{"_id":"5b572bf54f1c1b44748b690d","slug":"fear-of-pakistaniization-of-india","type":"story","status":"publish","title_hn":"भारत के पाकिस्तानीकरण का डर","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
भारत के पाकिस्तानीकरण का डर
प्रदीप कुमार
Updated Tue, 24 Jul 2018 07:09 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
भारत के पाकिस्तानीकरण का डर
भारतीय जनता पार्टी दोबारा सत्ता में आई, तो वह संविधान का पुनर्लेखन कर भारत को हिंदू पाकिस्तान बना देगी- कांग्रेस नेता शशि थरूर के इस बयान पर राजनीतिक भूचाल स्वाभाविक था। थरूर ने इस वक्तव्य से वैचारिक द्वंद्व को इस बिंदु तक पहुंचा दिया कि कांग्रेस ने भी सार्वजनिक तौर पर पल्ला झाड़ लिया, हालांकि वह इस आशंका से शायद ही असहमत हो। भाजपा कांग्रेस की विचारधारा और मूल्यों के नकार पर आधारित है। कांग्रेस की स्थापना के 40 साल बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक ही वर्ष अस्तित्व में आए। कुछ साम्य के बावजूद कम्युनिस्टों का दर्शन भी मूलतः कांग्रेस के विपरीत था। इस तरह 1947 में भारत के सामने तीन दिशाएं थीं। इन सत्तर वर्षों में कम्युनिस्ट अपनी जमीन खो चुके हैं। यह दौर संघ परिवार के वर्चस्व का है।
यह वर्चस्व क्या आमूल-चूल परिवर्तन की हद तक जा सकता है? ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जाए बगैर इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास मुश्किल है। अफगानिस्तान की सीमा से लेकर विंध्य के इस पार तक समूचा भारत नफरत की लपटों में था, पाकिस्तान बन चुका था और संविधान सभा के बनने तक विद्धेष फैला हुआ था। कांग्रेस वर्किंग कमेटी का बहुमत जवाहरलाल नेहरू के साथ नहीं था। उनसे कई मसलों पर इत्तफाक न रखने वालों में सरदार वल्लभ भाई पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे दिग्गज थे, ऐसे नेता, जिन्हें भाजपा अपनी पंगत में शामिल करने की कोशिश करती रही है। उन स्थितियों में भारत हिंदू राष्ट्र नहीं घोषित हुआ, क्योंकि वह भारत की मेधा का उल्लंघन होता। अनेक सीमाओं के बावजूद संविधान सभा भारत की विविधताओं का प्रतीक थी और प्रतिनिधि संस्था भी। सर्वग्राही गणतांत्रिक संविधान एक अनिवार्य प्रक्रिया का परिणाम था।
1947 में भारत की तरह मुस्लिम बहुल, तुर्की में भी पहले विश्व युद्ध के बाद युगपरिवर्तनकारी अध्याय शुरू हुआ। तुर्की की फौज से निकले युवा तुर्कों के नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क की सरकार ने इस्लाम के इतिहास में पहली बार कई क्रांतिकारी परिवर्तन एक साथ शुरू किए। सबसे बड़ा फैसला था खिलाफत का खात्मा। भारत सहित दुनिया भर के मुसलमानों ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। कमाल पाशा ने खिलाफत संस्था के जिस खोखलेपन और निरर्थकता को बारीकी से देखा, उसे ज्यादातर मुसलमान नहीं देख पाए। अरबी लिपि की जगह रोमन अपना ली गई, फेज कैप और परदे पर रोक लगा दी गई। सेक्युलर संविधान लागू हो गया। अतातुर्क के निधन के बाद भी जनता और सेना के सहयोग से सेक्युलर व्यवस्था चलती रही। पर पिछले एक दशक के दौरान सब उलटफेर हो गया। अब तुर्की पर इस्लामपसंदों का झंडा फहरा रहा है।
हमारे पड़ोसी, करीब 90 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग ने सेक्युलर, गणतांत्रिक संविधान लागू किया। शेख ने एलान किया, हमने सांप्रदायिकता को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। पांच साल भी पूरे नहीं हुए थे कि शेख की हत्या के बाद मेजर जनरल जियाउर रहमान की सरकार ने बांग्लादेश को इस्लामी गणतंत्र घोषित कर दिया। जनरल जिया, जनरल मोहम्मद इरशाद और जनरल जिया की पत्नी खालिदा बेगम की सरकारों के दौरान जमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी समाज व सरकार पर हावी रहे। यह दौर हिंदुओं और बौद्धों के उत्पीड़न का रहा। बौद्ध बहुल चटगांव पहाड़ी का जनसांख्यकीय स्वरूप काफी हद तक बदल दिया गया। शेख हसीना की सरकार बनने के बाद बंगबंधु की विरासत की ओर लौटने की शुरुआत हो पाई। फिर भी हसीना पर जमातियों का खतरा लगातार मंडराता रहा है।
