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किसान आंदोलन: लखीमपुर से उपजे सियासी सवाल

Fri, 08 Oct 2021 05:28 AM IST
Neerja Chowdhary नीरजा चौधरी
Updated Fri, 08 Oct 2021 05:28 AM IST
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सार
एक साल से चल रहा किसानों का आंदोलन अब अपनी गति खो रहा था। पर लखीमपुर की घटना ने इसे नई हवा दे दी। लेकिन जो हुआ, वह राजनीति के निचले स्तर को दर्शाता है। क्या अब हम राजनीतिक विरोधियों को कुचलकर उनसे निपटने जा रहे हैं, भले ही कोई अजय मिश्र की तरह कहे कि वे अपना एजेंडा चलाने वाले राजनेता थे, किसान नहीं थे?
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Farmers Protest, Movement: Political questions arising from Lakhimpur
लखीमपुर खीरी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

लखीमपुर खीरी की घटना के चलते उत्तर प्रदेश उबल रहा है। वायरल हुए वीडियो में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र की एसयूवी उन किसानों से टकराती हुई दिखाई दे रही हैं, जो वहां विरोध कर रहे थे। वे गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र की 25 सितंबर की टिप्पणी पर आपत्ति जता रहे थे, जिसमें उन्हें चेतावनी दी गई थी, 'सुधर जाओ, नहीं तो दो मिनट में ठीक कर दूंगा।' एक साल से चल रहा किसानों का आंदोलन अब अपनी गति खो रहा था। पर लखीमपुर की घटना ने इसे नई हवा दे दी। 



अब तक, पंजाब एवं हरियाणा के अलावा इस आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में जाटों को प्रभावित किया था। अब उत्तर प्रदेश के तराई इलाके के सिख भी आंदोलित हो गए हैं। इसलिए पीलीभीत से भाजपा सांसद वरुण गांधी ने तत्काल गिरफ्तारी और कार्रवाई की मांग की है, क्योंकि उनके निर्वाचन क्षेत्र के सिख लखीमपुर की घटना से क्षुब्ध हैं। चंडीगढ़ में भी इस घटना के विरोध में प्रदर्शन हुए। गुर्जर समुदाय तो पहले से ही मिहिर भोज को लेकर भाजपा से खासा नाराज है।


लेकिन जो हुआ, वह राजनीति के निचले स्तर को दर्शाता है। क्या अब हम राजनीतिक विरोधियों को कुचलकर उनसे निपटने जा रहे हैं, भले ही कोई अजय मिश्र की तरह कहे कि वे अपना एजेंडा चलाने वाले राजनेता थे, किसान नहीं थे? क्या अब हम लोकतंत्र में अपने मतभेदों से इस तरह निपटने वाले हैं? चार किसान मारे गए। इससे इतना आक्रोश बढ़ा कि वहां मौजूद कुछ लोगों ने भाजपा के तीन कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी। इसमें एक पत्रकार की भी जान चली गई। चाहे मानें या न मानें, पर इस आंदोलन का असर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के चुनावों पर पड़ेगा।

नई हवा सिर्फ किसान आंदोलन को ही नहीं, प्रियंका वाड्रा को भी मिली है। अब तक उनकी रैलियां इसलिए रद्द हो रही थीं, क्योंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का अस्तित्व न के बराबर होने से भीड़ जुटाना मुश्किल था। सपा जैसे विपक्षी दल भाजपा-विरोधी गठबंधन में कांग्रेस को शामिल करने के लिए तैयार नहीं, क्योंकि कांग्रेस सीटें नहीं जीत पाती। लखीमपुर जाते हुए जब सीतापुर में प्रियंका को रोका गया, तो उन्होंने पुलिस का डटकर मुकाबला किया। 

उन्होंने वारंट दिखाने के लिए कहा और रोकने की वजह पूछी। उनकी संघर्ष करती यह छवि वायरल हो गई। कांग्रेसियों ने तुरंत कहा कि उन्हें हिरासत में लेना अवैध था। उन्हें निर्धारित 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया था, एक महिला के रूप में उन्हें रात में हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए था, या पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा धक्का नहीं दिया जाना चाहिए था। 

