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और वह वारांगना भक्त बन गई

Fri, 01 Feb 2013 09:47 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Fri, 01 Feb 2013 09:47 PM IST
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fighter became devout

हमारे नीतिशास्त्रों में कई ऐसे प्रसंग भरे पड़े हैं, जिनसे हमें ईश्वर का साक्षात्कार करने की प्रेरणा मिलती है। इन प्रसंगों में बताया गया है कि किस तरह प्रभु का सान्निध्य पाकर जीवन सफल बनाया जा सकता है। कृष्णदास अष्टछाप के संत कवियों में से एक थे। एक दिन वह कहीं जा रहे थे। उन्हें किसी युवती के सुरीले कंठ से गायन की ध्वनि सुनाई दी। वह आकर्षित होकर उसके पास चले गए। उन्हें पता लगा कि यह तो वारांगना है।

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कृष्णदास ने युवती को भगवान की भक्ति में लगाने का संकल्प लेकर कहा, बहन, तुम्हारे कंठ में बहुत आकर्षण है। यदि तुम साधारण लोगों को रिझाने के लिए न गाकर परमपिता परमात्मा श्रीनाथ जी की प्रशस्ति में गाओ-नाचो, तो तुम्हें मुंहमांगा धन दिलाऊंगा। फिर तुम्हारे इहलोक तथा परलोक, दोनों संवर सकते हैं। युवती एक संत को सामने देखकर हतप्रभ रह गई।
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कृष्णदास ने उसे स्वरचित पद सुनाया, तो वह मंत्रमुग्ध हो उठी। उसने तुरंत स्नान किया। वीणा उठाई और श्रीनाथ जी के मंदिर जा पहुंची। श्रीनाथ जी के विग्रह के समक्ष पहुंचते ही वह अपनी सुध-बुध खो बैठी। उसने वीणा को झंकृत किया और नृत्य करते-करते कह उठी, मेरो मन गिरधर छवि पे अटक्यौ। उसी दिन से वारांगना ने अपना जीवन भगवान श्रीनाथ जी की उपासना-साधना में लगा दिया।

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