याहिया खान की फौजी हुकूमत की देखरेख में हुए चुनाव (दिसंबर,1970) में अवामी लीग ने सिर्फ पूर्वी पाकिस्तान में मिली सीटों के बूते पाकिस्तान असेंबली में भी बहुमत हासिल कर लिया था। फिर भी कट्टरपंथियों ने सत्ता हथिया ली। पूर्वी बंगाल की जनता की सांस्कृतिक सोच पश्चिमी पाकिस्तान के कट्टरपंथियों से हमेशा अलग रही। उनके दिल में रवींद्र ठाकुर और नजरुल बसे हुए थे। इसीलिए कट्टरपन की काली रात का खात्मा जल्द हो गया। प्रश्न यह है कि भारत में क्या नया संविधान लागू करना या वर्तमान संविधान के मूलाधार को नष्ट कर डालना संभव है? सांविधानिक स्वरूप और प्रावधानों को बदले बगैर भी उद्देश्य पूरा किया जा सकता है? याद रहे, आपातकाल के दौरान कुछ दरबारियों ने राष्ट्रपति प्रणाली लागू करवाने की चेष्टा की थी।
लोकसभा, राज्यसभा और समस्त विधानसभाओं में किसी भी दल के पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद यथास्थिति बनी रहेगी? सहज बुद्धि कहती है कि आसेतु हिमालय एकरूपतावादी तंत्र नहीं चल सकता। इतिहास गवाह है, उसे जगह-जगह चुनौती अवश्य मिलेगी। सत्तर साल की सेक्युलर लोकतांत्रिक परंपरा ने बड़े मजबूत स्पीडब्रेकर बना रखे हैं और न जाने कहां-कहां सड़कें बंद भी हैं। लेकिन जब बार-बार 'सबका साथ, सबका विकास' नामक सिद्धांत का हनन हो रहा हो, न्यायालय से दंडित अपराधियों का अभिनंदन किया जा रहा हो, 'एकम सत विप्रा बहुधा वदंति' की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, भारत माता के पुत्रों में भेदभाव किया जा रहा हो और विधि की प्रक्रिया का उल्लंघन विनाशकारी अराजकता को जन्म देता है, इस सभ्यतागत अनुभव की अनदेखी कर, जब सरेआम सड़कों पर कानून अपने हाथ में लिया जा रहा हो, तब इस सनातन राष्ट्र के लिए संकट के बादल दिखाई पड़ने लगते हैं।
कुछ ताकतें किस तरह बेलगाम हो रही हैं, इसकी एक मिसाल : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबद्ध मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को अयोध्या में सरयू के किनारे वजू और कलाम पाक की तिलावत करने से रोक दिया गया। एक 'संत' ने धमकी दे डाली कि यह कार्यक्रम हुआ, तो वह सरयू में कूदकर आत्महत्या कर लेंगे। कुछ मुसलमान सरयू किनारे पहुंच चुके थे, इसलिए सरयू को पवित्र करने के लिए दुग्धाभिषेक किया गया। पुण्यसलिला, पतितपावनी सरयू का शुद्धिकरण! कल्पना करें, दूधनाथ सिंह (आखिरी कलाम) और कैफी आजमी (दूसरा वनवास) अगर आज जीवित होते और अयोध्या जाते, तो उनका क्या हश्र होता!
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
यह वर्चस्व क्या आमूल-चूल परिवर्तन की हद तक जा सकता है? ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में जाए बगैर इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास मुश्किल है। अफगानिस्तान की सीमा से लेकर विंध्य के इस पार तक समूचा भारत नफरत की लपटों में था, पाकिस्तान बन चुका था और संविधान सभा के बनने तक विद्धेष फैला हुआ था। कांग्रेस वर्किंग कमेटी का बहुमत जवाहरलाल नेहरू के साथ नहीं था। उनसे कई मसलों पर इत्तफाक न रखने वालों में सरदार वल्लभ भाई पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे दिग्गज थे, ऐसे नेता, जिन्हें भाजपा अपनी पंगत में शामिल करने की कोशिश करती रही है। उन स्थितियों में भारत हिंदू राष्ट्र नहीं घोषित हुआ, क्योंकि वह भारत की मेधा का उल्लंघन होता। अनेक सीमाओं के बावजूद संविधान सभा भारत की विविधताओं का प्रतीक थी और प्रतिनिधि संस्था भी। सर्वग्राही गणतांत्रिक संविधान एक अनिवार्य प्रक्रिया का परिणाम था।
