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गलत नीतियों से किसान हुए बदहाल

Sun, 11 Jun 2017 05:56 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 11 Jun 2017 05:56 PM IST
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False policy makers have become bad farmers
तवलीन सिंह

पिछले कुछ महीनों से भारत के किसानों ने अपने हाल की तरफ राजनेताओं का ध्यान आकर्षित करने की हर तरह से कोशिश की है। तमिलनाडु के किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे और कई दिनों तक वहां प्रदर्शन करते रहे। कभी खोपड़ियों के हार गलों में डाल कर अनशन पर बैठे, तो कभी वहीं पर आत्महत्या करने की कोशिश की। बड़े-बड़े राजनेता उनसे मिलने आए, जिनमें राहुल गांधी भी थे,पर प्रधानमंत्री से भेंट नहीं हुई। आखिर में तमिलनाडु के कुछ राजनेताओं ने उन्हें आश्वासन दिया और वे घर चले गए। इसके बाद महाराष्ट्र में कर्जमाफी की मांग को लेकर किसानों का एक बड़ा जत्था मुंबई पहुंचा। यह सिलसिला चल ही रहा था कि मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन इतना हिंसक हो गया कि पुलिस की गोलियों से छह किसानों की मौत हो गई। विपक्ष के नेताओं ने फिर से किसानों के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकीं। 

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मध्य प्रदेश में किसानों के आक्रोश की बात करते समय याद रखना चाहिए कि जितना निवेश कृषि क्षेत्र में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने किया है, शायद ही पहले कभी किसी दूसरी सरकार ने किया होगा। तो सवाल यह उठता है कि क्या ग्रामीण भारत में कुछ ऐसी चीज हो रही है, जिसका असली विश्लेषण अभी तक हुआ नहीं है? मेरा ऐसा मानना है। ऐसा नहीं है कि मुझे कृषि क्षेत्र की समस्याओं की कोई विशेष जानकारी है। सिर्फ इसलिए कि मेरा भाई किसान है, सो मुझे थोड़ी-बहुत समझ है किसानों के हाल की। अपने भाई से जब मैंने मध्य प्रदेश की हिंसा के बारे में पूछा, तो उनका कहना था- 'ऐसा तब तक होता रहेगा, जब तक दिल्ली में बैठे कृषि विशेषज्ञ स्वीकार नहीं करेंगे कि देश के ज्यादातर किसानों के पास अब इतने छोटे खेत रह गए हैं कि साल भर में उनकी कमाई महानगरों के घरेलू नौकरों से कम है। सोचिए एक एकड़ से साल भर में वह करीब 40,000 रुपये ही कमा पाता है, तो कैसे गुजारा होगा?'
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इस बात को हमारे राजनेता अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन समाधान ढूंढते हैं, वही पुराने बख्शीश वाले-बिजली मुफ्त में दे दो, पानी मुफ्त में दे दो, कर्ज माफ कर दो। यथार्थ यह है कि किसानों को सड़कें, सिंचाई और कोल्ड स्टोरेज चाहिए, जिनके अभाव में देश में आधी सब्जियां और फल मंडी में पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक जितनी सब्जियां और फल ब्रिटेन के लोग एक साल में खाते हैं, उससे ज्यादा भारत की खेतों में सड़ जाते हैं।
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सवाल है कि ग्रामीण सड़कों और कोल्ड स्टोरेज चेन में निवेश क्यों नहीं हुआ। कर्ज माफ करवाने के बदले किसान इन चीजों के लिए आंदोलन क्यों नहीं करते हैं? इसलिए कि ज्यादातर किसान अनपढ़ हैं और इसका फायदा राजनेता उठाते हैं। राजनेता जानते हैं कि जब तक भारत कृषि प्रधान देश रहेगा, तब तक विकास और रोजगार के बदले वे खैरात बांटकर किसानों का वोट हासिल कर सकते हैं। अमेरिका में दो फीसदी से कम आबादी कृषि पर निर्भर है और चीन में इतनी तेजी से शहरीकरण हुआ है कि अब मात्र 30 करोड़ लोग ही खेती-बाड़ी से गुजारा करने के लिए बचे हैं।


अब समय आ गया है कि हमारे राजनेता स्वीकार करें कि देश के किसानों की समस्याओं की जड़ हैं उनकी गलत नीतियां। प्रधानमंत्री मोदी अगर वास्तव में कृषि क्षेत्र में परिवर्तन और विकास लाना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मुख्यमंत्रियों को आदेश देना होगा कि कर्जे माफ करने के बदले उसी पैसे को उन सुविधाओं में निवेश करें, जिनका कृषि क्षेत्र में गंभीर अभाव है। इस निवेश के बिना भारत के किसान उस गुरबत में फंसे रहेंगे, जिस गुरबत में वह सदियों से फंसे रहे हैं। 

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