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आत्मनिर्भरता: अब निखरेगा तेजस का तेज, विकसित देशों की कतार में होगा भारत

Arunendra Nath Verma अरुणेंद्र नाथ वर्मा
Updated Sun, 25 Jun 2023 07:12 AM IST
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सार
प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान हुए समझौते से अब भारत में ही लड़ाकू जहाजों के इंजन और ड्रोन का अमेरिकी सहयोग से उत्पादन हो सकेगा। आत्मनिर्भरता के ऐसे कदम हमें भविष्य में विमान निर्यात करने वाले देशों की श्रेणी में ला सकेंगे।
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fighter jet engines to made in India with us partnership self-reliance steps tejas aircraft exporting country
एलसीए तेजस - फोटो : IAF Website

विस्तार

हमारी सेना को आधुनिकतम उपकरणों से सुसज्जित करना और उन उपकरणों के उत्पादन को पूर्णतः आत्मनिर्भर बनाना हमारी रक्षा नीति की मुख्य प्राथमिकता बन चुका है। इस दिशा में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच किए गए समझौते भारत की सैन्य शक्ति बढ़ाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं- अमरिका द्वारा भारत को जीई-एफ414-आईएनएस6 लड़ाकू जहाजों के इंजन और एमक्यू-9बी आक्रामक ड्रोन के भारत में निर्माण करने के लिए टेक्नोलॉजी साझा करने का समझौता। अमेरिका के साथ सैन्य संधि करने वाले देशों के अतिरिक्त अभी तक अमेरिका ने इतनी दरियादिली किसी और देश के साथ नहीं दिखाई है और भारत ऐसी किसी सैन्य संधि का सदस्य नहीं है।



निर्माण सहयोग के इस सौदे में भारत को 31 एमक्यू-9बी आक्रामक ड्रोन मिलेंगे, जिनमें 15 हमारी नौसेना के लिए होंगे और आठ-आठ थलसेना और वायुसेना के लिए। ड्रोन मानव विमान चालक के बिना उड़ने वाले स्वचालित यान होते हैं। आम नागरिक के लिए अनुमान लगाना कठिन होगा कि जीई-एफ414 जेट इंजन का सौदा भारतीय वायुसेना के लिए कितना अधिक महत्वपूर्ण है। उसके लिए भारतीय वायुसेना की कमजोरियों से परिचित होना उतना ही जरूरी है जितना चौथी और पांचवीं पीढ़ी के जेट फाइटर जहाजों में अंतर समझना। अतः इन जेट इंजनों के सौदे से भारतीय वायुसेना वाकई बहुत अधिक लाभान्वित होगी। सरकारी आकलन के अनुसार, भारतीय वायुसेना के पास विमानों की 42 स्क्वाड्रन होनी चाहिए, लेकिन फिलहाल उसकी ताकत कुल 31 स्क्वाड्रन की है, जिनमें से अधिकांश रूसी मूल के विमान हैं। संख्या में इतनी भारी कमी तो चिंताजनक है ही, जो विमान सेवारत हैं, उनकी गुणवत्ता भी कई सवाल उठाती है।


फ्रांसीसी मूल के मिराज विमान वर्ष 1999 में वायुसेना से जुड़े थे, इनमें से आज भी करीब 50 विमान सेवा में हैं। स्वयं फ्रांस में सेवानिवृत्त हो चुके इन विमानों के पुर्जे प्राप्त करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में 3,000 करोड़ रुपये खर्च करके खरीदे गए पुराने और अपनी आयु पूरी कर चुके मिराज विमान अब स्पेयर पार्ट्स निकालने के काम आ रहे हैं। भारत ने इन विमानों के कल-पुर्जे बनाने की कभी नहीं सोची। कभी पाकिस्तानी सैबर जेट और स्टारफाइटर मार गिराने वाले मिग-21 को कल-पुर्जों की कमी के कारण उड़नताबूत होने का अपयश झेलना पड़ा था।

शुक्र है कि राफेल जहाज का वर्षों तक लटका रहने वाला सौदा किसी तरह एक मुकाम पर पहुंच सका और 36 राफेल जेट वायुसेना के लिए खरीदे जा सके। लेकिन अब हालत यह है कि मिग-21 की जगह भरने का निर्णय लेते समय जिस तेजस विमान का भारतीय निर्मित के रूप में इतना महिमा-मंडन हुआ, उसका हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स द्वारा निर्माण बेहद धीमी रफ्तार से हो रहा है। वर्ष 2021 में करीब 47 हजार करोड़ रुपयों का जो ऑर्डर एचएएल को 73 तेजस मार्क-1ए और 10 ट्रेनर विमान बनाने के लिए दिया गया था, उसकी पूर्ति फरवरी, 2024 से फरवरी, 2028 के बीच होने की उम्मीद है। मार्क-1ए के पहले बैच की आपूर्ति अगले साल शुरू होगी। इस बीच यह भी साफ हो गया है कि तेजस मार्क-1, जिसमें जीई-एफ404 इंजन है, चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमान से बेहतर नहीं हो सकता।

अतः तेजस मार्क-2 विमान के रूप में एक बेहतर मॉडल बनाने के लिए 9,000 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया और आशा की गई कि वायुसेना को 126 विमान, अर्थात सात स्क्वाड्रन एडवांस मल्टी कॉम्बैट एयरक्राफ्ट जहाज दिए जा सकेंगे। इनमें से 36 विमानों में अमेरिकन जीई-414 इंजन होंगे, जो 98 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाले होंगे और बाद में बनाए जाने वाले 90 विमानों में 110 किलो न्यूटन थ्रस्ट वाले होंगे। भारत ने विमान निर्माण की अपनी सीमित क्षमता के मद्देनजर दो इंजन वाले उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान बनाने का फैसला बंगलूरू में बीते फरवरी में हुए एयर शो में अमेरिकी एफ-35ए के प्रदर्शन से प्रभावित होकर लिया था। तेजस मार्क-2 में अमेरिका में बना जीई-एफ414-आईएनएस6 टर्बोफैन इंजन होगा। लेकिन खुशी की बात यह है कि जहां तेजस मार्क-1 का इंजन पूरी तरह आयातित था, वहीं तेजस मार्क-2 में इस्तेमाल होने वाले जीई-एफ414-आईएनएस6 इंजन को बनाने की तकनीक भी हमें देने के लिए अमेरिका राजी है। नतीजतन भारत में ही इस इंजन का अमेरिकी सहयोग से उत्पादन हो सकेगा। भारतीय सैन्य विमान उत्पादन उद्योग के लिए यह एक स्वर्णिम अवसर है। आत्मनिर्भरता के ऐसे कदम हमें भविष्य में विमान निर्यात करने वाले देशों की श्रेणी में ला सकेंगे।

भविष्य में हमें जरूरत होगी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की। पांचवीं पीढ़ी के जेट फाइटर में आक्रमण और बचाव के लिए अत्याधुनिक उच्चतम कौशल वाले उपकरण इस्तेमाल होते हैं। उनमें अच्छी मारक दूरी, अधिक ऊंचाई पर उड़ने की क्षमता और अच्छी गतिशीलता होती है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता है, अग्रणी इलेक्ट्रॉनिक और एवियोनिक्स तकनीक, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से प्राप्त सभी सूचनाओं का क्षण भर में अध्ययन करके विमान चालक को तुरंत निर्णय लेने में सक्षम बनाती हैं। ऐसे में, अमेरिका के सहयोग से उठाया गया यह नवीनतम कदम भारत को विकसित देशों के समकक्ष बनाने की दिशा में ले जाएगा।

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