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दुधवा में अस्तित्व की लड़ाई
रजनीश
Updated Thu, 29 Aug 2013 08:12 PM IST
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देश को आजाद हुए भले ही आज 66 वर्ष हो चुके हों और वनों में रहने वाले आदिवासी वनाश्रित समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने वाले वनाधिकार कानून को संसद में पास हुए करीब सात वर्ष, लेकिन जंगलक्षेत्रों में पीढ़ियों से रहकर जंगल की रक्षा करने वाले आदिवासी वनाश्रित समुदायों के लिए आजादी अभी तक दूर का सपना ही है।
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इन्हीं गुलामी की जंजीरों से मुक्ति पाने के लिए बीते 31 जुलाई को उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क व टाईगर रिजर्व क्षेत्र में बसे थारू जनजाति के 46 गांवों में से 17 गांवों की 3,000 से अधिक महिलाओं ने वनाधिकार कानून नियमावली संशोधन-2012 में दिए गए वन संसाधनों के अधिकार का अपना सामूहिक दावा अनूठे अंदाज में पारंपरिक होरी नाच करते हुए अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत किया।
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असल में, उपरोक्त कानून के तहत यहां के लोगों को वन संसाधन इकट्ठा करने के लिए पहुंच का अधिकार, अपने परिवहन साधनों को लाने-ले जाने का अधिकार, जंगल से प्राप्त होने वाली तमाम लघु वनोपज के इस्तेमाल और सहकारी समितियों का गठन कर आजीविका के लिए उसे बाजार में बेचने के अधिकार को मान्यता दी जानी है। लेकिन जमीन पर यह अब तक नहीं उतर सका है। अलबत्ता, जिन क्षेत्रों में लोग मुखर हुए हैं, वहां वनविभाग और निजी स्वार्थों के लिए काम करने वाली तथाकथित वन्यजंतु प्रेमियों जैसी मजबूत ताकतें रुकावट बन रही हैं।
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विदित हो कि 1978 में जब इस वनक्षेत्र को दुधवा नेशनल पार्क के रूप में अधिसूचित किया गया था, तब इसके कोर जोन में आने वाले गांव सूरमा और बफर जोन में आने वाले गांव गोलबोझी को विस्थापन के आदेश दिए गए थे। सूरमा गांव के लोगों ने 1980 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, लेकिन 23 वर्षों के बाद आए फैसले में भी अदालत ने विस्थापन की ही मुहर लगाई।
इतना ही नहीं, 2003 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पार्क-सेंचुरी क्षेत्रों से लोगों को विस्थापित करने संबंधी आदेश ने भी सूरमा जैसे गांवों के जख्मों पर नमक डालने का काम किया। लेकिन लोगों ने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा और वे अपनी जगहों पर डटे रहे।
इस आंदोलन को तब और ताकत मिली, जब दुधवा क्षेत्र के थारू आदिवासी विस्थापन के मुद्दे पर एकजुट होने लगे। दिसंबर, 2006 में वनाधिकार कानून के आने के बाद आंदोलनकारी कानून के तहत अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने लगे, जिससे आंदोलन का दायरा अन्य गांवों में भी बढ़ने लगा।
हालांकि जमीनी और राजनीतिक प्रयासों के कारण आठ अप्रैल, 2011 को सूरमा, गोलबोझी, खीरी और देवीपुर को व्यक्तिगत अधिकारों के अधिकार पत्र देकर मान्यता दे दी गई, लेकिन लड़ाई अब भी बाकी थी।
यहां के थारू आदिवासी परिवारों से वन विभाग मात्र जलौनी लकड़ी और फूस के संग्रहण के नाम पर प्रति परिवार एक क्विंटल धान, 50 किलो गेहूं, 25 किलो सरसो और नगद रुपया प्रतिवर्ष वसूला करता था। साथ ही, जंगल जाने पर शिकार व पेड़ काटने की धाराएं लगाकर 10 से 50 हजार रुपये तक जुर्माना वसूलने, बेरहमी से पिटाई व जेल भिजवाने जैसी 'सजा' भी वह देता था।
इतना ही नहीं, एक जनवरी, 2008 को लागू वनाधिकार कानून के तहत लोग अपने दावे प्रस्तुत न कर सकें, इसके लिए वन विभाग कई तिकड़में भी करता था। नतीजतन वनाधिकार कानून के तहत अपने अधिकार हासिल करने के लिए लोगों ने आंदोलन तेज कर दिया।
बहरहाल, थारू आदिवासी महिलाओं की अगुवाई में चल रहा यह आंदोलन आज तीसरे चरण में है। आज वे न सिर्फ कानून के तहत मान्यता दिए गए वन संसाधनों पर सामुदायिक अधिकारों की मांग कर रही हैं, बल्कि सरकारी तौर पर इसे लागू न करने की स्थिति में खुद आगे बढ़कर क्रियान्वित भी कर रही हैं।
लिहाजा वन विभाग और यहां के वनक्षेत्र में निहित स्वार्थों के तहत मुनाफा कमाने वाली ताकतों का वर्चस्व समाप्त होना लगभग तय माना जा रहा है। ऐसे में कहा जा सकता है कि अब वह दिन दूर नहीं, जब दुधवा नेशनल पार्क व टाईगर रिजर्व जैसा सरकारी तौर पर संरक्षित क्षेत्र देश का पहला ऐसा राष्ट्रीय पार्क होगा, जहां सामुदायिक स्वशासन स्थापित होगा और जो वनाधिकार कानून की मूल भावना के अनुसार वनाश्रित समुदायों द्वारा संरक्षित व सवंर्धित किया जाएगा।