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लोकपाल कहां है?
बी के चतुर्वेदी
Updated Mon, 24 Aug 2015 07:40 PM IST
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कुछ साल पहले अन्ना हजारे ने लोकपाल कानून पारित करने की मांग को लेकर आमरण अनशन किया था। उसी के साथ-साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन भी जोर पकड़ रहा था। करीब दो साल बाद नई सरकार के प्रधानमंत्री ने ईमानदारी को प्रोत्साहित करने और सार्वजनिक जीवन में शुचिता को बढ़ावा देने के प्रति देश को आश्वस्त किया। उन्होंने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के मामले में भी पर्याप्त साहस दिखाया। जो लोग बुनियादी स्तर पर फैले भ्रष्टाचार से हताश थे, वे नई सरकार की प्रतिबद्धता से नए सिरे से आश्वस्त हुए।
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अलबत्ता सुधारों की गति और भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम उठाने की प्रतिबद्धता लोगों की उम्मीदों से कम ही है। वर्ष 2014 में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार संबंधी सूचकांक में 187 देशों में भारत 85वें पायदान पर था। ऐसी धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि सभी राजनीतिक दल केवल चुनाव के समय ही भ्रष्टाचार को याद करते हैं। जैसे ही चुनाव खत्म होता है, सब कुछ पहले की तरह ही चलने लगता है। आइए, कुछ तथ्यों पर नजर दौड़ाएं।
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पहली बात यह कि लोकपाल गठित करने का उत्साह खत्म हो गया है। इससे संबंधित विधेयक दिसंबर, 2013 में ही पारित हो गया था। पर अब तक लोकपाल का अता-पता नहीं है। सभी दलों में लोकपाल की संस्था स्थापित करने के प्रति अनिच्छा रही है। अगर लोकपाल का कामकाज शुरू हो जाएगा, तो भ्रष्ट राजनेताओं और सिविल सेवकों के खिलाफ त्वरित मुकदमा सुनिश्चित होगा, क्योंकि जांच एजेंसियां लोकपाल के अधीन स्वतंत्र रूप से काम करेंगी। जब तक भ्रष्ट नेताओं और लोकसेवकों को जेल भेजने का प्रभावी तंत्र नहीं होगा, घूस लेने की प्रथा खत्म नहीं होगी।
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दूसरी बात, लोकपाल अधिनियम राज्यों को अपने मंत्रियों और लोकसेवकों के भ्रष्टाचार की जांच के लिए लोकायुक्त कानून लागू करने का प्रावधान प्रदान करता है। शुरू में लोकपाल कानून के हिस्से के रूप में एक आदर्श कानून की सिफारिश की गई थी, जिसके प्रावधान बहुत सख्त थे। लेकिन राज्य अड़ गए कि उन्हें अपना कानून लागू करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। नतीजतन लोकायुक्त को लेकर विभिन्न तरह के कानून हैं। कुछ ही राज्यों में (मसलन, कर्नाटक) मुख्यमंत्री लोकायुक्त कानून में दायरे में आते हैं, जिसके तहत उनके खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की जा सकती है। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्यों में अब भी इसको लेकर कोई कानून नहीं है। लोकपाल कानून में कहा गया है कि लोकायुक्त कानून एक साल के भीतर लागू होगा। वह समय बीत गया है, पर किसी भी राज्य ने उसे लागू नहीं किया है। व्यवस्थागत सुधार और नैतिक संहिता के साथ यह संयोजन भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिहाज से काफी शक्तिशाली साधन हो सकता है।
तीसरी बात, व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं का सरलीकरण भ्रष्टाचार को रोकने में सबसे ज्यादा प्रभावी होता है। इस दिशा में कुछ अच्छी पहल की गई है। दस्तावेजों के स्व-प्रमाणन को स्वीकृत करने और रसोई गैस सब्सिडी का नकद हस्तांतरण महत्वपूर्ण कदम हैं। प्रक्रियाओं में बदलाव की कोशिश और व्यवसाय को आसान बनाना महत्वपूर्ण है। देश को डिजिटल बनाने की मुहिम भी अहम है। पर इसके लिए भारी वित्तीय संसाधनों की जरूरतों को देखते हुए यह साफ नहीं है कि अगले पांच वर्षों में यह संभव होगा या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि राज्य सरकारों और व्यावसायिक जगत में निवेश योजना को लेकर तालमेल है या नहीं। ऐसा न होने पर विकास की गति सुस्त पड़ सकती है।
प्रशासन का एक बड़ा हिस्सा राज्यों में काम करता है। भ्रष्टाचार और कुशासन से गरीबों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, भवन निर्माण को मंजूरी, जमीनों की ब्रिक्री के दस्तावेजों का रजिस्ट्रेशन और बच्चों का स्कूलों में दाखिला-ये सब राज्यों की निगरानी के दायरे में आते हैं। ठेके देने और सामग्रियों की खरीद में अक्सर भ्रष्टाचार होता है और नेताओं एवं लोकसेवकों को घूस दिया जाता है। भ्रष्टाचार के मामले में शिक्षा विभाग शीर्ष पर है। व्यापम में भ्रष्टाचार स्कूली शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार का उदाहरण है। ऐसे में जरूरत है कि सभी मुद्दों पर राज्यों से संवाद किया जाए और व्यवस्थागत सुधार के लिए भागीदारी विकसित की जाए। खासकर सूचना तकनीक का उपयोग करके भ्रष्टाचार को तेजी से कम किया जा सकता है। लेकिन इस अहम क्षेत्र में केंद्र सरकार की ओर से कोई संस्थागत पहल नहीं दिखती है।
चौथी बात, राजनीतिक भ्रष्टाचार निस्संदेह देश में व्यापक है। इसका एक कारण तो यह है कि चुनाव लड़ने के लिए भारी धन की जरूरत होती है। जाहिर है, चुनाव सुधार की आवश्यकता है। इस समस्या से निपटने के लिए निर्वाचन आयोग ने अतीत में कई प्रस्ताव सरकार के पास भेजे हैं, जिसमें उम्मीदवारों के चुनावी खर्च को आंशिक वित्त पोषण से संबंधित प्रस्ताव भी शामिल है। इसमें इसका भी प्रस्ताव है कि उम्मीदवारों के साथ-साथ राजनीतिक दलों द्वारा किया गया खर्च विधानसभाओं और संसद के चुनाव खर्च की सीमाओं में होना चाहिए। ये विचार ठंडे बस्ते में डाल दिए गए हैं।
पांचवीं बात, प्रशासनिक सुधार आयोग ने सभी लोकसेवकों के लिए नैतिक संहिता की सिफारिश की है। उसने संसद एवं राज्यों की नैतिक समिति के सहयोग के लिए नैतिक आयुक्त के गठन की भी सिफारिश की है। ये ऐसी संस्थाएं हैं, जिन्हें मजबूत समर्थन की जरूरत है। नैतिक नियमों को भंग करने पर लोकसेवकों को दंडित किया जाना चाहिए, जिसमें उन्हें सेवा से हटाने, उनकी प्रोन्नति रोकने और सार्वजनिक अपमान करने का प्रावधान शामिल हो। इसी तरह मंत्रियों, सांसदों और विधायकों द्वारा नैतिक नियम भंग करने पर उनकी सदस्यता खत्म करने और उनके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान होना चाहिए।
-लेखक कैबिनेट सचिव और योजना आयोग के सदस्य रहे हैं