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लोकपाल से दो-दो हाथ
अंशुमाली रस्तोगी
Updated Mon, 23 Dec 2013 07:17 PM IST
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जश्न मनाइए। बधाई गीत गाइए। सड़को-चौराहों पर हो-हुड़दंग मचाइए। अन्ना को शुभकामनाएं दीजिए। सरकार को सिर-आंखों पर बैठाइए। क्योंकि लोकपाल विधेयक पास हो गया। देख लेना, अब राजनीति-समाज-व्यवस्था-अफसरशाही-नेता-मंत्री-संतरी-विधायक के बीच से भ्रष्टाचार ऐसे गायब होगा; जैसे सिर में से जूं। अब रिश्वत का न एक नया पैसा लिया जाएगा, न दिया। और हां, सुना है कि अब तलक जिसने नंबर दो का पैसा समेटा है, वे सब सरकारी खजाने में जमा कराया जाएगा।
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देखते रहो, यह लोकपाल बिल जो है न, सबको सुधार कर रख देगा! पर जिस तरह से लोकपाल बिल पास हुआ, यह देखना भी खासा दिलचस्प रहा। लोकपाल के असली सूत्रधार अन्ना हजारे पहले तो सरकार के विरुद्ध जंतर-मंतर पर जाकर बैठ गए, मगर इन दो-तीन वर्षों में न जाने ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने सरकारी बिल पर सहर्ष मोहर लगा दी। पढ़ने में आया कि लोकपाल बिल पास होते ही वह झूमे भी।
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वैसे लोकपाल बिल के बहाने राजनीतिक व अनशनात्म जित्ती नौटंकियां होनी थीं, जमकर हुईं। बेचारी सरकार कने कोई चारा भी तो न था, सिवाय लोकपाल बिल पर मोहर लगाने के। अगर मोहर न लगाती, तो अगले चुनाव में और बड़ा नुकसान उठाती। यों भी, अपने देश में नियम-कानून बने-बनवाए केवल इसलिए जाते हैं, ताकि सजा का भ्रम बना रहे। वरना तो यहां अंदरखाने क्या-क्या नहीं चलता प्यारे।
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लोकपाल का भय सामने दिखने पर एक पल को भ्रष्टाचारी लोग सकते में आए जरूर होंगे, पर दूसरे ही पल यह सोचकर संभल गए होंगे कि हम न सुधरेंगे, चाहे बिल कोई-सा ले आओ। पर आशावानों का क्या कीजिएगा, वे तो उम्मीद लगाए बैठे हैं कि इधर लोकपाल बना, उधर भ्रष्टाचार का खात्मा होना शुरू। यह भारत है मियां। यहां हर बात की जुगाड़ संभव है। भ्रष्टचारियों ने लोकपाल से दो-दो हाथ करने के रास्ते भी खोज लिए होंगे।
हमेशा ध्यान रखो प्यारे, भ्रष्टाचार और रिश्वतबाजी हमारी व्यवस्था के दो अति-महत्वपूर्ण अंग हैं। इन अंगों को एक-दूजे से जुदा करना इत्ता आसान नहीं। ईमानदारी ठीक है, पर बेईमानी को भी उचित जगह मिलनी चाहिए। क्या नहीं..? देखते हैं, लोकपाल कित्ता रंग जमा पाता है। या फिर अपनी-अपनी नाक को ऊंची करने का माध्यम ही बनकर रह जाता है। वैसे यहां नाक कटते देर ही कित्ती लगती है प्यारे।