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उत्तराधिकार को हड़पने की लड़ाई

Wed, 30 Oct 2013 07:16 PM IST
राजकिशोर
राजकिशोर Updated Wed, 30 Oct 2013 07:16 PM IST
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Fight for Sardar Patel

सरदार वल्लभ भाई पटेल की भावुक तारीफ करके नरेंद्र मोदी ने अपने लिए आफत बुला ली है। जवाहलाल नेहरू बड़े थे या वल्लभ भाई पटेल, इस तरह की तुलनाओं का कोई अर्थ नहीं है। सबका अपना-अपना व्यक्तित्व होता है और सबका अपना-अपना योगदान। नेहरू जो कर सकते थे या जो उन्होंने किया, वह पटेल के बस की बात नहीं थी। लेकिन पटेल ने रियासतों को शामिल कर जितनी दृढ़ता से भारत का राजनीतिक एकीकरण किया, वह पंडित नेहरू के लिए संभव नहीं था। इस तरह के मामलों के लिए नेहरू कितने अपर्याप्त थे, इसका एक नमूना कश्मीर विवाद है। इस समस्या का मूल भारत के पहले प्रधानमंत्री की अति लोकतांत्रिकता में है। नेहरू तो बिना किसी शर्त के कश्मीर में जनमत सर्वेक्षण तक के लिए राजी हो गए थे। कश्मीर विवाद से निपटने की जिम्मेदारी अगर पटेल को दे दी गई होती, तो शायद थोड़ा-सा गुल-गपाड़ा होता, पर मामला इतना न खिंचता।

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इसीलिए तो सरदार पटेल को लौह पुरुष की संज्ञा दी गई। बाद में एक और लौह पुरुष हुए और वह भी उपप्रधानमंत्री पद तक पहुंचे, लेकिन आज उनकी हैसियत कद्दू-कुम्हड़े जैसी भी नहीं है। पटेल की इस तरह उपेक्षा नहीं की जा सकती थी। वह शेर की तरह जिए और शेर की तरह मरे। नेहरू को गांधी से मतलब था, गांधीवाद से नहीं। पटेल का मन गांधीवाद में रमता था। खेड़ा सत्याग्रह का नेतृत्व उन्होंने ही किया था। वह बातों के नहीं, काम के आदमी थे। ऐसे नेताओं को किसी भी देश की जनता शिद्दत से याद करती है। मजबूत व्यक्तित्व जनसाधारण को हमेशा आकृष्ट करते हैं- राजनीति में और ज्यादा, क्योंकि राज्य एक मजबूत, कुछ मामलों में कठोर भी, संस्था है और पिलपिले लोग उसे साध नहीं सकते।
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दिलचस्प यह है कि नेहरू परिवार के लगातार वर्चस्व के कारण कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा हुई है। इनमें पटेल का नाम सबसे ऊपर है। कांग्रेस के मेमोरी कार्ड में पटेल के लिए कोई जगह नहीं है। परंतु कांग्रेस और हिंदुस्तान की जनता एक नहीं हैं। लोग नेहरू को तो प्यार करते ही हैं, पटेल की प्रशासनिक क्षमताओं का लोहा भी मानते हैं। कहना न होगा कि पटेल सिर से पैर तक कांग्रेसी नेता ही थे, तथैव उनका सुदृढ़ व्यक्तित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों को बहुत आकर्षित करता है। यह एक विडंबना ही है, क्योंकि महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ को गैरकानूनी संस्था करार देने और उस पर प्रतिबंध लगाने का काम पटेल ने ही किया था। बेशक पटेल पश्चिमी ढंग के सेक्यूलर नहीं थे, धार्मिक संस्थाओं और कर्मकांड में उनकी पूरी आस्था थी, लेकिन वह किसी भी स्तर पर सांप्रदायिक नहीं थे। गांधी जी भी खुद को हिंदू मानते थे, पर भारत की जमीन पर उनसे बड़ा सेक्यूलर कौन पैदा हुआ है?
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संघ परिवार गांधी और नेहरू की आलोचना करता है, परंतु पटेल की तारीफ करता है, तो इसीलिए कि पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के काम में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। मजे की बात यह है कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की तो तारीफ की जाती है, पर संघ परिवार ने अपने प्रयत्न से किसी भी जीर्ण-शीर्ण मंदिर को जीवन दान नहीं दिया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि संघ के लोग हिंदूवादी होंगे, पर हिंदू धर्म और दर्शन के संरक्षण-परिवर्धन में उनकी कोई रुचि नहीं है।

दरअसल, संघ के चरित्र में एक खास बात है, जो अन्य राजनीतिक संगठनों में दिखाई नहीं पड़ती। ये संगठन अपने आप को देश की राजनीतिक-सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना नहीं चाहते। कम्युनिस्ट मार्क्स, लेनिन और स्टालिन का नाम लेते हैं, पर अपने भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद का नाम लेना उनके लिए कुफ्र से कम नहीं है। कांग्रेस तो जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से पीछे जाती ही नहीं। संघ परिवार ने इस शून्य का लाभ उठाया है। वह वीर सावरकर का नाम नहीं लेती, पर राणा प्रताप, विवेकानंद, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस आदि का बराबर स्मरण करती है। इससे भारतीय जनता पार्टी वाकई भारतीय जान पड़ती है। यह और बात है कि संघ परिवार ने इन सभी राष्ट्र-नायकों से सीखा कुछ नहीं है। उनके विचार संघ के राजनीतिक दर्शन में कहीं भी परिलक्षित नहीं होते। लेकिन आजकल विचार कौन देखता है? यह ‘बाबा नाम केवलम्’ का समय है।


नरेंद्र मोदी अपने भाषण की शुरुआत ‘भारत माता की जय’ से करते हैं, यद्यपि यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी भारत माता की संतानों में कौन-कौन आता है। क्या मुसलमान भारत माता की सौतेली संतान हैं? इस प्रश्न का कोई आश्वस्तिपरक जवाब मोदी के पास नहीं है। फिर भी जब हजारों की भीड़ में मंच से कोई ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष करता है, तो श्रोताओं का हृदय-कमल खिल उठता है। अकबर इलाहाबादी ने नास्तिकों की खिल्ली उड़ाते हुए लिखा था कि रकीबों ने रपट लिखवाई है जा-जाके थाने में, कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में। आज 'भारत माता की जय’ का घोष करनेवाले की स्थिति अकबर इलाहाबादी जैसी ही है। जनसाधारण इस फर्क को महसूस करता है। फर्क के इस एहसास से जलने की जरूरत नहीं है। जिन्हें इस पर गुस्सा आता है, उनका कर्तव्य यह है कि वे अपने को राष्ट्र नायकों से जोड़ें और खुद सीखें तथा दूसरों को बताएं कि किससे क्या सीखा जा सकता है।

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