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गिरता रुपया, महंगा तेल
शंकर अय्यर, वरिष्ठ पत्रकार
Updated Mon, 21 May 2018 06:41 PM IST
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तेल की बढ़ती कीमतें
कहा जाता है कि एक हफ्ते का वक्त राजनीति में काफी लंबा होता है। यही बात अर्थव्यवस्था के बारे में भी कही जा सकती है। पिछले हफ्ते जब राजनेता कर्नाटक विधानसभा में होने वाले शक्ति परीक्षण की तैयारी में जुटे थे, ठीक उसी समय अर्थव्यवस्था के उच्च क्षमता वाले संकेतक नई ऊंचाइयां छू रहे थे।
पिछले हफ्ते रुपये ने प्रति डॉलर 68 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को छू लिया और सोमवार को यह 68.10 रुपये प्रति डॉलर के साथ खुला; अनुमान जताया जा रहा है कि यह 70 रुपये के स्तर को छू लेगा! इस ढलान में कच्चे तेल के बढ़ते दाम से तेजी आई है, जोकि 80 डॉलर प्रति बैरल हो चुका है। मुंबई में पेट्रोल और डीजल के दाम क्रमशः 84 रुपये और 72 रुपये प्रति लीटर के साथ नई ऊंचाई पर हैं और विश्लेषक मानते हैं कि इनके दाम प्रति लीटर चार रुपये और बढ़ सकते हैं। गिरते रुपये और कच्चे तेल के बढ़ते दाम का असर कर्ज बाजार में भी प्रतिबिंबित हुआ, जहां दस साल के बांड पर मुनाफा इस उम्मीद में 7.73 फीसदी तक पहुंच गया था कि सरकार का कर्ज बढ़ सकता है और पांच जून को होने वाली रिजर्व बैंक की बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो सकती है।
जब यह सरकार सत्ता में आई थी, उस समय कच्चे तेल का दाम 104 डॉलर प्रति बैरल था और अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत खराब थी। नवंबर, 2014 के बाद कच्चे तेल के दाम में आई आकस्मिक गिरावट से सालाना 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई। अनुकूल कारकों ने वित्तीय गणित को दुरुस्त करने में मदद की और राजस्व का सृजन किया और खपत में बढ़ोतरी हुई। लेकिन मई, 2018 में वैश्विक और स्थानीय कारकों ने एकदम विपरीत परिस्थितियां पैदा कर दीं, जिससे डॉलर महंगा हो गया, आयात की लागत बढ़ गई, मुद्रास्फीति में तेजी आई और चालू खाता तथा वित्तीय घाटे के अनुपात के उच्च रहने की संभावनाएं बढ़ गईं।
परिस्थितियों को समझने के लिए ऐसे स्थानीय और वैश्विक कारणों की शिनाख्त करना जरूरी है, जोकि अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता को प्रभावित करते हैं। वैश्विक स्तर पर देखें तो, अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति में तेजी से अमेरिका के सरकारी बांड का मुनाफा 3.12 फीसदी के नए स्तर पर पहुंच गया। इससे विदेशी पूंजी की घर वापसी होने लगी वह भी कहीं अधिक सुरक्षित जगहों पर रिटर्न के जोखिम को सुरक्षित रखते हुए। यह परिघटना कर्ज और शेयर दोनों बाजारों से निधियों के बाहर जाने के रूप में परिलक्षित हुई।
अप्रैल और मई में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक ही विक्रेता थे और अनुमानतः पांच अरब डॉलर यहां से बाहर गया। रिजर्व बैंक के आंकड़ों में भी यह नजर आया। 13 अप्रैल से 18 मई के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सात अरब डॉलर कम होकर 400 अरब डॉलर से 392 अरब डॉलर हो गया। वास्तव में स्वर्ण भंडार और एसडीआर सहित कुल विदेशी मुद्रा भंडार एक महीने के दौरान 426 अरब डॉलर से घटकर 417 अरब डॉलर हो गया।
इस रुझान के तब तक कायम रहने के आसार हैं, जब तक कि एक नया संतुलन बन नहीं जाता और यह भारत के साथ ही उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बांड और शेयर दोनों तरह के बाजारों को प्रभावित करेगा। आर्थिक और भूराजनीतिक परिस्थितियों के कारण, जिसमें कच्चे तेल के दाम और बढ़ने की संभावना है, रुपये में और गिरावट की आशंकाएं बढ़ रही हैं। अमेरिकी शैल के 65 डॉलर प्रति बैरल की दर का व्यावहारिक प्रभाव अभी तक नहीं पड़ा है। वास्तव में ईरान के परमाणु सौदे पर छाई आशंकाओं और उस पर संभावित प्रतिबंधों के कारण बदली भूराजनीतिक परिस्थितियों मांग-आपूर्ति का गणित और दाम प्रभावित हो सकते हैं। इसी वजह से कुछ विशेषज्ञों ने तो कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल हो जाने तक की भविष्यवाणी कर दी है।
