फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Female Equality: The struggle is long

महिला समानता ः संघर्ष लंबा है

Tue, 27 Jun 2017 07:00 PM IST
ऋतु सारस्वत
ऋतु सारस्वत Updated Tue, 27 Jun 2017 07:00 PM IST
विज्ञापन
Female Equality: The struggle is long
ऋतु सारस्वत

कभी पुरुष क्रिकेटरों से पूछा कि पसंदीदा महिला क्रिकेटर कौन है?' आईसीसी महिला वर्ल्ड कप की शुरुआत से ठीक एक दिन पहले, एक पत्रकार के प्रश्न के जवाब में भारतीय कप्तान मिताली राज के ये शब्द, संपूर्ण पितृसत्तात्मक व्यवस्था को कठघरे में ला खड़ा करते हैं। आधुनिकता का लबादा ओढ़े, उच्च स्वरों में महिला सशक्तीकरण की पैरवी करने वाली जमात, स्त्री की हर सफलता के पीछे कोई 'नायक' ढूंढ़ने का प्रयास करती है। हर वह क्षेत्र, जो तथाकथित रूप से पुरुषों का गढ़ माना जाता है, वहां स्त्री की उपस्थिति आज भी सहज स्वीकार्य नहीं है। और अगर वह अपनी क्षमता, अपनी काबिलियत के बलबूते, ऐसी जगहों पर सेंध लगा भी देती है, तो उसे पीछे धकेलने के हर संभव प्रयास किए जाते हैं।

विज्ञापन


विश्व क्रिकेट हो या आईसीसी वर्ल्ड कप, भारतीय क्रिकेट की सफलता के लिए मन्नत के डोरे बांधने से लेकर यज्ञ करने वाली युवा पीढ़ी तो इस बात से भी अनजान है कि देश में महिला क्रिकेटरों की टीम है, जो विश्व की श्रेष्ठ टीमों में से एक है। क्रिकेट ही क्यों, खेल का कोई भी क्षेत्र हो, यह स्थिति हर जगह व्याप्त है। खेलों पर अपना एकाधिकार जताने की मानसिकता सिर्फ भारतीयों की नहीं है, यह स्थिति बदस्तूर विश्व भर में कायम है। विश्व में प्रथम रैंकिंग प्राप्त टेनिस खिलाड़ी जोकोविच ने पिछले वर्ष कहा था, 'पुरुष खिलाड़ियों के मैचों को दुनिया भर में महिलाओं के मैचों से ज्यादा देखा जाता है, इसलिए पुरुष खिलाड़ियों की कमाई ज्यादा होनी चाहिए।' इससे पहले इंडियन वेल्स टूर्नामेंट के मुख्य कार्यक्रम अधिकारी रेमंड मूर ने कहा था, 'डब्ल्यूटीए टूर पुरुष खिलाड़ियों की बदौलत ही चल रहा है।'
विज्ञापन


स्त्री के प्रति विभेद के स्वर इससे भी अधिक गहरे हैं। हाल ही में यूरोपीय संसद में, पोलैंड के एक सांसद ने कहा कि, 'महिलाएं बौद्धिक रूप से पुरुषों के बराबर होती हैं, पर उन्हें पुरुषों से कम वेतन मिलना चाहिए, क्योंकि वे कमजोर हैं, छोटी हैं।' पुरुषों और स्त्रियों के बीच असमानताएं प्राकृतिक नहीं, बल्कि सामाजिक हैं। यदि स्त्रियां जैविक रूप से अक्षम होतीं, तो विश्व के कई हिस्सों में व्याप्त मातृवंशीय परिवार कब के ध्वस्त हो चुके होते।
विज्ञापन
विज्ञापन


इप्सॉस मोरी ग्लोबल ट्रेड, के 22 देशों में किए गए अध्ययन बताते हैं कि जहां 64 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि समाज में महिला की भूमिका सिर्फ अच्छी मां और पत्नी की होनी चाहिए, वहीं रूस में 69 प्रतिशत लोगों की यह विचारधारा है। अमेरिका भी, स्त्री के अस्तित्व को इन्हीं खाकों में बांधता है। 1963 तक अधिकतर अमेरिकी न तो यह विश्वास करते थे कि लैंगिक समानता संभव है और न ही इसकी आवश्यकता समझते थे। यहां तक कि स्वयं वहां की महिलाएं यह विश्वास करती थीं कि घर के महत्वपूर्ण निर्णय घर के पुरुष सदस्यों द्वारा ही लिए जाने चाहिए। महिलाओं के विरुद्ध असमानता के खिलाफ प्रतिबद्धता दिखाने के लिए 18 दिसंबर, 1979 में 'द कन्वेन्शन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेन्स्ट वुमन' के घोषणा पत्र में, 189 देशों के हस्ताक्षर में, अमेरिका की गिनती आखिरी देश के रूप में की जा सकती है। 2015 में अमेरिका ने घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। ब्रिटेन और फ्रांस भी उन देशों में से एक है, जहां महिला समानता का संघर्ष आज भी जारी है। हमंे यह स्वीकारना ही होगा कि क्षेत्र चाहे जो भी हो, महिला समानता का संघर्ष अभी लंबा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed