होगी। यह बजट में अनुमानित 1.69 लाख करोड़ रुपये खाद्य सब्सिडी के ऊपर होगा। इस साल के लिए ईंधन सब्सिडी 25,000 करोड़ रुपये रखी गई है। बहरहाल कच्चे तेल की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ जाने के कारण सरकार को अब इस मद में भी 12,500 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने होंगे।
चार नवंबर को ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभावी होने के बाद कच्चे तेल की कीमतों के आसमान छूने की आशंकाएं बढ़ जाने से राजकोषीय घाटे की चिंताएं और भी बढ़ गई हैं। जाने माने पत्रकार और अमेरिकी नागरिक जमाल खशोगी की हत्या को लेकर यदि ट्रंप प्रशासन सऊदी अरब के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई करता है, तो सऊदी अरब ऐसा होने पर कच्चे तेल का उत्पादन घटा सकता है।
दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक सऊदी अरब प्रतिदिन एक करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है। 1973-74 में इस्राइल और अरब देशों के बीच लड़ाई के दौरान सऊदी अरब ने कच्चे तेल का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करके पूरी दुनिया की मुश्किलें बढ़ा दी थी। दुनिया के तेल विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सऊदी अरब तेल उत्पादन घटाकर तेल निर्यात घटाता है और नवंबर से ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध भी लागू हो जाएंगे, तब कुछ समय में ही कच्चे तेल के दाम 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं! और यदि एक डॉलर की कीमत 74 रुपये मानी जाए, तो देश का आयात बिल 17.46 लाख करोड़ रुपये होगा। इस आसमान छूते कच्चे-तेल के दाम से देश के सामने राजकोषीय घाटे की भारी आशंका दिखाई दे रही है।