ऐसा होता है या नहीं, लेकिन भारत तेल के आयात के लिए जो औसत दाम देता है, वह बजट अनुमान से अधिक हो चुका है। भारत को पिछले वित्त वर्ष में औसतन 47.5 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल मिला था, जोकि अब 75 डॉलर प्रति बैरल हो चुका है। वित्त मंत्रालय का अनुमान है कि दाम बढ़ने के कारण आयात बिल में 25 अरब डॉलर से पचास अरब डॉलर के बीच कुछ भी बढ़ोतरी हो सकती है और यह इस पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल के दाम किस ऊंचाई को छूते हैं।
स्थानीय कारकों ने वैश्विक कारकों को और भड़काया ही है। सरकार दाम स्थिर करने के लिए करों में कटौती कर सकती थी, लेकिन इससे सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा और फिर वित्तीय घाटा बढ़ेगा। वैसे भी लोकलुभावन राजनीति अर्थव्यवस्था पर बोझ बनती है, कई तरह की कर्जमाफी डेढ़ लाख करोड़ रुपये का बोझ बढ़ाएगी और इसका असर राज्यों के बजट पर होगा। अभी तीन बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं, जिनके लिए रियायतों का पिटारा खुलना बाकी है और उसके बाद आम चुनाव भी होने हैं।
चार वर्षों से भारत का निर्यात या तो कमजोर है या फिर नकारात्मक है। विगत 18 महीने से वैश्विक कारोबार में जो तेजी आई है, उससे भारत वंचित रहा है और उसका निर्यात अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि गैर तेल, गैर स्वर्ण तथा आभूषण के क्षेत्रों में इसका आयात बढ़ रहा है, चीन से 2006-07 के दौरान आयात 17 अरब डॉलर का था, जो 2016-17 में बढ़कर 61 अरब डॉलर हो गया। अच्छी खबर यह है कि इस बार मानसून अच्छा रहेगा।
अर्थव्यवस्था में खपत और मांग में वृद्धि हुई है। लेकिन इन पर उच्च परिवहन खर्च, लागत बढ़ने और रुपये की कीमत होने से असर पड़ सकता है। तेल के ऊंचे दाम के कारण उपभोक्ताओं का खर्च घटेगा। रिजर्व बैंक ने यदि ब्याज दरें बढ़ा दी तो ईएमआई में भी वृद्धि हो जाएगी। अर्थव्यवस्था को अभी तत्काल तीन कदमों की जरूरत है, सतर्कता, कार्रवाई और कुछ गैरपांरपरिक किस्म के उपाय।
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पिछले हफ्ते रुपये ने प्रति डॉलर 68 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर को छू लिया और सोमवार को यह 68.10 रुपये प्रति डॉलर के साथ खुला; अनुमान जताया जा रहा है कि यह 70 रुपये के स्तर को छू लेगा! इस ढलान में कच्चे तेल के बढ़ते दाम से तेजी आई है, जोकि 80 डॉलर प्रति बैरल हो चुका है। मुंबई में पेट्रोल और डीजल के दाम क्रमशः 84 रुपये और 72 रुपये प्रति लीटर के साथ नई ऊंचाई पर हैं और विश्लेषक मानते हैं कि इनके दाम प्रति लीटर चार रुपये और बढ़ सकते हैं। गिरते रुपये और कच्चे तेल के बढ़ते दाम का असर कर्ज बाजार में भी प्रतिबिंबित हुआ, जहां दस साल के बांड पर मुनाफा इस उम्मीद में 7.73 फीसदी तक पहुंच गया था कि सरकार का कर्ज बढ़ सकता है और पांच जून को होने वाली रिजर्व बैंक की बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी हो सकती है।
जब यह सरकार सत्ता में आई थी, उस समय कच्चे तेल का दाम 104 डॉलर प्रति बैरल था और अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत खराब थी। नवंबर, 2014 के बाद कच्चे तेल के दाम में आई आकस्मिक गिरावट से सालाना 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई। अनुकूल कारकों ने वित्तीय गणित को दुरुस्त करने में मदद की और राजस्व का सृजन किया और खपत में बढ़ोतरी हुई। लेकिन मई, 2018 में वैश्विक और स्थानीय कारकों ने एकदम विपरीत परिस्थितियां पैदा कर दीं, जिससे डॉलर महंगा हो गया, आयात की लागत बढ़ गई, मुद्रास्फीति में तेजी आई और चालू खाता तथा वित्तीय घाटे के अनुपात के उच्च रहने की संभावनाएं बढ़ गईं।
