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आधी आबादी: वित्तीय समावेशन और महिलाएं, आत्मनिर्भरता के लिए बनानी होगी नई और व्यावहारिक रणनीति
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विस्तार
कमजोर महिलाओं के समूह को बगैर किसी कोलैटरल (एक ऐसी संपत्ति जिसे ऋण देने वाला ऋण की सुरक्षा के तौर पर स्वीकार करता है) के लघु वित्त मुहैया कराने की प्रवृत्ति भारत से जुड़ी आर्थिक खबरों में अब भी महत्व रखती है। लघु वित्त के इस क्षेत्र में घरेलू तथा वैश्विक, दोनों स्रोतों से नए निवेश आते रहते हैं। इन निवेशों के जरिये ही भारत की दर्जनों लघु वित्तीय कंपनियां (एमएफआई) हाशिये के समूहों का वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करती हैं, और जो इन कंपनियों के लिए अब भी एक आकर्षक उद्यम बना हुआ है।
एक दशक पहले तक भारत का लघु वित्तीय क्षेत्र मीडिया के निशाने पर था। मसलन, आंध्र प्रदेश में मीडिया संस्थानों ने कर्ज वसूली के हिंसक तरीकों और नतीजतन कर्ज लेने वालों की आत्महत्याओं का जिक्र करते हुए लघु वित्तीय कंपनियों पर दबाव बनाने की कोशिश की। लेकिन अब इस मामले में मीडिया का फोकस कर्ज लेने वालों की मुश्किलों के बजाय दूसरे मुद्दों पर है। इसके बावजूद गरीब महिलाओं पर ध्यान देने के कारण लघु वित्तीय कंपनियां अब भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन क्या ये कंपनियां जरूरतमंद महिलाओं को वह मदद और सेवाएं मुहैया कराती हैं, जिनकी इन्हें जरूरत है? और ऐसा क्यों है कि ऐसा उद्योग जिसका ध्यान सिर्फ शेयरधारकों के मुनाफे पर है, कमजोर समूहों की महिलाओं को भारत की वित्तीय पारिस्थितिकी से बाहर रखता है?
अपनी हालिया किताब में, जो भारत के व्यावसायिक लघु वित्त क्षेत्र पर मेरे एक दशक के शोध का नतीजा है, मैंने यह दिखाया है कि भारत का लघु वित्त उद्योग न केवल हाशिये की महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाने के अपने लक्ष्य से चुक गया है, बल्कि लघु वित्तीय कंपनियों की रणनीति में शायद ही कभी कमजोर महिलाओं की जरूरतों की चिंता होती है। इसके विपरीत इस उद्योग के दैनंदिन क्रियाकलापों में लैंगिक विषमता का प्रमाण इनके संस्थानों की कार्यसंस्कृति से लेकर ग्राहकों-कर्ज लेने वालों से इनकी बातचीत तक में स्पष्ट होता है।
यह उद्योग कर्ज लेने वाली गरीब महिलाओं से काम कराता है, पर उसका मेहनताना नहीं देता। ये महिलाएं समूह गठित कर तथा व्यक्तिगत जानकारियों और श्रम के जरिये इन कंपनियों की कर्ज वसूली में मदद करती हैं। मसलन, बंगलूरू में मैं एक ऐसी महिला नेत्री से मिली, जो अपने पड़ोसियों की मदद करने का दावा कर रही थी। उनसे और उनके समूह की दूसरी महिलाओं से विस्तार से बातचीत करने के बाद स्पष्ट हुआ कि अपने रसूख का इस्तेमाल कर वह अपने समुदाय की महिलाओं का ऐसा समूह तैयार करती हैं, जो लघु वित्तीय कंपनी के हित में हो। ऐसे समूहों में गरीब महिलाएं भी शामिल होती हैं और तुलनात्मक रूप से संपन्न महिलाएं भी, इनमें उद्यमी, किरायेदार और घर का काम करने वाली-सभी तरह की महिलाओं को शामिल किया जाता है।
