विज्ञापन
विज्ञापन

भरोसे के बावजूद पुलिस का डर, पर्दाफाश करती एक रिपोर्ट

शाकिब अयाज Updated Wed, 11 Sep 2019 04:32 AM IST
पुलिस
पुलिस - फोटो : a
ख़बर सुनें
भारतीय पुलिस, जिसकी स्थापना 1843 में हुई और जो अब भी काफी हद तक ब्रिटिश कालीन भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 के अनुसार काम करती है, भारत के वर्ग, जाति, लिंग और धार्मिक विविधता के साथ तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रही है। इसका कारण प्रशिक्षण, संवेदनशीलता का अभाव और/या स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार पुलिसकर्मियों में निहित पक्षपात की भावना हो सकती है।
विज्ञापन
कॉमन कॉज और दिल्ली स्थित शोध संस्थान विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की एक संस्था लोकनीति के द्वारा जब हमने भारत के 22 राज्यों में एक सर्वे किया, तो उत्तरदाताओं के बीच विरोधाभासी दावे पाए गए, जहां लोगों ने बेवजह उत्पीड़न और फंसने के डर के बावजूद पुलिस में उच्च स्तर का भरोसा जताया। कम से कम 44 फीसदी लोगों ने पीटे जाने का डर व्यक्त किया, 38 फीसदी लोगों ने झूठे आरोप में गिरफ्तार करने का भय जाहिर किया, 38 फीसदी को झूठे मामलों में फंसने का डर था, 29 फीसदी महिलाओं ने यौन उत्पीड़न का डर जताया, 54 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें पुलिस बर्बरता का व्यक्तिगत अनुभव है, और 51 फीसदी लोगों का मानना है कि पुलिस वर्ग के आधार पर भेदभाव (यूपी और बिहार में 73 फीसदी तक) करती है। ऐसी नकारात्मक राय के बावजूद, 69 फीसदी लोगों ने पुलिस पर विश्वास जताया और 65 फीसदी लोगों ने पुलिस के प्रति उच्च संतुष्टि का दावा किया।

पुलिस बर्बरता के बारे में जागरूकता के बावजूद, पुलिस में विश्वास और संतुष्टि भारत में एक प्रचलित 'राष्ट्रवादी' वातावरण के रूप में देखी जा सकती है, जो कथित तौर पर शासन और कानून के राज को कमजोर करता है, लेकिन राज्य-नियंत्रित संस्थानों के पक्ष में विश्वास और वफादारी की मांग करता है। शोषण और अकर्मण्यता के बावजूद कई लोग पुलिस को भारी समर्थन देंगे, क्योंकि लोकतांत्रिक शासन की संरचना लोकतांत्रिक संस्थानों के अस्तित्व पर ही निर्भर करती है। रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि कम से कम 50 प्रतिशत लोग पुलिस हिरासत में कथित अपराधियों के खिलाफ हिंसा को समर्थन देते हैं। हिंदुओं और मुसलमानों ने पुलिस हिंसा का समान रूप से समर्थन किया, जबकि अनुसूचित जनजाति (एसटी) और ईसाई उनसे कम सहमत थे। कम से कम 48 प्रतिशत ग्रामीण भारतीय पुलिस हिंसा का समर्थन करते हैं; शहरी आंकड़े से सात प्रतिशत कम। एसटी और ईसाई ऐसे समुदाय हैं, जो अपने मुद्दों को लेकर कम मुखर रहे हैं और उन्हें राजनीतिक रूप से हाशिए पर माना जा सकता है, जबकि संस्थागत भेदभावों का सामना करने के बावजूद दलित और मुस्लिम नफरती हमलों के खिलाफ विरोध करके अपना गुस्सा जताने में सक्षम रहे हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्हें पुलिस पर अधिक भरोसा करने की अनुमति देती है।

 जिन राज्यों में पुलिस हिंसा को भारी समर्थन मिला, वे हैं-तमिलनाडु (61.5 फीसदी), गुजरात (58.1 फीसदी), केरल (61.2 फीसदी) और दिल्ली (60.1 फीसदी)। जिन राज्यों में पुलिस हिंसा का काफी विरोध किया गया, वे राज्य हैं- हिमाचल प्रदेश (54.1 फीसदी), ओडिशा (42.2 फीसदी) और पश्चिम बंगाल (42.2 फीसदी)। शुरू के तीन राज्य ज्यादा औद्योगिकीकृत और शिक्षित हैं, तथा बाद के तीन राज्यों की तुलना में ज्यादा जीवंत माने जाते हैं। एक धारणा है कि आधुनिकीकरण, धन, शहरीकरण और उच्च शिक्षा मानव अधिकारों के लिए ज्यादा सम्मान का कारण बनते हैं, लेकिन सर्वे के निष्कर्ष शासन के इस तरीके का समर्थन नहीं करते हैं।

