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समरसता और सामूहिकता का त्योहार

Mon, 09 Mar 2020 04:38 PM IST
Raman Singh चित्रा मुद्गल
चित्रा मुद्गल Published by: Raman Singh Updated Mon, 09 Mar 2020 04:38 PM IST
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Festival of harmony and collectivity
होली - फोटो : a

प्रकृति जब वसंत के मौसम में हमें चारों ओर बिखरे रंग प्रदान करती है, उसी समय रंगों का त्योहार होली मनाया जाता है। इसी मौसम में बुजुर्ग पेड़ों में भी नई कोंपलें फूटती है, नन्हे पौधों में रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, उनसे पराग ग्रहण करने के लिए तितलियां उन पर मंडराने लगती हैं। लगता है कि पूरी प्रकृति अपने आंतरिक उल्लास को उत्सवित कर रही है। ऐसे में जब होली का त्योहार आता है, तो लगता है कि प्रकृति के उल्लास में जन-उल्लास की उन्मुक्त अभिव्यक्ति हो रही है। अपना बलम मोहे मांगे को दइ दे, फागुन के दिन चार सखी रे -इस तरह का खुलापन होता है होली के गीतों में। मुझे लगता है कि जैसे प्रकृति आह्वान करती है कि इस मौसम के रंगों में लीन हो जाइए और मन के मलाल, भीतर के कलुष को कांछकर फूलों की तरह खिलिए। अपने अंतर्मन को खिलकर लहलहाने दीजिए। होली प्रकृति के उन्मुक्त उल्लास को जीने का अवसर होता है।


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होलिका दहन की एक पौराणिक कथा भी इस त्योहार से जुड़ी है, जिससे हम इस पर्व की शुरुआत करते हैं। यह बुराई के दहन और अच्छाई को अंगीकार करने का उत्सव है। मगर आज जब वसंतोत्सव में होली का रंग घुलेगा, मेरा मन थोड़ा उदास है। इसका कारण यह है कि दिल्ली के वातावरण में नफरत के जो स्याह बादल मंडराने लगे हैं, वे हमारी गंगा-जमनी तहजीब को नुकसान पहुंचा रहे हैं। मुझे लगता है कि इस मौसम में प्रकृति हमें उत्सव, उल्लास और नई ऊर्जा का जो संदेश देती है, उसके खिलाफ हमने कुछ ऐसा जघन्य किया है, जो नहीं होना चाहिए था। यह हमारे आंतरिक उल्लास के प्रकटीकरण को अवरुद्ध करता है, हमारी सामाजिक समरसता को भंग करता है, हमारी सामूहिक संस्कृति के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करता है। इसके अलावा कोरोना वायरस के भय ने भी इस बार की होली का रंग फीका किया है। इस बार की होली हमें यह संदेश दे रही है कि होलिका के साथ हम अपने भीतर पैठे नफरत व भय को फूंकें। उन गुलेलों, उन बंदूकों को भी फूंकने की जरूरत है, जिसने हमारी समरसता को भंग किया है और भाईचारे व इंसानियत को शर्मिंदा किया है। इस त्योहार का हम तभी पूरा आनंद ले सकते हैं, जब अपने भीतर क्षमा भाव को भी महसूस करें, जो तमाम मलालों को धो डालता है।

मेरे मन में यह सवाल उठता है कि होली का जो सतरंगी लोकतत्व है, वह धीरे-धीरे हमारे भीतर से लुप्त क्यों होता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि होली की वह इंद्रधनुषीय छटा लोगों को अच्छी नहीं लगती। उस लोकतत्व में आज भी लोगों को प्रफुल्लित करने की क्षमता है। अवध में होरी खेलत रघुवीरा -यह गीत हम जब भी कहीं सुनते हैं, तो मन झूमने लगता है। होली हमें यही सिखाती है कि उस सामूहिकता को, उस समरसता को हमें जिंदा रखना है। यही प्रकृति का भी मूल संदेश है। हमें नई पीढ़ी को यह बताने की जरूरत है कि जब फाग, रंगों, पिचकारी और अबीर-गुलाल की बात होती है, तो सामूहिक समरसता की भी बात होती है। हमें अपनी परंपरा के इस सकारात्मक पक्ष को जिंदा रखने की जरूरत है।

