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खेती को चाहिए नई नीति: सभी फसलों की उचित कीमत मिले, तो किसान मिश्रित फसलों को प्राथमिकता देने लगेंगे
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कृषि क्षेत्र (प्रतीकात्मक तस्वीर)
- फोटो : PTI
लगभग दो माह से ज्यादा समय से चल रहे किसान आंदोलन के दौरान बीते 26 जनवरी को जो दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, उसने आंदोलन को बहुत पीछे धकेल दिया है। 26 जनवरी की शर्मनाक घटना का बचाव वे लोग भी नहीं कर सकते, जिनके प्रखर और निडर व्यक्तित्व का निर्माण केवल और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध करते रहने से हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि किसान आंदोलन काफी शांति से चला, लेकिन उससे किसानों को कुछ हासिल नहीं हुआ। इस आंदोलन का दुर्भाग्य यह रहा कि इसका नेतृत्व पेशेवर लोगों के हाथों में रहा।
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जिस दिन केंद्रीय कृषि मंत्री ने किसानों के साथ बैठक में कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित रखने का प्रस्ताव दिया, उस दिन किसान नेता काफी संतुष्ट से लगे थे। लगा था कि किसान नेता इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे, किंतु रात को हुई सभी नेताओं की बैठक में इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया। आगे की रणनीति तय करने के लिए यह डेढ़ वर्ष का समय काफी था, पर इससे पेशेवर किसान नेताओं का धंधा चौपट हो जाता, इसलिए उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री के प्रस्ताव को नहीं माना। इस आंदोलन का एक कमजोर पक्ष यह भी रहा कि इसमें आंदोलनकारियों की सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा गया, जिसका विभिन्न चैनलों पर भरपूर प्रदर्शन भी हुआ। आंदोलन स्थलों पर सुख-सुविधाओं का प्रदर्शन अहमन्यता का द्योतक था।
किसान की सबसे बड़ी विडंबना है कि वह अकेला ऐसा उत्पादक है, जिसकी अपने उत्पाद की कीमत तय करने में कोई भूमिका नहीं होती। जबकि पेपर-सोप जैसी छोटी-सी चीज के कीमत-निर्धारण में उसके उत्पादक की भूमिका होती है। इसके अलावा किसान अपने उत्पाद को ज्यादा दिन तक रोक कर रख भी नहीं सकता है। वह कितना अन्न उगा पाएगा, यह भी प्रकृति की दया पर निर्भर है। अनिश्चितताओं के कारण वह सदा समस्याओं से घिरा रहता है। एक तरफ वह फसल के लिए प्रकृति पर निर्भर रहता है, तो दूसरी तरफ कीमत के लिए मंडी के आढ़तियों पर। अगर उसकी फसल की न्यूनतम कीमत तय हो जाती है, तो काफी हद तक वह आश्वस्त हो सकता है।
यह भी चिंता की बात है कि कृषि उत्पादों को लेकर हमारी कोई पक्की नीति नहीं है। व्यावहारिक स्तर पर देखें, तो उत्तर प्रदेश में जेवर के आसपास, जहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बन रहा है, खादर क्षेत्र को छोड़कर बाकी भूमि काफी उपजाऊ है। वहां कई तरह की फसलें होती थीं। आज वहां अधिकांशतः धान उपजाया जाता है। धान उगाने पर कोई नीतिगत निर्णय क्यों नहीं लिया जाता? हरियाणा की मुख्य फसल गेहूं थी, जबकि आज धान है। इसलिए पराली की समस्या पैदा हो गई, जो हर साल दिल्ली को सताती है। आज पूरे पंजाब और हरियाणा में धान की खेती होती है। पराली से उत्पन्न समस्या पर कभी इस दृष्टि से विचार नहीं किया गया। किसान धान की फसल की तरफ इसलिए मुड़े, क्योंकि अन्य जिंसों के मुकाबले इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है। अगर सभी फसलों की उचित कीमत मिले, तो किसान मिश्रित फसलों को प्राथमिकता देने लगेंगे।
पहले कृषि-व्यवसाय लाभकारी लगता था। परिवार का हर सदस्य खेती और पशुपालन में लगा रहता था। पहले किसानों के पास जमीनें अधिक थीं। बाद में खेती का लागत मूल्य बढ़ता गया। किसान नकदी फसल उगाकर उसकी भरपाई करने लगे। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज गन्ने की फसल भी उतनी लाभकारी नहीं रही, जितनी दस-पंद्रह वर्ष पहले थी। किसानों को जब गन्ना जलाकर नष्ट करना पड़ा, तब गन्ने की खेती से मोहभंग होना स्वाभाविक था। यदि अब भी खेती को लेकर नीतिगत निर्णय नहीं लिए गए, तो धान की खेती से भी मोहभंग हो जाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि किसान को उसकी फसल की वाजिब कीमत मिले।
किसानों का कृषि से अब भी मोहभंग नहीं हुआ है। वे नवाचार कर रहे हैं, रेतीले इलाकों तक में अच्छी फसलें उगाई जा रही हैं। पर मुख्य बात यही है कि किसानों को उनके उत्पाद का सही मूल्य मिले।