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बड़के की संवेदना

Mon, 29 Jul 2013 08:50 PM IST
गोपाल चतुर्वेदी
गोपाल चतुर्वेदी Updated Mon, 29 Jul 2013 08:50 PM IST
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feeling of big brother

शहर में आग लगे, गोली चले, डाका पड़े, बम फटे; वह समझते हैं कि उनका एक ही काम है, संवेदना प्रकट करना। हमें शक है, सत्ताधारियों की साठगांठ जरूर किसी ‘थोक संवेदना आपूर्ति केंद्र’ से होगी।

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देश भर में सैकड़ों हादसे होते हैं। बड़के कुछ और तो करते नहीं, संवेदना प्रकट करते हैं। मन ही मन उन्हे सच्चाई का आभास है। चूक व्यवस्था की है। वही दुरुस्त होती, तो यह सब क्यों होता? बूता होता, तो व्यवस्था के कल-पुर्जे कसते, नहीं है, तो संवेदना प्रकट करते हैं।
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उनका निजी सचिव, वैयक्तिक सहायक, जनसंपर्क अधिकारी सब इधर सिर्फ संवदेना का पूर्णकालीन कर्तव्य निभाते हैं। झट दुर्घटना, पट सूचना, झटपट संवेदना-संदेश। कर्मचारी बड़के का हो या छुटभइये का, उसे आजकल संवेदना केंद्र के सामने अक्सर पाया जाता है।
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संवाद कुछ इस अंदाज में चलता है, 'सर! कितने टन संवेदना?' जवाब, 'आप तो अनुभवी हैं, तै कर लो।' 'पर अवसर क्या है?' बड़के का संपर्क अधिकारी वारदात बयान करता है। 'कितने अल्प, कितने बहुसंख्यक?' 'कुल जमा चालीस खर्च हुए, चिल्लर मिलाकर। उनमें से बस दस अल्पसंख्यक हैं।' 'अस्सी प्रतिशत हमदर्दी और बीस प्रतिशत सुधार का आश्वासन चलेगा?' 'यह जिम्मा आप का है, आप ही जानो।'

संवेदना केंद्र का बंदा समझदार है। वह मुआवजे के प्रावधान बिना राशि के और सुधार के लिए कमेटी-कमीशन का जिक्र कर धांसू संवेदना-संदेश हाथों-हाथ अधिकारी को सौंपता है।

बड़े का ख्याल है कि खाली-पीली सतही संवेदना से वह न सिर्फ जनता से जुड़ा है, बल्कि मुल्क की आर्थिक तरक्की में भी उसका योगदान है। संवेदना के मौकों की दिन-दूनी, रात चौगुनी प्रगति से जूझने में अधिकारियों की मदद करने के लिए उसने अपने साले को संवेदना-सहायक नियुक्त किया है। संवेदना का उसूल यही है।

शाब्दिक सहानुभूति, एहसास का न होकर, दिखावे का ढोंग है। जहां उसका अंत है, महसूस की हुई संवेदना की शुरुआत है। बड़ों में, बहुधा यह खुद के घर-परिवार तक सीमित है।


बड़े की संवेदना का प्रभाव बहुआयामी है। एक ओर कागज की खपत बढ़ती है, दूसरी ओर पेड़ों की कटाई। पर्यावरण की तबाही तो हो ही रही है। संवेदना जता कर, समस्या को भूलना 21वीं सदी का फैशन है। आजकल लोग दुर्घटना से कम, संवेदना से ज्यादा मरते हैं। यह कीटनाशक से खतरनाक किस्म का जहर है, जो गरीब बच्चों के स्कूली खाने में चाव से परोसा जा रहा है!

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