लघु वित्तीय कंपनियों की साख के लिए यह आवश्यक है कि वे अलग-अलग तरह के समूह तैयार करें। लेकिन अब तक इन कंपनियों के कर्मचारी ऐसा कर पाने में विफल रहे हैं। ऐसे में, वे ऐसी महिलाओं की मदद लेती हैं, जिनका अपने समुदाय में दबदबा होता है। मैं जिस महिला नेत्री का जिक्र कर रहा था, उसने प्यार और दबाव से अलग-अलग श्रेणी की महिलाओं को जोड़कर उन्हें एक साथ लघु वित्तीय कंपनी से कर्ज लेने के लिए कहा, लेकिन बातचीत में वह दावा कर रही थीं कि यह काम वह महिलाओं की सेवा के लिए करती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसे काम के पीछे उस महिला नेत्री के अपने स्वार्थ भी रहे होंगे, लेकिन यह तय है कि इस काम के लिए कंपनी उन्हें कोई पैसा नहीं देती।
लघु वित्त क्षेत्र की बेहद सकारात्मक छवि है। माना जाता है कि यह उद्योग महिलाओं को लघु उद्यमी व आत्मनिर्भर बनाने का महत्वपूर्ण काम करता है। पर भारत में कर्ज लेने वाली ऐसी महिलाएं उद्यमी नहीं बनतीं। बल्कि छोटा-मोटा कर्ज वे स्कूल की फीस देने, जरूरी चिकित्सा खर्च और महंगा कर्ज चुकाने के लिए लेती हैं। लघु वित्तीय कंपनियों को इससे फायदा होता है। छोटे कर्ज चुकाने के दरम्यान कर्ज लेने वाले एक वर्ष बाद ज्यादा बड़ा कर्ज ले सकते हैं, जिससे लघु वित्तीय कंपनियों का मुनाफा भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा होता है।
लघु वित्तीय कंपनियों की जो कार्यसंस्कृति है, उसमें महिला कर्मचारियों को आगे बढ़ने के अवसर पुरुष कर्मचारियों की तुलना में कम मिलते हैं। एक महिला कर्मचारी ने मुझे बताया कि महिलाओं के एक समूह द्वारा कर्ज लेने के बाद उसकी नेत्री भाग गई, ऐसे में, दूसरी महिलाओं द्वारा अपने कर्ज के साथ उसका कर्ज भी चुकाना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में, उस महिला कर्मचारी ने फरार नेत्री के घर का दरवाजा तोड़ उसका सामान निकाल कर बेच देने के लिए कहा। ऐसा वह न कहती, तो खुद उस महिला कर्मचारी का रिपोर्ट कार्ड खराब हो जाता, क्योंकि उस समूह को कर्ज उसी ने दिलवाया था। लघु वित्तीय कंपनियों से कर्ज लेने वाली महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे अनिवार्यत: गरीब ही हों। विजया नाम की एक महिला को अपने गर्भाशय के ऑपरेशन के लिए जब पैसों की जरूरत थी, तब उसके समुदाय की एक प्रभावशाली महिला ने एक लघु वित्तीय कंपनी से कर्ज दिलवाया। विजया अपनी परिचित महिला के साथ-साथ उस कंपनी के प्रति भी कृतज्ञ थी, क्योंकि उसने जो ब्याज लिया, वह उसके पड़ोस के महाजन द्वारा लिए जाने वाले ब्याज से कम था। इस अर्थ में विजया जैसी महिलाओं के लिए लघु वित्तीय कंपनियों का महत्व निश्चय ही ज्यादा है, लेकिन विडंबना यह है कि महिला समूहों को कर्ज देने वाली इन कंपनियों की रणनीति में महिला सशक्तीकरण कभी नहीं होता।
चूंकि ये कंपनियां बड़ी संख्या में जरूरतमंदों को कर्ज देती हैं, जिनमें महिला समूहों की संख्या बहुत अधिक है, ऐसे में, इन्हें ऐसी रणनीति पर काम करना चाहिए, जो देश की कमजोर महिलाओं को आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनाएं। इसमें कोई शक नहीं कि लघु वित्तीय कंपनियों ने गरीब, कामगार और ग्रामीण महिलाओं के साथ, जो लंबे समय तक बैंकिंग व्यवस्था के बाहर थीं, भरोसे का रिश्ता बनाया है। ऐसे में, समय आ गया है कि यह उद्योग जरूरतमंद महिलाओं की बड़ी आबादी को सशक्त बनाने की दिशा में भी काम करे।
-लेखिका, अमेरिका के वेलेस्ले कॉलेज में प्रोफेसर हैं।