1947 में भारत की तरह मुस्लिम बहुल, तुर्की में भी पहले विश्व युद्ध के बाद युगपरिवर्तनकारी अध्याय शुरू हुआ। तुर्की की फौज से निकले युवा तुर्कों के नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क की सरकार ने इस्लाम के इतिहास में पहली बार कई क्रांतिकारी परिवर्तन एक साथ शुरू किए। सबसे बड़ा फैसला था खिलाफत का खात्मा। भारत सहित दुनिया भर के मुसलमानों ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। कमाल पाशा ने खिलाफत संस्था के जिस खोखलेपन और निरर्थकता को बारीकी से देखा, उसे ज्यादातर मुसलमान नहीं देख पाए। अरबी लिपि की जगह रोमन अपना ली गई, फेज कैप और परदे पर रोक लगा दी गई। सेक्युलर संविधान लागू हो गया। अतातुर्क के निधन के बाद भी जनता और सेना के सहयोग से सेक्युलर व्यवस्था चलती रही। पर पिछले एक दशक के दौरान सब उलटफेर हो गया। अब तुर्की पर इस्लामपसंदों का झंडा फहरा रहा है।
हमारे पड़ोसी, करीब 90 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग ने सेक्युलर, गणतांत्रिक संविधान लागू किया। शेख ने एलान किया, हमने सांप्रदायिकता को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। पांच साल भी पूरे नहीं हुए थे कि शेख की हत्या के बाद मेजर जनरल जियाउर रहमान की सरकार ने बांग्लादेश को इस्लामी गणतंत्र घोषित कर दिया। जनरल जिया, जनरल मोहम्मद इरशाद और जनरल जिया की पत्नी खालिदा बेगम की सरकारों के दौरान जमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी समाज व सरकार पर हावी रहे। यह दौर हिंदुओं और बौद्धों के उत्पीड़न का रहा। बौद्ध बहुल चटगांव पहाड़ी का जनसांख्यकीय स्वरूप काफी हद तक बदल दिया गया। शेख हसीना की सरकार बनने के बाद बंगबंधु की विरासत की ओर लौटने की शुरुआत हो पाई। फिर भी हसीना पर जमातियों का खतरा लगातार मंडराता रहा है।
याहिया खान की फौजी हुकूमत की देखरेख में हुए चुनाव (दिसंबर,1970) में अवामी लीग ने सिर्फ पूर्वी पाकिस्तान में मिली सीटों के बूते पाकिस्तान असेंबली में भी बहुमत हासिल कर लिया था। फिर भी कट्टरपंथियों ने सत्ता हथिया ली। पूर्वी बंगाल की जनता की सांस्कृतिक सोच पश्चिमी पाकिस्तान के कट्टरपंथियों से हमेशा अलग रही। उनके दिल में रवींद्र ठाकुर और नजरुल बसे हुए थे। इसीलिए कट्टरपन की काली रात का खात्मा जल्द हो गया। प्रश्न यह है कि भारत में क्या नया संविधान लागू करना या वर्तमान संविधान के मूलाधार को नष्ट कर डालना संभव है? सांविधानिक स्वरूप और प्रावधानों को बदले बगैर भी उद्देश्य पूरा किया जा सकता है? याद रहे, आपातकाल के दौरान कुछ दरबारियों ने राष्ट्रपति प्रणाली लागू करवाने की चेष्टा की थी।
लोकसभा, राज्यसभा और समस्त विधानसभाओं में किसी भी दल के पूर्ण बहुमत हासिल करने के बाद यथास्थिति बनी रहेगी? सहज बुद्धि कहती है कि आसेतु हिमालय एकरूपतावादी तंत्र नहीं चल सकता। इतिहास गवाह है, उसे जगह-जगह चुनौती अवश्य मिलेगी। सत्तर साल की सेक्युलर लोकतांत्रिक परंपरा ने बड़े मजबूत स्पीडब्रेकर बना रखे हैं और न जाने कहां-कहां सड़कें बंद भी हैं। लेकिन जब बार-बार 'सबका साथ, सबका विकास' नामक सिद्धांत का हनन हो रहा हो, न्यायालय से दंडित अपराधियों का अभिनंदन किया जा रहा हो, 'एकम सत विप्रा बहुधा वदंति' की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, भारत माता के पुत्रों में भेदभाव किया जा रहा हो और विधि की प्रक्रिया का उल्लंघन विनाशकारी अराजकता को जन्म देता है, इस सभ्यतागत अनुभव की अनदेखी कर, जब सरेआम सड़कों पर कानून अपने हाथ में लिया जा रहा हो, तब इस सनातन राष्ट्र के लिए संकट के बादल दिखाई पड़ने लगते हैं।
कुछ ताकतें किस तरह बेलगाम हो रही हैं, इसकी एक मिसाल : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबद्ध मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को अयोध्या में सरयू के किनारे वजू और कलाम पाक की तिलावत करने से रोक दिया गया। एक 'संत' ने धमकी दे डाली कि यह कार्यक्रम हुआ, तो वह सरयू में कूदकर आत्महत्या कर लेंगे। कुछ मुसलमान सरयू किनारे पहुंच चुके थे, इसलिए सरयू को पवित्र करने के लिए दुग्धाभिषेक किया गया। पुण्यसलिला, पतितपावनी सरयू का शुद्धिकरण! कल्पना करें, दूधनाथ सिंह (आखिरी कलाम) और कैफी आजमी (दूसरा वनवास) अगर आज जीवित होते और अयोध्या जाते, तो उनका क्या हश्र होता!