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किसानों को बचाने की लड़ाई

Sat, 10 Jun 2017 05:47 PM IST
vm singh वी एम सिंह
Updated Sat, 10 Jun 2017 05:47 PM IST
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Fight to save farmers
वी एम सिंह

आज देश में सभी सरकारें हैरान हैं, परेशान हैं, उन्हें अजीब लग रहा है कि किसान, जो दशकों से अपनी पीड़ा के आंसू पीते आए हैं, आज अपनी आवाज उठाने के लिए क्यों और कैसे खड़े हो रहे हैं। असल में किसानों का सब्र टूट गया है। पीढ़ी दर पीढ़ी किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। सरकार किसी पार्टी की हो, किसान को केवल वोटबैंक बनाने का काम करती है। हर किसान कर्ज की जिंदगी जी रहा है। उसे फसल का उचित दाम नहीं मिलता। एक तरफ किसान द्वारा किसान क्रेडिट कार्ड पर लिए ऋण का ब्याज भी वापस नहीं कर पाता, वहीं दूसरी ओर उससे बैंक एवं वित्तीय संस्थाएं खुशी-खुशी हर वर्ष उसके उधार की सीमा बढ़ाने का काम करती जा रही हैं। इस तरह कुछ साल निकल जाते हैं, फिर उधार का बोझ इतना हो जाता है कि किसान आत्महत्या के बारे में सोचने लगता है। 


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जब उत्तर प्रदेश के चुनाव में देश के प्रधानमंत्री ने किसानों के कर्ज माफ करने का वायदा किया, तो हर किसान को तिनके का सहारा दिखा। सरकार बनने पर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने बेशक मात्र एक चौथाई किसानों का 36,359 करोड़ रुपये का कर्ज माफ करने की बात कही, पर पूरे देश में इसका प्रचार हुआ और अलग-अलग प्रांतों में कर्ज माफी की आवाज सुनाई देने लगी। 
जहां पंजाब सरकार कर्जमाफी की तैयारी में जुटी है, वहीं तमिलनाडु के किसानों ने चालीस दिन जंतर-मंतर पर कर्जमाफी के लिए प्रदर्शन किया।

महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसान एक जून से आंदोलन कर रहे हैं, जिससे महाराष्ट्र ने लगभग 30,000 करोड़ रुपये का कर्ज माफ करने का फैसला ले लिया, पर मंदसौर में एक हफ्ते के आंदोलन के बाद मध्य प्रदेश की पुलिस द्वारा निहत्थे किसानों पर गोली चला कर आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गई। नौ किसानों को गोली लगी, जिसमें से 17 वर्षीय अभिषेक समेत छह की मौत हो गई। यह अलग बात है कि पहले मुख्यमंत्री ने पुलिस द्वारा गोली चलाने से इन्कार किया, फिर बाद में आक्रोश देखते हुए माना और हर पीड़ित परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा देने का एलान किया। 

यह हमारा कृषि प्रधान देश है, जहां देश को खिलाने वाले अन्नदाता को गोली खानी पड़ती है। किसान मुआवजा नहीं, इज्जत के हकदार हैं। हर प्रांत के किसानों की परेशानी सामान्य है, इसलिए लगभग दो महीने से तमिलनाडु की पहल पर हमलोग देश के सारे किसान संगठनों को लामबंद करके संयुक्त किसान आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। 