केरल को छोड़कर दक्षिण भारत में पुलिस का डर ज्यादा पाया गया। पंजाब को छोड़कर उत्तर भारत में पुलिस का डर कम था। हमारी रिपोर्ट में इस मिथक का पर्दाफाश किया गया है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में पुलिस—प्रशासन, शिक्षा, औद्योगिकीकरण और सामाजिक और आर्थिक विकास के अन्य पहलुओं के मामले में ज्यादा लोक हितैषी वातावरण में काम करती है।

दक्षिण भारतीय राज्यों में मुसलमानों को देश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में पुलिस (61 प्रतिशत) से अधिक भय है, संभवतः आतंकवाद के मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर गिरफ्तारी की अधिक संख्या के कारण। सिखों (46 फीसदी) ने एक धार्मिक समुदाय के रूप में पुलिस का डर ज्यादा बताया। हिंदुओं में अन्य पिछड़ी जातियों (52 फीसदी), अनुसूचित जातियों (45 फीसदी) और अनुसूचित जनजातियों (45 फीसदी) ने पुलिस के भारी डर की बात बताई, जबकि सवर्ण जातियों (36 फीसदी) ने पुलिस के डर को कम बताया। इन आंकड़ों को पुलिस बल में इन कमजोर समूहों के प्रतिनिधित्व और आरक्षण व्यवस्था की विफलता के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।

इस रिपोर्ट में ओबीसी के राजनीतिक मिथकों का भी भंडाफोड़ किया गया है, जिसमें कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों में आरक्षण सरकारी नौकरियों को खा गया है। यह तर्क देता है कि आरक्षण किसी भी राज्य में सामुदायिक आबादी के अनुपात में है। अन्य पिछड़ी जाति के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के शासन काल में उत्तर प्रदेश में ओबीसी को आरक्षित कोटा का 40 फीसदी से भी कम मिला, जबकि आरक्षित सीटों का प्रतिशत 2013 में जहां 61 फीसदी था, वह 2016 में 39.6 फीसदी रह गया।

कमजोर समुदायों के लोगों ने पुलिस पर फर्जी आरोपों में फंसाने का आरोप लगाया है। अपराध में कमी देखने की उत्सुकता में नागरिक पुलिस पर भरोसा करते हैं। जहां तक अपराध की जांच और सजा की बात है, लोग आम तौर पर प्रक्रियाओं और कानूनी सिद्धांतों की परवाह नहीं करते हैं-इस प्रवृत्ति को मनोरंजन उद्योग और मीडिया द्वारा बढ़ावा दिया गया है। इसका प्रकोप सबसे ज्यादा मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों को झेलना पड़ता है।
विज्ञापन

Recommended

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ही है कॉमकॉन 2019 की चर्चा का प्रमुख विषय
Invertis university

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ही है कॉमकॉन 2019 की चर्चा का प्रमुख विषय

सर्वपितृ अमावस्या को गया में अर्पित करें अपने समस्त पितरों को तर्पण, होंगे सभी पूर्वज प्रसन्न, 28 सितम्बर
Astrology Services

सर्वपितृ अमावस्या को गया में अर्पित करें अपने समस्त पितरों को तर्पण, होंगे सभी पूर्वज प्रसन्न, 28 सितम्बर

विज्ञापन
विज्ञापन
अमर उजाला की खबरों को फेसबुक पर पाने के लिए लाइक करें

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Most Read

Opinion

तेजस की कहानी जारी है

तेजस लड़ाकू विमान पर भारत के रक्षा मंत्री की उड़ान से न केवल भारतीय वायु सेना, बल्कि पूरे देश में बड़े पैमाने पर सकारात्मक संदेश गया है। बीवीआर मिसाइलों और शक्तिशाली कावेरी इंजन के एकीकरण के साथ तेजस बहुत शक्तिशाली हवाई हथियार साबित होगा।

20 सितंबर 2019

विज्ञापन

जीएसटी की दरों में बड़ा बदलाव, जानें किस पर मिली राहत, किससे बढ़ेगा जेब पर बोझ

जीएसटी काउंसिल ने शुक्रवार शाम अर्थव्यवस्था की सुस्ती को दूर करने के लिए किये जा रहे उपायों की मांग के बीच कई वस्तुओं पर कर की दर में कटौती करने का एलान किया।

20 सितंबर 2019

आज का मुद्दा
View more polls

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree