यह परिदृश्य डराने वाला है
देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों द्वारा हाल ही में कराए गए दो अलग-अलग चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजे बता रहे हैं कि सोलहवीं लोकसभा में यूपीए और एनडीए बहुमत से बहुत दूर रह जाने वाले हैं और इन दोनों गठबंधनों से इतर क्षेत्रीय दल बड़ी ताकत के रूप में उभरने वाले हैं। चुनाव निर्धारित समय पर हों या दो-चार महीने पहले, यह परिदृ्श्य ज्यादा बदलने वाला नहीं है। भ्रष्टाचार और घोटालों के दलदल में गले तक डूबी यूपीए-2 की नाकारा सरकार से आजिज आ चुके मतदाताओं के लिए आगामी लोकसभा चुनाव सत्ता बदलने का बेहतरीन मौका है, पर एनडीए की अगुआ भाजपा के हाराकीरी के रास्ते पर चलने और क्षेत्रीय दलों के क्रमशः मजबूत होते जाने के मद्देनजर लगभग तय है कि मतदाता स्पष्ट जनादेश देने नहीं जा रहा है। नतीजे में हमें जो नई सरकार मिलने वाली है, उसे बनाने के क्रम में तमाम सिद्धांतों, विचारों और कार्यक्रमों की बलि चढ़ना तथा कई छोटी-मोटी बैसाखियों की जरूरत पड़ना अवश्यंभावी है। इस क्रम में कॉरपोरेट जगत की थैलियां भी अपना खेल खेलने से बाज नहीं आएंगी। जाहिर है कि आसन्न परिदृश्य डराने और चिंतित करने वाला है।
वर्ष 1977 और 1989 के जनता प्रयोगों और 1996 और 1998 में भाजपा के नेतृत्व में बनी अल्पमत सरकारों का हश्र करीब से देख चुका और वास्तविक देशहित व लोकहित की चिंता करने वाला कोई भी विवेक संपन्न व्यक्ति नहीं चाहेगा कि वह इतिहास फिर दोहराया जाए, लेकिन यह चाहत मैदानी हकीकत से मेल नहीं खाती। जब छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति में आकंठ डूबी हमारी नेता बिरादरी के एक बड़े वर्ग का एकमेव लक्ष्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता पाना और उसकी बंदरबांट करना ही रह गया हो, तब उससे ज्यादा उम्मीद की ही क्यों जानी चाहिए। लेकिन, जब तक हम वर्तमान लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का बेहतर विकल्प और जन-आकांक्षाओं को वास्तविक रूप में अभिव्यक्त करने वाली चुनाव प्रणाली नहीं तलाश पाते हैं, तब तक हमें इसी व्यवस्था में नए रास्ते तलाशने हैं। समय का तकाजा है कि हम यह तलाश अभी से शुरू कर दें।
त्रिशंकु लोकसभा गठित होने पर नई सरकार के गठन में स्वाभाविक तौर पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। किसी भी गठबंधन या दल के नेता को नई सरकार बनाने का निमंत्रण देने के पहले राष्ट्रपति को इस बात के लिए आश्वस्त होना होगा कि उस नेता को लोकसभा में बहुमत हासिल है। जब यूपीए और एनडीए 150-175 सीटों का आंकड़ा छू पाने की स्थिति में नजर नहीं आ रहे हैं और तीसरा या चौथा मोर्चा सिर्फ ख्याली पुलाव की तरह पक रहा है, तब राष्ट्रपति के लिए यह तय करना बेहद मुश्किल होगा कि सरकार बनाने के लिए किसे न्योता दिया जाए। यह मुश्किल सामने आकर खड़ी हो ही जाए और ऐन मौके पर उससे बाहर निकलने के उपाय तलाशे जाएं, इससे बेहतर होगा कि उपयुक्त मंचों पर अभी से इस बारे में गंभीरतापूर्वक विचार शुरू कर दिया जाए।
सर्वदलीय बैठकें इस विचार प्रक्रिया का सबसे अच्छा मंच हो सकती हैं, लेकिन हमारे देश में ये बैठकें जिस तरह से आयोजित होती रही हैं, उससे उनकी निरर्थकता जग-जाहिर है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें, तो राजनीतिक पार्टियां इन बैठकों में किसी विषय पर गंभीर-सार्थक विचार-विमर्श करने के बजाय एक-दूसरे को नीचा दिखाने और तू-तू, मैं-मैं करने के अवसर के रूप में इसका इस्तेमाल करती रही हैं। फिर भी, इस विकल्प को आजमाने की एक कोशिश करने में हर्ज नहीं है।
संभावित चुनावी नतीजों के मद्देनजर राष्ट्रपति के सामने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से सलाह मांगने का विकल्प भी मौजूद है, लेकिन यहां भी दो बडे़ पेच हैं। पहला, इस प्रावधान के तहत राष्ट्रपति खुद पहल कर शीर्ष अदालत से परामर्श नहीं मांगते, बल्कि सरकार राष्ट्रपति के माध्यम से परामर्श मांगती है। दूसरा, न तो न्यायालय वह परामर्श देने के लिए बाध्य है और न ही राष्ट्रपति या सरकार उसे मानने के लिए। मौजूदा हालात में यूपीए सरकार अपने स्तर पर तो सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगने से रही। अभूतपूर्व और असामान्य परिस्थिति में राष्ट्रपति अपनी पहल पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांगने का विकल्प अपना सकते हैं, मगर चुनावी नतीजे आने के पहले ऐसा करना शायद ही संभव हो, क्योंकि न्यायालय काल्पनिक या संभावित नतीजों को संज्ञान में लेने से रहा।
राष्ट्रपति संविधान विशेषज्ञों की एक अनौपचारिक समिति बनाकर उससे भी राय मांग सकते हैं कि किसी भी दल या गठबंधन के बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा पाने की स्थिति में उन्हें सरकार बनाने के लिए किसे निमंत्रित करना चाहिए। इस समिति के सदस्यों का चयन करने में राष्ट्रपति को विशेष सावधानी बरतनी होगी। हालांकि, ऐसी किसी समिति का प्रावधान संविधान में नहीं है, फिर भी, वह विचार-विमर्श के जरिये संविधान-सम्मत उपयोगी सुझाव तो दे ही सकती है। समिति के सुझाव राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी भले न हों, पर उनसे अंधी गली से निकलने का कोई रास्ता तो सूझ ही सकता है।
माना कि अस्थिर या कमजोर सरकारें किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अजूबा नहीं हुआ करतीं, पर जब ऐसी सरकारें लोक-आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, तब न केवल उन पर, बल्कि पूरी व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा टूटने लगता है। यह नौबत न आने पाए, इसके लिए पहले से तैयारी करना जरूरी है। चुनाव सर्वेक्षणों ने इस तैयारी की जरूरत इंगित कर दी है।