याद रहे, पहले किसान आंदोलन से सरकार डरती थी, पर अब कुछ दशकों से किसान आंदोलन लगभग खत्म हो गए हैं और अगर कोई किसान संगठन आंदोलन करता है, तो सरकार द्वारा उसे कुचल दिया जाता है। किसान आंदोलन खत्म होने का फायदा उठाते हुए राजनीतिक पार्टियों ने किसानों को जात-बिरादरी में बांट दिया। आज धर्म के नाम पर हम बंट गए हैं। खेती और उसकी जरुरतों पर से हमारा ध्यान हट गया है और खेती घाटे का सौदा बन गई है। बच्चे खेती नहीं करना चाहते, वहीं उन्हें नौकरी नहीं मिलती है, उनमें से कुछ अपराध और कुछ अवसाद में चले जाते हैं। अगर हमारे पूर्वज भी हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहते, तो हम भी खेती नहीं करते। हर किसान ने देश की 125 करोड़ जनता को भरपूर खाना खिलाने में योगदान दिया, लेकिन हमें क्या मिला? कर्ज? अगर किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज मिलना बंद हो जाए, तो बहुत किसानों के चूल्हे बुझ जाएंगे। 

किसान संगठनों को एक मंच पर लाने के लिए मैंने देश के किसान नेताओं को एक पत्र लिखा है और उनसे खेती को जिंदा रखन के लिए एकजुट होने की अपील की है। खेती को मुनाफे का सौदा बनाने के लिए हम सबको फिर से किसान आंदोलन को जिंदा करना होगा। और वह तब होगा, जब हम सब एक मंच पर आएंगे और देश में किसानों को बचाने की लड़ाई मिलकर लड़ेंगे। 

बेशक देश के विभिन्न प्रांतों में भाषा अलग है, पर किसानों की परेशानियां एक समान हैं। कुछ बिंदु जिस पर पूरे देश के किसानों का भला होगा, उन्हें शुरुआत के लिए चुना गया है। वे इस प्रकार हैं-पहला, एक अंतरिम उपाय के तौर पर किसान द्वारा किसी राष्ट्रीय बैंक या फिर राज्य की सहकारी समिति या वित्तीय संस्थानों से लिया गया ऋण पूरी तरह से माफ किया जाना चाहिए, ताकि किसान नए सिरे से शुरुआत करें। दूसरा, हर फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया जाए। एमएसपी को स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के तहत लाभकारी बनाना होगा। प्रत्येक किसान को केंद्र सरकार द्वारा घोषित एमएसपी मिलना चाहिए और राज्य व केंद्र सरकार द्वारा किसी प्रकार का कोई कोटा निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए। 

तीसरा, जिन किसानों ने वित्तीय संस्थानों (चाहे केंद्र या राज्य सरकार) से किसान क्रेडिट कार्ड या फिर किसी अन्य योजना के तहत फसली ऋण लिया हो, उन्हें प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान का मुआवजा मिलना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि फसल ऋण लिए जाने पर बीमा प्रीमियम स्वतः काट लिया जाता है। इसलिए फसल का नुकसान सीधे फसली ऋण की राशि के साथ जोड़ा जाना चाहिए और किसान को नुकसान के बराबर मुआवजा मिलना चाहिए।

चौथा, देश की सभी चीनी मिलों को उनके द्वारा खरीदे गए गन्ने की कटाई और ढुलाई का खर्च वहन करना चाहिए। चीनी मिलों को गन्ने का भुगतान 14 दिन में ही करना होगा। इसे सुनिश्चित कराना सरकार की जिम्मेदारी है या फिर देरी होने पर वैधानिक दंडात्मक ब्याज के साथ किसानों को भुगतान करना होगा। पांचवां, जिस किसान ने 30 साल या फिर इससे अधिक समय के लिए अन्न उपजाकर प्रदेश की सेवा की हो, उसे सम्मानजनक पेंशन मिलनी चाहिए, ताकि वह बुढ़ापे में अपना गुजारा कर सके। फिर चाहे उसने भूमि पट्टे पर लेकर खेती की हो या फिर उसके बच्चे खेती कर रहे हों। 

मुझे उम्मीद है कि हर किसान संगठन, जो किसानों की सच्ची लड़ाई लड़ रहा है, वह इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए 16 जून 2017 को गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली में आएगा और खेती को जिंदा करने के यज्ञ में आहुति देगा। खेती रहेगी तभी इस कृषि प्रधान देश में अगली पीढ़ी खेती से जुड़ेगी।

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