प्रियंका ने खुद मीडिया के लोगों से जो कहा, उसका असर पड़ा-'आपके लिए यह एक राजनीतिक मुद्दा होगा, हमारे लिए यह हादसा है और मैं वहां जाना चाहती हूं और उन लोगों का हाथ थामना चाहती हूं, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है।' सपा के अखिलेश यादव और बसपा के सतीश चंद्र मिश्र भी लखीमपुर जाने के लिए निकले, पर उन्हें लखनऊ में रोक दिया गया। यदि प्रियंका को सहानुभूति मिलती है, तो इससे उनकी संभावनाएं बढ़ सकती हैं। 

हालांकि अभी शुरुआत है और कांग्रेस के पास सड़कों पर उतरने या आंदोलन चलाने के लिए कार्यकर्ताओं की कमी है। प्रियंका के प्रति थोड़ी-बहुत सहानुभूति बढ़ना भाजपा को अच्छा ही लगेगा, क्योंकि अब तक भाजपा के विकल्प के रूप में एक ही पार्टी सपा दिखती है, लेकिन प्रियंका के उभरने से विपक्ष का वोट बंट सकता है। बिखरा हुआ विपक्ष इसका फायदा नहीं उठा पाएगा, जब तक कि पूरे राज्य में आक्रोश नहीं दिखाई देता।

भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उतनी चिंता नहीं है, जहां किसान आंदोलन उग्र हो गया है और जाटों के एक वर्ग ने खुद को भाजपा से अलग कर लिया है। भाजपा ने हिसाब लगा लिया है कि जाट मुसलमानों के साथ नहीं जाएंगे, अगर 'उनके पास हिंदू विकल्प हों।' उत्तर प्रदेश जीतना सिर्फ एक राज्य उत्तर प्रदेश जीतना नहीं है, बल्कि यह भारत जीतने के बारे में है। 

अगर भाजपा 2022 के चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं करती, तो 2024 का लोकसभा चुनाव उसके लिए मुश्किल हो जाएगा। इसलिए भाजपा के आला नेताओं के लिए फिर से उत्तर प्रदेश जीतना महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में शानदार जीत से योगी को मजबूती मिलेगी, जिनकी निगाहें दिल्ली पर लगी हैं। तब वह आला कमान से ज्यादा स्वतंत्र होकर काम करेंगे। वैसे भी योगी को दंडित करना केंद्रीय नेतृत्व के लिए मुश्किल हो गया था।

योगी जोर-शोर से अपनी उपलब्धियों का प्रचार कर सभी अवरोधों को खत्म कर रहे हैं। उन्होंने शीघ्र ही अजय मिश्र के बेटे के खिलाफ किसानों की हत्या का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई। उनसे पूछताछ होना तय है। इसके अलावा योगी ने प्रभावित परिवारों के साथ त्वरित समझौता किया, और प्रत्येक परिवार को 45 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की। इसमें मध्यस्थता किसान नेता राकेश टिकैत ने की, जिन्हें लखीमपुर जाने दिया गया, जबकि विपक्षी नेताओं को रोक दिया गया। 

जाहिर तौर पर योगी की मंशा माहौल को शांत करने की थी। हालांकि अजय मिश्र के लिए ऐसा नहीं है, जो योगी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। लगता है कि भाजपा के भीतर भी स्थिति जटिल है। विपक्ष के लिए उत्तर प्रदेश में अवसर है, पर वह बंटा हुआ है। कोविड की दूसरी लहर का सही प्रबंधन न करने के कारण योगी सरकार के खिलाफ नाराजगी है। अब लखीमपुर का मामला सामने आया है। 

देखना है कि इसका असर कितनी दूर तक जाएगा? पर राजनीति से परे कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब दिया जाना चाहिए। क्या एक उत्तरदायी राज्य को किसानो को आंदोलित करने वाली समस्या को एक साल तक के लिए छोड़ देना चाहिए? क्या आंदोलनकारियों/ प्रदर्शनकारियों की बातें अब सुनी जाएगी या उन्हें कुचल दिया जाएगा? क्या भारतीय लोकतंत्र में यही सब होने वाला है?

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