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दलबदल की आशंका और संसदीय लोकतंत्र

Devendra Singh Asawal देवेन्द्र सिंह असवाल
Updated Tue, 21 Jul 2020 04:59 AM IST
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Fear of defections and parliamentary democracy
Democracy

वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई थी, जिसे 2003 में 91वें संविधान संशोधन द्वारा और कठोर बनाया गया। दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी विधायक को अयोग्य ठहराने के आधार हैं, यदि उसने स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ दी है या यदि वह सदन में मतदान के समय अनुपस्थित रहता है या अपने दल के दिशा-निर्देश के विपरीत मतदान करता है।


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हालांकि विधायक दल के सदस्यों के दो-तिहाई या उससे अधिक सदस्य किसी अन्य पार्टी में  विलय करते हैं, तो दलबदल-विरोधी कानून लागू नहीं होगा। ज्वलंत प्रश्न यह है कि क्या राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के विधायक सचिन पायलट और उनके खेमे के विधायकों को दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराया जा सकता है। उन्हें पार्टी के अनुशासन को भंग करने के लिए उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है।

राजस्थान कांग्रेस विधायक दल की अर्जी पर विचार कर विधानसभा अध्यक्ष ने पायलट और उनके खेमे के विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। पायलट ने मामले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। क्या विधानसभा अध्यक्ष पायलट और उनके वफादार विधायकों को दलबदल-विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहरा सकते हैं?

जाहिर है, पायलट और उनके साथी विधायकों ने विधानसभा में पार्टी व्हिप की कोई अवहेलना नहीं की, क्योंकि विधानसभा सत्र में नहीं है और ऐसा अवसर आया भी नहीं। दलबदल की आशंका अयोग्यता का आधार नहीं हो सकती। एक तरह से दलबदल कानून की तुलना आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों से की जा सकती है, जिसमें 'आपराधिक मंशा और 'अपराधिक कृत्य का होना आवश्यक है।  एक राजनीतिक दल ऐसे सदस्यों को विधायी दल से निष्कासित कर सकता है। ऐसे सदस्यों को अध्यक्ष 'अनासक्त' घोषित कर सकते हैं या अंतरिम आदेश दे सकते हैं कि जब तक मामला उनके विचाराधीन है, उक्त विधायक सदन में मतदान नहीं कर सकेंगे।

राजनीतिक दल खुद पर कैसे शासन करते हैं, यह उनका आंतरिक मामला है। एक अखिल भारतीय राजनीतिक पार्टी में, स्वाभाविक रूप से, उच्च पदों के लिए नेताओं के बीच आंतरिक संघर्ष होगा। आखिरकार, यह योग्यतम का अस्तित्व है, यानी जो नेता पार्टी के भीतर अधिकतम समर्थन हासिल करता है, वही शीर्ष स्थान पर आसीन होगा। फिर भी कोई भी नेता लंबे समय तक शीर्ष स्थान पर टिक नहीं सकता है, यदि वह निरंकुश है और यदि वह अपने सहयोगियों और पार्टी के पदाधिकारियों के सम्मान और गरिमा को ठेस पहुंचाता है।

राजस्थान में एक राजनीतिक जंग जारी है और गेंद अब पायलट के खेमे में है। यह उनके ऊपर है कि वह कांग्रेस पार्टी से और विधायिका से अपने साथी विधायकों के साथ इस्तीफा दे और एक नई पार्टी बनाकर चुनाव लड़े या मुख्यधारा की प्रतिद्वंद्वी पार्टी में शामिल हो जाए। सत्ता हासिल करना मानव जाति का एक सामान्य स्वभाव है-एक सतत, बेचैन इच्छा, जो केवल मृत्यु के साथ खत्म होती है।  दलबदल विरोधी कानून राजनीतिक महत्वाकांक्षा के विरुद्ध नहीं है, वह केवल दलबदल की बुराई पर अंकुश लगाना चाहता है।

सवाल ज्यादा बड़ा है, और वह है दलबदल कानून बनाने वालों के उद्देश्य और संविधानिक मर्यादा का। संविधान का 52वां संशोधन दलबदल की बुराई और 'आया राम गया राम' की राजनीति पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया था, ताकि मतदाताओं के मतदान का सौदा न हो और संसदीय लोकतंत्र की नींव स्थिर और मजबूत रहे।

अब समय आ गया है कि दलबदल-विरोधी कानून की पुन: समीक्षा हो और कानून में यह भी व्यवस्था हो कि मंत्री बनने से पहले विधायिका की सदस्यता आवश्यक हो, और जो सदस्य दलबदल करता है, चुनाव जीतने के बाद उसे अगले पांच साल तक चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य घोषित किया जाए।

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