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परेड के उत्तर आधुनिक क्षण, इस बार देखेंगे दो-दो परेड 

Tue, 26 Jan 2021 04:16 AM IST
सुधीश पचौरी सुधीश पचौरी
सुधीश पचौरी Published by: सुधीश पचौरी Updated Tue, 26 Jan 2021 04:16 AM IST
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Farmers protest: On 26 January we will se two parades
किसानों का आंदोलन - फोटो : पीटीआई
इस बार की छब्बीस जनवरी के दिन हम एक नहीं, दो-दो परेड देखेंगे। पहली ऑफिशियल परेड इंडिया गेट वाली और दूसरी किसानों की ट्रैक्टर परेड। ऑफिशियल परेड के तो हम सब आदी हैं, इसलिए लोगों का ध्यान इस ट्रैक्टर परेड पर होगा। यहीं से गणतंत्र की ऑफिशियल कहानी को बदलकर एक अनाफिशियल प्रोटेस्ट की कहानी को बड़ी बनाने की कोशिश को साफ देखा जा सकता है। समांतर ट्रैक्टर परेड एक प्रकार का ‘डिसरप्शन’ है। ऐसे ‘डिसरप्शन’ को एक महा तमाशे, एक महा ‘शो’ में बदलना, एक नई उत्तर आधुनिक सांस्कृतिक राजनीति है। यह नया ‘राइट टू इंसल्ट’ है।

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ट्रैक्टर परेड दिल्ली की सत्ता के स्पेस के लिए काल्पनिक लड़ाई भी है। सत्ता में न सही सड़कों पर ही सही, पांच साल के लिए न सही तो दो दिन के लिए सही! खुले पब्लिक स्पेस पर कब्जा कर उसे अपने लिए रिक्लेम करना एक निहायत उत्तर आधुनिक क्रिया है। जिस दौर में सोशल मीडिया ने सबको एक फ्री प्लेटफॉर्म दे दिया है, उस दौर में पब्लिक स्पेस में कब्जा करना, अपने को तमाशे में बदलने की तरह है, लेकिन यह तमाशा सिर्फ तमाशा नहीं होता। उसका कर्ता ही उसका भोक्ता होता है। यह उपभोग ही उसे ताकत देता है। किसान अपने ही उपभोक्ता बनकर रह गए हैं, वे आत्मकेंद्रित हैं। उनके यहां आत्महत्या करते किसान की शिनाख्त नहीं है। इसलिए भी यह ट्रैक्टर परेड कोई ‘क्रांति’ करने वाली नहीं, दिल्ली को अस्त-व्यस्त करने के लिए है। यह परेड किसानों की फौरी मांगों के लिए जितनी है, उससे अधिक अपने को तमाशे में ढालकर, पब्लिक स्पेस पर कब्जा कर, उसे हलका करके उस पर अपनी छाप छोड़ने की कोशिश भर है। 

इसके अपने और मानी भी हैं। अब तक सिर्फ सरकारी परेड थी और हम ताली बजाते थे, अब एक अन्य परेड स्वच्छंद तरीके से होगी। यह कोई सत्ता पलट नहीं है, बल्कि सत्ता को चिढ़ाना है। किसान को ऐसा कर देने वाली सत्ता ही है। सत्ता ने ही किसान को ‘अन्नदाता’ कहकर  मध्यकालीन पदावली में ईश्वर का दर्जा दे रखा है। अब यही अपने अन्नदातात्व को लेकर अकड़ गया है। सत्ता अपनी ही भाषा की इस फांस को समझने में अक्षम है, क्योंकि उसकी भाषा स्वयं अर्ध आधुनिक और अर्ध मध्यकालीन है, जबकि ट्रैक्टर रैली निकालने वाला किसान अपनी आत्मछवि को बदल चुका है। वह अन्नदाता शब्द को कोड़े की तरह इस्तेमाल करता है कि अगर अन्नदाता मानते हो, तो हमारी सुनो, क्योंकि हम दाता हैं। अन्नदाता शब्द किसान को अहसान करने वाले एक श्रद्धास्पद अवतार में बदल कर, बाकी समाज से किसान के रिश्ते को बदल देता है। वह हमारा अन्नदाता हो जाता है। 

ऐसे नए ईश्वर से संवाद कैसे किया जाए? पूंजी के निर्माण में और देश चलाने में हम सब किसी न किसी रूप में अपना योगदान देते हैं, लेकिन हमें कोई ‘अन्नदाता’ नहीं कहता। किसान भी कुछ फ्री तो देते नहीं। यानी कि जो श्रम का साधारण विनिमय है, जो बाजार में बिकता है, उसे ही सत्ता ने अन्नदाता कहकर ईश्वर बना दिया और अब वह ईश्वरत्व पाकर सत्ता को लतिया रहा है। सत्ता एक आधुनिकतावादी केंद्रवाद को स्थापित करने की जिद में है, जबकि सारी दुनिया के राष्ट्रवादी केंद्र उत्तर आधुनिकतावादी मार के आगे हिल रहे हैं। और ग्लोबल स्पृहाओं वाले किसान अपने ग्रामीण हाशिये से ट्रैक्टर चलाकर दिल्ली के केंद्रवाद को हैसियत बताने आ गए हैं। इस अर्थ में यह ट्रैक्टर रैली तंग करने वाली है। जो इसमें गहरे मानी खोज रहे हैं, वे जल्द ही निराश होने हैं। 

केंद्रवाद की धज को बिगाड़ना ही इस ट्रैक्टर रैली का उत्तर आधुनिक क्षण है। कोई अचरज नहीं कि यह ‘उत्तर आधुनिक’ शब्द उस पुलिस कमिश्नर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अचानक निकल पड़ा कि पुलिस ने इस गणतंत्र दिवस के अवसर पर पाकिस्तान के 308 ट्विटर हैंडलों को उत्तर आधुनिक तकनीक से पकड़ा है। कितनी विचित्र बात है कि केंद्र का एक हिस्सा मध्यकालीन भाषा में रहता है, तो दूसरा हिस्सा आधुनिकतावाद के साथ उत्तर आधुनिकतावादी भाषा में रहता है।


 
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