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दुनिया के पांचवें कम्युनिस्ट देश में
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, लाओस से लौटकर
Updated Sun, 27 Sep 2015 03:21 PM IST
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लाओस की राजधानी विएनताइन स्थित भव्य प्रेसिडेंट पैलेस के सामने स्थित फौव्वारे से जैसे ही पैलेस के मुख्यद्वार की ओर मुड़ें, तो बाईं ओर लाल रंग का एक होर्डिंग ध्यान खींचता है। शायद लाओ भाषा में इसमें कुछ दर्ज है। लाल रंग के इस बोर्ड पर अंकित हंसिये और हथौड़े के चिन्ह से अंदाजा लगाया सकता है कि इसका रिश्ता कम्युनिस्ट पार्टी से है।
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यह लाओ पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी का चिन्ह है, जिसके गठन को इसी वर्ष मार्च में 60 वर्ष पूरे हुए हैं। दरअसल यह होर्डिंग इसी मौके पर लगाया गया था। लाओस दुनिया के उन पांच देशों में शामिल है, जहां एकल कम्युनिस्ट पार्टी की सरकारें हैं। बाकी के देश हैं, चीन, वियतनाम, क्यूबा और उत्तर कोरिया।
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कंबोडिया की तरह फ्रांस के उपनिवेश रहा लाओस 1954 में स्वतंत्रता हासिल कर सका था। तब इसने सांविधानिक राजशाही को अपनाया था। हालांकि उसी समय राजशाही समर्थकों और पाथेट लाओ के बीच भीषण संघर्ष छिड़ गया और देश गृहयुद्ध की चपेट में आ गया था।
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म्यांमार, कंबोडिया, चीन, थाईलैंड और वियतनाम से घिरे इस देश को तब विकट स्थितियों से गुजरना पड़ा था। पाथेट लाओ असल में एक वामपंथी आंदोलन था और 1975 में इसने किंग सवांग वत्थाना को बेदखल कर सत्ता पर कब्जा कर लिया।
आज सत्तारूढ़ पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ही पाथेट लाओ का नया रूप है। यानी चार दशक से लाओस कम्युनिस्ट सत्ता के अधीन है। लाओस में इन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की साठवीं वर्षगांठ के साथ ही पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी के सत्ता में आने की चालीसवीं वर्षगांठ भी मनाई जा रही है।
हालांकि पैलेस में कोई अतिरिक्त तैयारी नहीं दिखती। फ्रांसीसी शैली में बने इस पैलेस के एक कक्ष में 1975 से अब तक बने राष्ट्रपतियों की लकड़ी के फ्रेम में जड़ी बिल्कुल एक जैसी तस्वीरें टंगी हुई हैं, जिनमें वर्तमान राष्ट्रपति चाउम्मले सायासोने की तस्वीर भी है। हर कोई बराबर। लगता है नेताओं की तस्वीरों को लेकर यहां भारत जैसा कोई विवाद नहीं होता। यह कमरा भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के दफ्तरों की तरह लगता है, जहां मार्क्स और लेनिन के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं की तस्वीरें लगी होती हैं। यहां मार्क्स और लेनिन नजर नहीं आते।
प्रेसिडेंट पैलेस से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यहां लाओस के राष्ट्रपति रहते हैं। यह लाओस की सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र है। यहीं लाओस के नेता दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं के साथ मुलाकात और वार्ता वगैरह करते हैं। राष्ट्रपति लेफ्टिनेंट जनरल चाउम्मले सायासोने और लाओस के उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री से इसी पैलेस में भारतीय उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने 18 सितंबर को लाओस यात्रा के दौरान मुलाकात की थी।
चूंकि पूरे परिसर में अंकित जानकारियां लाओ भाषा में हैं, यहां तक कि तस्वीरों में दर्ज नाम भी, तो पता नहीं चलता कि आखिर इसमें लिखा क्या है। अलबत्ता बड़े होटलों और मॉल वगैरह में साइन बोर्ड अंग्रेजी में चमकते दिखते हैं। लाओस की सरकार अब प्राथमिक स्कूलों में अंग्रेजी पर जोर दे रही है। मगर 2008 में प्राथमिक स्कूलों में कक्षा तीन से अंग्रेजी की शिक्षा शुरू किए जाने के बाद तीस फीसदी स्कूलों में ही अंग्रेजी की पढ़ाई हो रही है। 18 सितंबर को विएनताइन टाइम्स में पहले पेज पर छपी एक खबर से पता चलता है कि लाओस की कम्युनिस्ट सरकार भी मानती है कि जॉब मार्केट की जरूरतों के अनुरूप अंग्रेजी जानने वाले कामगार तैयार करना बड़ी चुनौती है!
भाषा की अड़चन बाजारों में भी महसूस होती है। मगर यहां भी डॉलर विदेशी ग्राहक और दुकानदार के बीच सहज रिश्ता बना लेता है। पैसे की कोई भाषा नहीं होती, वह अपने आपमें एक भाषा है। इस कम्युनिस्ट देश की मुद्रा किप का तो कंबोडिया की मुद्रा रियाल से भी बुरा हाल है। एक डॉलर 8200 लाओटियन किप के बराबर। भारत के एकमात्र कम्युनिस्ट पार्टी शासित राज्य त्रिपुरा से लगभग दोगुनी आबादी (करीब 70 लाख) वाला लाओस अभी गरीबी से नहीं उबर पाया है।
आठ फीसदी से कुछ ऊपर की विकास दर के साथ आगे बढ़ रहे लाओस ने भी चीन की राह पर चलते हुए आर्थिक उदारीकरण को अपनाया है। विएनताइन की सड़कों से गुजरते हुए एहसास नहीं होता कि म्यांमार, कंबोडिया, चीन, थाईलैंड और वियतनाम से से घिरे इस देश ने कभी गृहयुद्ध की विभीषिका झेली थी।
महज साढ़े सात लाख की आबादी का यह शहर काफी व्यवस्थित नजर आता है। सड़कों पर जिस तरह से ट्रैफिक व्यवस्थित है, वैसे ही बाजारों में दुकानें। आबादी के अनुपात में यहां गाड़ियां भी अधिक दिखती हैं। टोयोटा, होंडा, ह्युंडई सहित तमाम बड़े ब्रांड के वाहन दिख जाएंगे। करीब आधा किमी तक फैले नाइट मार्केट में हल्की बारिश के बीच दुकानों के ऊपर तनी छतरियां तक दूर से कतार में दिखाई देती हैं।
कहते हैं किसी शहर की असली खूबसूरती रात में दिखती है। विएनताइन भी रात को खूबसूरत लगता है। और यदि आप मेकांग नदी के किनारे स्थित किसी खुले रेस्तरां में बैठे हों, तो सामने थाईलैंड के नोंगखाई शहर की जगमगाती रोशनी नजर आएगी। आसियान के इन दोनों देशों की सरहद पर स्थित फ्रैंडशिप ब्रिज से वहां तक आप वहां पहुंच सकते हैं। भारत से लाओस की सीधी उड़ान नहीं है, लेकिन जैसा कि प्रस्तावित है, थाईलैंड तक भारत सड़क मार्ग से पहुंच बना ले, तो लाओस तक पहुंचना भी आसान हो सकता है।