मुझे उन्नाव के अपने गांव निहाली खेड़े की होली की याद आती है, जहां मैं चौथी कक्षा तक पढ़ी थी। वहां रासायनिक रंगों और प्लास्टिक की पिचकारी के साथ होली नहीं मनाई जाती थी। मिट्टी के बड़े-बड़े ढोले (बर्तन) में टेसू और विभिन्न प्रकार के फूलों से प्राकृतिक रंग बनाए जाते थे और पीतल या बांस की पिचकारी से होली खेली जाती थी। पूरे गांव में फाग गाया जाता था। परातों में गुझिया, मालपुआ, सूखे मेवे, गुलगुले सजाकर दरवाजे पर रखे जाते थे, और आने वालों को बांटा जाता था। पान के बीड़े भी दिए जाते थे। मेरी दादी परात में गुलगुले, गुझिया, लइया, ठंडाई आदि जन-मजूरों व दलित टोलों में भिजवाती थी, ताकि वे सब भी होली का उत्सव उमंग और उल्लास के साथ मना सकें। यह समरसता और सामूहिकता का उदाहरण था, जो मुझे शहरों में कहीं नहीं दिखा।

जब मैं मुंबई गई, तो वहां धर्मवीर भारती लेखकों-पत्रकारों को मिल-जुलकर होली मनाने के लिए प्रेरित करते थे। वह होली के गीतों से इसकी शुरुआत करते थे और हम सब मिलकर उन गीतों को गाते थे तथा परस्पर होली का आनंद बांटते थे। ऐसी ही होली मुझे दिल्ली में भी मनाने का मौका मिला, जब मैं दिल्ली के मयूर विहार इलाके में रहने आई। जो काम मुंबई में धर्मवीर भारती और पुष्पा जी करती थीं, वही काम यहां शानी जी करते थे। शानी जी हमारे पड़ोस में ही रहते थे। वह होली से चार दिन पहले ही सबको होली के लिए कुछ न कुछ पकवान बनाने के लिए कहते थे। उनकी पत्नी सलमा जी गुझिया और कचौड़ी बनाती थीं। फिर होली के दिन वे सबके घर जाकर सबको बाहर निकालते थे। उनमें रामशरण जोशी, पंकज बिष्ट, विष्णु नागर आदि मयूर विहार के सभी पत्रकार-साहित्यकार शामिल होते थे। शानी जी की पत्नी घर से बनाकर लाई गुझिया सबको खिलाती थीं और हम सभी रंग-गुलाल में सराबोर हो जाते थे। आज बड़ी शिद्दत से मैं उनके साथ मनाई होली को याद करती हूं, क्योंकि आज कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो कहे कि रंग-गुलाल की थैली लेकर अपने घर से बाहर निकलिए, हम बाहर खड़े हैं।

मुझे लगता है कि आज ऐसे लोगों की ज्यादा जरूरत है, खासकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के उन घरों के लिए, जहां इन दिनों मरघट की उदासी पसरी हुई है। उस इलाके के और आसपास के लेखकों-पत्रकारों को चाहिए कि वे उन उजड़े घरों में जाएं। वे घर चाहे किसी भी वर्ग, पंथ, समुदाय के हों, उन घरों में होली की खुशियां पहुंचनी चाहिए। उन्हें यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि आपने जो खोया है, उसे हम महसूस करते हैं और हम सब आपके साथ हैं और होली के अवसर पर हम आपको उदास नहीं छोड़ सकते हैं। होली उदासी को खत्म करने का त्योहार है, क्योंकि हम देखते हैं कि हमारे घरों के गमलों में नए फूल खिल आए हैं, जो पतझड़ की उदासी के खत्म होने का संकेत है, जो नई उम्मीद का संकेत है। जो अघटित घटा है, उसे संवारने की जिम्मेदारी भी हमारी है।

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