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उत्सवधर्मिता से जुड़ता है समाज

Fri, 01 Nov 2013 09:26 PM IST
विश्वनाथ त्रिपाठी
विश्वनाथ त्रिपाठी Updated Fri, 01 Nov 2013 09:26 PM IST
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festivals and society

हमारे देश में जितने भी पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं, वे किसी न किसी मिथक पर आधारित हैं। दीपावली के बारे में भी यह मिथक प्रचलित है कि भगवान श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण के साथ इसी दिन अयोध्या लौटे थे। बुराई पर अच्छाई की जीत की उसी खुशी में अयोध्या के लोगों ने दीये जलाए थे। तभी से दीपावली का पर्व मनाया जाता है।

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हमारे सभी त्योहार मौसम, ऋतुओं और फसलों आदि से सुसंबद्ध हैं। इनकी एक परंपरा है, संस्कृति है और इतिहास भी है। हमारी ये उत्सवधर्मी परंपराएं समाज को संबल प्रदान करती हैं। इनका एक खास सांस्कृतिक महत्व है, संकट के क्षणों में ये हमें डटकर जूझने एवं उससे उबरने में मदद करती हैं। रोशनी का उत्सव दीपावली हमें समाज के कुरूप एवं अंधेरे पक्षों से लड़ने एवं उससे उबरने की प्रेरणा देता है। इस लिहाज से आज जब जीवन एवं समाज के हर क्षेत्र में सांस्कृतिक मूल्यों एवं मर्यादाओं का लगातार क्षरण हो रहा है, यह पर्व याद दिलाता है कि हमें अपने देश एवं समाज को इन अंधेरों से मुक्ति दिलानी है। इस पर्व का मूल मंत्र है-तमसो मा ज्योतिर्गमय। अंधेरे से हमें उजाले की ओर ले चलो।
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आजादी के बाद हमारे देश ने काफी प्रगति की है। हमारी गिनती तेजी से आर्थिक विकास करने वाले देशों में हो रही है। लोगों के पास काफी पैसा आया है, समृद्धि आई है। लेकिन दुख की बात है कि समृद्धि तो आई है, लेकिन मूल्यों का क्षरण हो गया है। मध्यवर्ग के पास आज इतना पैसा आ गया है कि उसका अतिशय दुरुपयोग हो रहा है। आज दीपावली का मतलब रह गया है महंगे-महंगे उपहार देना, जुआ खेलना, शराब पीना और खूब खरीदारी करना। पहले इस तरह का तामझाम दीपावली में देखने को नहीं मिलता था।
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मुझे याद है, जब बचपन में मैं अपने गांव में रहता था, तो हम लोग मिट्टी के दीये जलाते थे। मगर अब तो मिट्टी के दीयों का चलन ही खत्म-सा हो गया है। इसका दुष्प्रभाव यह हुआ कि कुम्हारों की आजीविका पर संकट आ गया। मिट्टी के दीये में तेल डालकर उसे जलाया जाता था, जो आंखों को शीतलता प्रदान करती थी। मन को सुकून पहुंचता था। लेकिन आज बिजली के तरह-तरह के लट्टू जलाए जाते हैं। दीपावली के समय लोग सिर्फ अपने घरों को ही नहीं, अड़ोस-पड़ोस में भी साफ-सफाई करते थे।

इसका मकसद होता था, तमाम तरह की बुराइयों को दूर भगाना। शहरों में आज समृद्ध लोगों के घरों में इतना ज्यादा प्रकाश किया जाता है कि आंखें चौंधिया जाती हैं। पटाखे उस जमाने में भी छोड़े जाते थे, लेकिन इतने ज्यादा नहीं। इस तरह कानफोड़ू शोर नहीं होता था। इससे बीमार एवं बुजुर्ग लोगों को तो परेशानी होती ही है, कई बार बच्चे भी घायल हो जाते हैं। अपनी खुशी एवं उल्लास के लिए दूसरों को तकलीफ पहुंचाना ठीक नहीं है। इस धमाकेदार दिवाली के कारण पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है। हमारे पिताजी के कुछ मुसलमान दोस्त थे, जिन्हें हम दिवाली के अवसर पर आमंत्रित करते थे। उनका खाना हमारे यहां ही होता था। इस तरह से दिवाली सांप्रदायिक सद्भाव एवं भाईचारे का संदेश भी देती है। लेकिन आज जिस तरह की दिवाली मनाई जाने लगी है, उससे खुशियां कम, हताशा ज्यादा पैदा होती है।

यह एक कटु सच्चाई है कि देश का एक बड़ा तबका आज भी भूख, गरीबी और कुपोषण से लड़ रहा है। जाहिर है, हमारे देश में विकास का जो मॉडल अपनाया गया है, वह देश की सामासिक संस्कृति के अनुरूप नहीं है। वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति वाले इस देश में आज इतनी संवेदनहीनता देखी जा रही है कि रिश्तों तक में प्यार नहीं बचा है। एक तरफ जहां समृद्ध लोगों के पास बड़ी-बड़ी गाड़ियां, आलीशान बंगले हैं, वहीं हजारों बेघरों के सिर पर छत नहीं है।

समाज का नव-धनाढ्य समृद्ध तबका विलासी एवं अश्लील जीवन जी रहा है, जो गरीब एवं वंचित तबकों में हताशा पैदा करता है। वह भी वैसा ही जीवन जीना चाहता है। बड़ी-बड़ी गाड़ियां, आलीशान बंगले, अश्लील एवं विलासी जीवन उन्हें आसानी से पैसा बनाने के लिए अपराध के रास्ते पर धकेलते हैं। आज महिलाओं के खिलाफ जो अपराध बढ़े हैं, उसकी एक बड़ी वजह आर्थिक विषमता ही है। इन आर्थिक असमानता एवं सांस्कृतिक विसंगतियों से निपटने में दीपावली जैसे पर्व प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

अंधेरे पर उजाले की जीत के इस पर्व के अवसर पर अगर हम चतुर्दिक पसरे अंधेरे को दूर करने का संकल्प लेंें, तभी दीपावली की वास्तविक खुशहाली फैलेगी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी अंधविश्वास के कारण काला जादू, तंत्र-मंत्र, जुआखोरी जैसी कुछ कुरीतियां हमारे देश में प्रचलित हैं। दीपावली के इस शुभ मौके पर हमें इन बुराइयों को अपने समाज से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेना चाहिए। लेकिन इसके अलावा भी कई तरह के स्याह पक्ष हैं, जिन्हें हमने खुद ही अर्जित किया है।


आज देश में चतुर्दिक भ्रष्टाचार की बात हो रही है। शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक फैले इस भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागरूकता की एक किरण काफी है। लोगों को जागरूक बनाने के लिए हमें साक्षरता की अलख जगानी होगी। भूख, गरीबी, अशिक्षा ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे हमें निपटना होगा। जिस तरह घुप्प अंधेरे के खिलाफ रोशनी की एक चिंगारी काफी होती है, उसी तरह इन तमाम चुनौतियों के खिलाफ एक ईमानदार कोशिश करने की जरूरत है।

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