{"_id":"588e05974f1c1b313de80164","slug":"family-in-politics","type":"story","status":"publish","title_hn":"राजनीति में परिवारवाद","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
राजनीति में परिवारवाद
तवलीन सिंह
Updated Sun, 29 Jan 2017 08:39 PM IST
विज्ञापन
तवलीन सिंह
पिछले सप्ताह जोश से हमने गणतंत्र दिवस मनाया। राजपथ पर हमने सेना की शक्ति का शान से प्रदर्शन किया और हर राज्य ने अपनी झांकी सजाकर भेजी, ताकि देशवासी एक बार फिर भारत की विभिन्नता और सुंदरता को देख सकें। पर यह उत्सव मनाते हुए क्या हम भूल गए हैं कि गणतंत्र का मतलब क्या है? सच पूछिए, तो इस बार गणतंत्र दिवस का परेड देखते समय मुझे ऐसा लगा, जैसे हम उत्सव के जोश में इस उत्सव का मतलब भूल चुके हैं।
विज्ञापन
न भूले होते, तो चुनावों के इस मौसम में इतने सारे प्रत्याशी नहीं दिखते, जिन्होंने चुनाव लड़ने के टिकट सिर्फ इसलिए हासिल किए हैं, क्योंकि राजनीति उनके परिवार के लिए व्यापार बन गई है। भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह इस बार कैराना विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी हैं। हाल में एक टीवी इंटरव्यू में उनसे जब पूछा गया कि क्या उनको टिकट मिलना परिवारवाद नहीं समझा जाना चाहिए, तो उनका जवाब वही था, जो कुछ महीने पहले सोनिया गांधी ने एक टीवी इंटरव्यू में दिया था, 'डॉक्टर का बेटा जब डॉक्टर बन सकता है, ऐक्टर का बेटा ऐक्टर बन सकता है, बिजनेसमैन का बेटा बिजनेस संभालता है, तो मुझे टिकट क्यों न मिले, यदि मुझमें जनता की सेवा करने की वैसी ही इच्छा है, जैसी मेरे पिता को है?’
विज्ञापन
सवाल यह है कि क्या कैराना में सिर्फ वही हैं, जिनको जनता की सेवा करने की इच्छा है। सवाल यह भी कि उनको जनता की सेवा करने का शौक अचानक क्यों हो गया है। जब प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कई बार परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठाई है, तो उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में भाजपा को परिवारवाद अपनाने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? मृगांका सिंह के अलावा अन्य राजनीतिक वारिसों को भी टिकट मिले हैं, जिनमें केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे भी हैं और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पोते भी।
विज्ञापन
परिवारवाद की यह बीमारी अगर भाजपा में भी फैल जाती है, तो भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं रहेगा, जो इस रोग का शिकार न बन गया हो। परिवारवाद की शुरुआत कांग्रेस से हुई थी, जब इंदिरा गांधी ने अपने बेटे संजय को अपना वारिस चुना था। लेकिन अब यह रोग महामारी का रूप ले चुका है।
परिवारवाद के समर्थक अक्सर कहते हैं कि राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को जब तक जनता वोट देती है, तब तक किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह गलत तर्क है, क्योंकि हम जैसे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि जब किसी बड़े राजनेता का वारिस चुनाव जीतना चाहता है, तब उसके लिए रास्ता कितना आसान कर दिया जाता है। राजनीतिक दल की पूरी शक्ति तो उसके पीछे होती ही है, चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, ताकि किसी हाल में वारिस हार न पाएं। पर यह लोकतंत्र है या सामंतवाद? कई राज्यों में आजकल पूर्व राजा-महाराजा चुनाव लड़ते दिखते हैं, क्योंकि वे समझ गए हैं कि इस देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में ऐसा परिवर्तन आ चुका है, जिसका लाभ उनको होता है, जिन्हें सामंतवाद का पुराना अनुभव है। सो जनता की सेवा करने के नाम पर क्यों न ऐसे लोग सामने आएं, जिनका असली मकसद जनता की सेवा नहीं, अपने परिवार की सेवा है। इससे अगर देश को नुकसान होता है, तो हो। यह जनता की मर्जी से हो रहा है या नहीं? दुख की बात है कि इन बातों को हम याद नहीं रखते। राजनीतिक पंडित लोकतंत्र की तुलना अक्सर नाजुक पौधे से करते हैं, जिसे हमेशा प्यार से सींचने की आवश्यकता होती है।