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कोई समझाए कि रुपया क्यों गिरा
डी के नवीन
Updated Sun, 01 Sep 2013 08:48 PM IST
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हमने बुजुर्गों से सुना था कि रुपये के पंख होते हैं और वे उड़ जाते हैं। क्या इसीलिए इन दिनों रुपये उड़न-छू हो रहे हैं? उन्हें कितना भी पकड़ने की कोशिश करो, वे लगातार नीचे ही चले जा रहे हैं।
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वैसे किसी ने यह भी तो कहा था कि रुपया हाथ का मैल होता है। हमारे नीति-नियंता शायद इसीलिए उसे चुपचाप गिरते हुए देख रहे हैं। वैसे भी यह योगियों का देश है। बड़े-बड़े राजा-महाराजा रुपयों की निरर्थकता समझ गए थे। ऐसे में अपने मनमोहन जी को दोष देने का कोई मतलब नहीं है। वह सिंहासन पर बैठकर राग भैरवी गा रहे हैं, तो गाने दीजिए। नीचे वाले झपताल बजा रहे हैं, तो बजाने दीजिए।
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लेकिन आलोचकों की जुबान कैसे रोकेंगे आप! कहने वाले तो कहेंगे ही कि रुपये की यह हालत हमारे इन्हीं नीति-नियंताओं ने की। मनमोहन जी को मनमोहन सिंह बनाने वाले भले चले गए, लेकिन प्रधानमंत्री ने अर्थव्यवस्था का जिस तरह कायाकल्प किया, उसके बारे में सब जानते हैं।
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फिर चिदंबरम नाम के चमत्कार का अवतार हुआ। पवार ने खेती का विस्तार किया। राजा का रहस्य तो सतयुग से आज तक कोई समझ न सका। प्रकाश जी ने कोयले को करिश्मे में बदला। जो बच गया था, उसे सबने आपस में बांट लिया। यानी रुपये को इस हाल तक पहुंचाने में मनमोहन सरकार के समस्त योगियों का बराबर का योगदान है। योगियों में ऐसी एकता वैसे कम ही देखने को मिलती है।
सुना यह था कि अर्थव्यवस्था बहुत कठिन विषय है। बहुत कम लोग समझते हैं। और अपने प्रधानमंत्री जी बहुत समझते हैं। लेकिन अब लगता है कि लोग नहीं समझते हैं, तो अच्छा ही है। प्रधानमंत्री जी ने अकेले समझकर ही देश की अर्थव्यवस्था पर इतना उपकार किया है कि बाकियों के लिए भविष्य में भी अब कोई गुंजाइश नहीं बची है।
वैसे बहुत लोग तो अब भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री जी ने मैडम जी को क्या समझाया था कि उन्होंने उन्हें ही रेस का राजा बना दिया। समझाया तो पता नहीं, किसने किसको क्या-क्या होगा। लेकिन हम तो यही समझकर बैठे रहे कि प्रधानमंत्री जी के साथ समझदार लोग बैठे हैं। हमें क्या पता था कि सब एक दूसरे को समझा रहे हैं और कोई किसी को समझ नहीं पा रहा। गजब तो यह भी है कि आर्थिक मामले के बड़े-बड़े समझदार लोग भी रुपये की गिरावट को रोकने का तरीका नहीं समझ पा रहे।