परिस्थितियों को समझने के लिए ऐसे स्थानीय और वैश्विक कारणों की शिनाख्त करना जरूरी है, जोकि अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता को प्रभावित करते हैं। वैश्विक स्तर पर देखें तो, अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति में तेजी से अमेरिका के सरकारी बांड का मुनाफा 3.12 फीसदी के नए स्तर पर पहुंच गया। इससे विदेशी पूंजी की घर वापसी होने लगी वह भी कहीं अधिक सुरक्षित जगहों पर रिटर्न के जोखिम को सुरक्षित रखते हुए। यह परिघटना कर्ज और शेयर दोनों बाजारों से निधियों के बाहर जाने के रूप में परिलक्षित हुई।
अप्रैल और मई में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक ही विक्रेता थे और अनुमानतः पांच अरब डॉलर यहां से बाहर गया। रिजर्व बैंक के आंकड़ों में भी यह नजर आया। 13 अप्रैल से 18 मई के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सात अरब डॉलर कम होकर 400 अरब डॉलर से 392 अरब डॉलर हो गया। वास्तव में स्वर्ण भंडार और एसडीआर सहित कुल विदेशी मुद्रा भंडार एक महीने के दौरान 426 अरब डॉलर से घटकर 417 अरब डॉलर हो गया।
इस रुझान के तब तक कायम रहने के आसार हैं, जब तक कि एक नया संतुलन बन नहीं जाता और यह भारत के साथ ही उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बांड और शेयर दोनों तरह के बाजारों को प्रभावित करेगा। आर्थिक और भूराजनीतिक परिस्थितियों के कारण, जिसमें कच्चे तेल के दाम और बढ़ने की संभावना है, रुपये में और गिरावट की आशंकाएं बढ़ रही हैं। अमेरिकी शैल के 65 डॉलर प्रति बैरल की दर का व्यावहारिक प्रभाव अभी तक नहीं पड़ा है। वास्तव में ईरान के परमाणु सौदे पर छाई आशंकाओं और उस पर संभावित प्रतिबंधों के कारण बदली भूराजनीतिक परिस्थितियों मांग-आपूर्ति का गणित और दाम प्रभावित हो सकते हैं। इसी वजह से कुछ विशेषज्ञों ने तो कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल हो जाने तक की भविष्यवाणी कर दी है।
ऐसा होता है या नहीं, लेकिन भारत तेल के आयात के लिए जो औसत दाम देता है, वह बजट अनुमान से अधिक हो चुका है। भारत को पिछले वित्त वर्ष में औसतन 47.5 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल मिला था, जोकि अब 75 डॉलर प्रति बैरल हो चुका है। वित्त मंत्रालय का अनुमान है कि दाम बढ़ने के कारण आयात बिल में 25 अरब डॉलर से पचास अरब डॉलर के बीच कुछ भी बढ़ोतरी हो सकती है और यह इस पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल के दाम किस ऊंचाई को छूते हैं।
स्थानीय कारकों ने वैश्विक कारकों को और भड़काया ही है। सरकार दाम स्थिर करने के लिए करों में कटौती कर सकती थी, लेकिन इससे सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा और फिर वित्तीय घाटा बढ़ेगा। वैसे भी लोकलुभावन राजनीति अर्थव्यवस्था पर बोझ बनती है, कई तरह की कर्जमाफी डेढ़ लाख करोड़ रुपये का बोझ बढ़ाएगी और इसका असर राज्यों के बजट पर होगा। अभी तीन बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं, जिनके लिए रियायतों का पिटारा खुलना बाकी है और उसके बाद आम चुनाव भी होने हैं।
चार वर्षों से भारत का निर्यात या तो कमजोर है या फिर नकारात्मक है। विगत 18 महीने से वैश्विक कारोबार में जो तेजी आई है, उससे भारत वंचित रहा है और उसका निर्यात अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि गैर तेल, गैर स्वर्ण तथा आभूषण के क्षेत्रों में इसका आयात बढ़ रहा है, चीन से 2006-07 के दौरान आयात 17 अरब डॉलर का था, जो 2016-17 में बढ़कर 61 अरब डॉलर हो गया। अच्छी खबर यह है कि इस बार मानसून अच्छा रहेगा।
अर्थव्यवस्था में खपत और मांग में वृद्धि हुई है। लेकिन इन पर उच्च परिवहन खर्च, लागत बढ़ने और रुपये की कीमत होने से असर पड़ सकता है। तेल के ऊंचे दाम के कारण उपभोक्ताओं का खर्च घटेगा। रिजर्व बैंक ने यदि ब्याज दरें बढ़ा दी तो ईएमआई में भी वृद्धि हो जाएगी। अर्थव्यवस्था को अभी तत्काल तीन कदमों की जरूरत है, सतर्कता, कार्रवाई और कुछ गैरपांरपरिक किस्म के उपाय।